बँटवारा दो हज़ार आठ में हुआ और वह बहुत साफ़ हुआ।

मकान बुलंदशहर के एक मुहल्ले में है और उसमें चार कमरे थे, दो आगे और दो पीछे, और बीच में एक आँगन।

पिता के बाद दोनों भाइयों ने उसे नापकर बाँटा। मेहरचंद बड़ा था और उसे आगे के दो कमरे मिले, जो सड़क की तरफ़ हैं। छोटे भाई को पीछे के दो, जो आँगन की तरफ़ हैं।

काग़ज़ बना, गवाह हुए, और उसमें कोई झगड़ा नहीं हुआ।

आगे के कमरे बेहतर हैं, यह उस मुहल्ले में सब जानते हैं। सड़क की तरफ़ होने से उन्हें किराए पर दिया जा सकता है और दुकान भी बनाई जा सकती है।

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पीछे के दो कमरों में एक चीज़ है जो आगे नहीं है। पीछे वाला कमरा, जो सबसे अंदर है, उसमें दो खिड़कियाँ हैं और गरमी में वह पूरे मकान का सबसे ठंडा कमरा है।

उसमें उनकी माँ रहती थीं। बँटवारे से पहले भी।

माँ बँटवारे के छह बरस बाद तक थीं और वे उसी कमरे में रहीं, और वह कमरा छोटे भाई के हिस्से में था।

तय यह किसी ने नहीं किया था। वे पहले से वहीं रहती थीं और बँटवारे में उस कमरे का नाम छोटे भाई के हिस्से में चढ़ा, और माँ वहीं रहती रहीं।

इन छह बरसों में मेहरचंद ने उस कमरे का कभी ज़िक्र नहीं किया।

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माँ की देखभाल का जो काम था, वह छोटे भाई और उसकी पत्नी ने किया, क्योंकि माँ उनके हिस्से में रहती थीं। दवा, खाना, अस्पताल के चक्कर, और रात को उठकर देखना।

मेहरचंद रोज़ शाम आधा घंटा बैठता था और उसने पैसा भी दिया, आधा-आधा, हर बार।

उन छह बरसों में एक बात ऐसी हुई जिस पर उस वक़्त किसी ने ध्यान नहीं दिया। तीसरे बरस मेहरचंद ने अपने आगे वाले कमरे में एक कूलर लगवाया, क्योंकि उस तरफ़ गरमी ज़्यादा पड़ती है। माँ ने उसी हफ़्ते उससे कहा था कि तू यहाँ आकर सो जा, यह कमरा ठंडा है। वह एक रात सोया और उसके बाद नहीं आया।

छह बरस बाद माँ नहीं रहीं।

उसके बाद वह कमरा ख़ाली हो गया।

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छोटे भाई ने उसमें अपना सामान रखा और साल भर बाद अपनी बड़ी बेटी को उसमें बिठा दिया, क्योंकि वह बारहवीं में थी और पढ़ने के लिए अलग जगह चाहिए थी।

मेहरचंद ने उस पर कुछ नहीं कहा। एक शब्द भी नहीं।

अठारह बरस निकल गए। कुछ नहीं कहा गया।

इस बीच दोनों घरों में सब हुआ जो होता है। छोटे भाई की दोनों बेटियों की शादी हुई और मेहरचंद के बेटे की भी। दोनों तरफ़ से लेन-देन बराबर रहा और मुहल्ले में उन दोनों घरों की मिसाल दी जाती थी।

बीच में एक बार बात उठी भी थी, और वह अठारह बरस में एक ही बार थी। मेहरचंद की पत्नी ने किसी और झगड़े में यह कह दिया था कि माँ का कमरा तो उन्हीं के पास रहा। उस दिन मेहरचंद ने अपनी पत्नी को टोक दिया, बाहर वालों के सामने, और उसके बाद वह बात उस घर में दोबारा नहीं कही गई।

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पिछले बरस मेहरचंद ने अपने हिस्से का एक कमरा किराए पर दिया, सड़क की तरफ़ वाला, जिसमें एक आदमी ने मोबाइल की दुकान खोली। किराया छह हज़ार महीना।

उस दिन शाम को छोटा भाई उसके पास बैठा और उसने पूछा कि किराया कितना तय हुआ।

मेहरचंद ने बता दिया। छह हज़ार।

फिर छोटे भाई ने कहा कि अच्छा है, आगे वाले कमरे इसी काम के हैं।

मेहरचंद ने उस पर सिर हिलाया और चाय पी और बात वहीं ख़त्म हो गई।

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उस रात उसने अपनी पत्नी से एक बात कही, जो उसने अठारह बरस में पहली बार कही।

उसने कहा कि माँ के कमरे का हिसाब कभी नहीं हुआ।

उसकी पत्नी ने पूछा कि मतलब क्या है।

उसने कहा कि जिस कमरे में माँ रहीं, वह उनके हिस्से में था, और उन्होंने छह बरस उस कमरे का इस्तेमाल नहीं किया। एक कमरा छह बरस, यानी उस वक़्त के किराए से लगभग एक लाख।

पत्नी ने कहा कि तुमने उन्हें दिया भी नहीं।

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उसने कहा कि नहीं। कभी नहीं दिया।

फिर उसने यह भी कहा कि वे भी नहीं माँगेंगे और यही सबसे भारी बात है।

यह बातचीत उस रात के बाद उनके घर में दोबारा नहीं हुई और मेहरचंद ने अपने भाई से कभी इसका ज़िक्र नहीं किया।

जो चीज़ उसने की, वह अलग थी और उसने उसका कारण किसी को नहीं बताया। मोबाइल की दुकान का जो किराया आता है, उसमें से वह हर महीने दो हज़ार अलग निकालता है और उसे एक डाक के लिफ़ाफ़े में डालकर अलमारी में रखता है।

उस लिफ़ाफ़े पर कुछ लिखा नहीं है। कोई नाम नहीं।

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छोटे भाई की बड़ी बेटी अब उसी शहर में रहती है और उसका एक बच्चा है, और वह बच्चा जब उस मकान में आता है तो पीछे वाले कमरे में सोता है, क्योंकि गरमी में वही सबसे ठंडा है, और मेहरचंद उसे वहीं सुलाने को कहता है।