अनिता के स्कूल के काग़ज़ बाईस बरस एक टीन के बक्से में रहे और उन्हें किसी ने नहीं खोला।
वह बक्सा हाथरस के उस घर के पीछे वाले कमरे में रखा था और उसमें दोनों बच्चों के काग़ज़ थे, जन्म का प्रमाण, अंकसूचियाँ, और हर बरस के दाख़िले के फ़ॉर्म।
अनिता की माँ उसे नौ बरस की उम्र में छोड़कर चली गई थीं। लौटीं नहीं।
उस घर में यह बात कभी इस तरह नहीं कही गई।
हुआ इतना था कि वे अपने मायके गईं और वापस नहीं आईं, और उसके पीछे उनकी अपनी वजहें थीं जो अनिता को बहुत बाद में मालूम हुईं, और उनमें से कुछ ठीक भी थीं।
उनके जाने के डेढ़ बरस बाद प्रेमलता उस घर में आईं। दूसरी शादी थी।
प्रेमलता की उम्र उस वक़्त इकतीस थी और उनकी पहली शादी नहीं चली थी।
उस घर में उनका बाईस बरस का काम इस तरह चला। खाना, कपड़े, बीमारी, स्कूल, फ़ीस, और दोनों बच्चों की शादियाँ।
अनिता ने उन्हें माँ कभी नहीं कहा। उसने उन्हें मौसी कहा, जो पहले दिन उससे कहलवाया गया था और जो फिर बदला नहीं गया।
प्रेमलता ने इस पर कभी कुछ नहीं कहा। एक बार भी नहीं।
यह भी सच है कि उन दोनों में लगाव जैसा कुछ नहीं दिखा। बात होती थी, काम होता था, और शाम को दोनों अलग-अलग बैठती थीं।
उन बाईस बरसों में एक बात ऐसी थी जो अनिता को खटकती रही और जिसका उसे बहुत बाद में मतलब समझ आया। घर में जब कोई मेहमान आता और बच्चों के बारे में पूछता, तो प्रेमलता कहती थीं कि ये इनकी हैं, और इनकी में उनका इशारा अनिता के पिता की तरफ़ होता था। यह उन्होंने बाईस बरस किया, हर बार, और अनिता को यह हर बार बुरा लगा।
अनिता की शादी दो हज़ार सत्रह में हुई और वह मथुरा चली गई।
उसके बाद फ़ोन महीने में एक-दो बार होता था और उसमें भी ज़्यादा बात उसके पिता से होती थी।
पिछले बरस अनिता की बेटी का स्कूल में दाख़िला होना था और उसमें एक काग़ज़ की ज़रूरत पड़ी, जो अनिता की अपनी पाँचवीं की अंकसूची थी।
उसके लिए वह हाथरस आई और वह बक्सा खोला गया।
अंकसूची मिल गई। उसके साथ बाईस फ़ॉर्म भी निकले।
उन फ़ॉर्मों में एक ख़ाना होता है, जिसमें माता का नाम लिखा जाता है।
पहले दो फ़ॉर्म उसके पिता की लिखावट में थे और उनमें उसकी माँ का नाम था।
तीसरे से लेकर आख़िरी तक, यानी बीस फ़ॉर्म, प्रेमलता की लिखावट में थे।
और उन बीसों में भी वही नाम लिखा था। अनिता की माँ का। हर बार।
अनिता वहीं बैठ गई। उसने वे बीस फ़ॉर्म एक-एक करके देखे।
लिखावट वही थी, स्याही अलग-अलग बरसों की, और नाम हर बार पूरा लिखा गया था, बिना काट-पीट के।
उसने अपने पिता से पूछा। उसी शाम।
उन्होंने कहा कि यह उन्हीं ने तय किया था और मुझसे कहा भी था।
जो कारण उन्होंने बताया, वह किसी लगाव का नहीं था। प्रेमलता ने उनसे कहा था कि काग़ज़ में जो नाम है, वही रहना चाहिए, वरना लड़की को आगे कहीं परेशानी होगी, और उन दिनों यह बात ठीक भी थी, क्योंकि उस वक़्त काग़ज़ों में नाम बदलवाना बहुत मुश्किल था।
अनिता ने इसके बाद वह सवाल पूछा जो उसे पूछना था।
उसने पूछा कि क्या उन्होंने कभी अपना नाम लिखने की बात की।
उसके पिता ने कहा कि नहीं। एक बार भी नहीं।
फिर उन्होंने एक और बात बता दी जो अनिता को नहीं मालूम थी।
बारहवीं के फ़ॉर्म में स्कूल ने अभिभावक का नाम अलग से माँगा था और उस ख़ाने में प्रेमलता ने अपना नाम लिखा था, और उस बरस अनिता ने उस फ़ॉर्म पर दस्तख़त करते हुए वह देखा भी था और कुछ नहीं कहा था।
वह उसे याद नहीं है और उसने उस फ़ॉर्म को दोबारा देखा और उसमें वह लिखा हुआ था।
अनिता उस शाम प्रेमलता के पास बैठी और उससे इस बारे में कुछ नहीं पूछा।
यह उसने डर से नहीं किया। उसे यह दिख गया था कि पूछने पर वह वही जवाब देंगी जो उसके पिता ने दिया, यानी काग़ज़ की बात, और वह जवाब पूरा नहीं होगा और उससे बड़ा जवाब वे कभी नहीं देंगी।
उस बक्से में से वह पाँचवीं की अंकसूची ले गई और बाक़ी सब वापस रख दिया।
लौटते वक़्त बस अड्डे पर उसे एक बात याद आई। बारहवीं के उस बरस प्रेमलता ने उससे कहा था कि इस फ़ॉर्म को ध्यान से देख लेना। उसने उस वक़्त उसे कोई और बात समझा था, फ़ीस या तारीख़ की, और आगे बढ़ गई थी।
मथुरा में जब उसने अपनी बेटी का फ़ॉर्म भरा, तो माता के ख़ाने में उसने अपना नाम लिखा और अभिभावक के ख़ाने में भी।
उसके बाद उसने एक और चीज़ की, जिसका उसने अपने घर में कारण नहीं बताया। उसने उस फ़ॉर्म की एक छायाप्रति करवाई और उसे हाथरस भेज दिया, डाक से, बिना चिट्ठी के, और अब वह प्रेमलता के उसी टीन के बक्से में रखी है, बाक़ी काग़ज़ों के ऊपर।