किसी ने उसे कुछ नहीं कहा था।
न बहू ने, न बेटे ने, न किसी पड़ोसी ने।
सुखवंती उस घर में बत्तीस बरस रही। वह घर उसके पति का था, ग्वालियर के एक मुहल्ले में, और उसमें नीचे दो कमरे और ऊपर एक कमरा है।
उसका बेटा दो हज़ार बीस में ब्याहा गया और बहू घर आ गई।
छह बरस में कोई झगड़ा नहीं हुआ। बहू ने उसे कभी कुछ नहीं कहा, न ताना दिया, न आवाज़ ऊँची की।
जो हुआ वह और चीज़ थी। धीरे-धीरे हुआ।
रसोई में सुखवंती का हाथ धीरे-धीरे कम होता गया, और वह किसी के रोकने से नहीं हुआ। बहू सुबह जल्दी उठकर बना देती थी, और अच्छा बनाती थी, और सुखवंती के उठने तक चाय भी बन चुकी होती थी।
टीवी नीचे वाले कमरे में है और शाम को वहाँ बच्चा पढ़ता है, इसलिए टीवी बंद रहता है।
मेहमान आते हैं तो बहू बात करती है, क्योंकि उसे बात करना आता है।
ऐसे छह बरस में सुखवंती के पास नीचे करने के लिए कुछ नहीं बचा।
ऊपर वाले कमरे में जाने का उसका एक और कारण था, जो उसने किसी को नहीं बताया। नीचे के कमरे में उसकी चारपाई की जगह दो बरस पहले बदल दी गई थी, जब बच्चे के पढ़ने की मेज़ आई। नई जगह दरवाज़े के पास थी और वहाँ रात में आने-जाने वालों की आवाज़ आती थी। यह उसने किसी से नहीं कहा, क्योंकि मेज़ बच्चे के लिए थी।
ऊपर वाले कमरे में वह अपने आप गई, दो हज़ार छब्बीस के जनवरी में।
उस दिन उसने किसी को कुछ बताया नहीं और शाम तक अपना सामान ऊपर ले गई।
बहू ने उसे रोका। दो बार।
उसने कहा कि ऊपर हवा अच्छी है। बात वहीं ख़त्म हो गई।
यह झूठ नहीं था। ऊपर वाला कमरा हवादार है और गरमी में वहाँ नहीं रहा जा सकता, और जनवरी में वह ठीक रहता है।
सामान समेटने में उसे दो घंटे लगे और उसमें उसे एक चीज़ पता चली।
उसका सारा सामान एक बैग और एक टीन के डिब्बे में आ गया। दो घंटे में।
बत्तीस बरस का सामान। एक बैग।
यह उसे रोने वाली बात नहीं लगी। उसे यह अजीब लगा, और वह वहीं बैठकर सोचती रही कि बाक़ी सब कहाँ गया।
बाक़ी सब वहीं था। बरतन रसोई में थे और वे घर के थे। बिस्तर, कुर्सियाँ, अलमारी, वे भी घर के थे। जो चीज़ें उसकी अपनी थीं, वे बीस-पच्चीस थीं।
जिस चीज़ पर उसका हाथ रुका, वह नीचे वाले कमरे की दीवार में बनी छोटी अलमारी थी।
उस घर में जो पुरानी बनावट है, उसमें सिरहाने की तरफ़ दीवार में एक छोटा ख़ाना बना होता है, जिसमें रात की ज़रूरत की चीज़ें रखी जाती हैं। दवा, चश्मा, पानी का गिलास।
बत्तीस बरस उसमें उसकी चीज़ें रहीं।
वह ख़ाना उसने ख़ाली किया और उसमें से तीन चीज़ें निकलीं जो उसकी नहीं थीं।
एक बच्चे की दवा की शीशी, जो ख़त्म हो चुकी थी। एक चाबी, जिसका ताला उस घर में नहीं है। और एक परची, जिस पर उसके बेटे की लिखावट में एक नंबर लिखा था।
वह नंबर एक डॉक्टर का था और वह परची छह बरस पुरानी थी।
यह वह डॉक्टर था जिसे उसके बेटे ने उसके घुटने के लिए ढूँढ़ा था, दो हज़ार बीस में, शादी से दो महीने पहले, और वह परची उसने ख़ुद उस ख़ाने में रखी थी और भूल गई थी।
वह उस डॉक्टर के पास कभी नहीं गई। घुटना अब भी वैसा है।
उन छह बरसों में बेटे ने उससे घुटने के बारे में तीन-चार बार पूछा और हर बार सुखवंती ने कहा कि ठीक है। एक बार उसने यह भी कहा था कि डॉक्टर का पता कहीं रखा है, ढूँढ़कर बताती हूँ, और वह उसी दिन भूल गई। बेटे ने उसके बाद वह नंबर दोबारा नहीं निकाला, क्योंकि उसे यह लगा कि माँ जाना नहीं चाहती।
उस दिन वह परची उसने अपने डिब्बे में रख ली और बाक़ी दोनों चीज़ें वहीं छोड़ दीं।
ऊपर के कमरे में वह अब रहती है और नीचे दिन में तीन-चार बार आती है।
बहू उसका खाना ऊपर भेज देती है और सुखवंती नीचे आकर खाना पसंद करती है, और यह उसने कहा नहीं है।
उसके बेटे ने उससे इस बारे में एक बार पूछा था, ऊपर जाने के तीसरे महीने में, और वह सवाल आधा रह गया। उसने कहा था कि माँ, आप ऊपर क्यों। सुखवंती ने कहा कि हवा अच्छी है। बेटे ने दोबारा नहीं पूछा, और उसे भी यह मालूम था कि जवाब यही मिलेगा।
ऊपर वाले कमरे में सिरहाने की तरफ़ दीवार में ख़ाना नहीं है, क्योंकि वह कमरा बाद में बना है। सुखवंती ने वहाँ एक लकड़ी का पटरा रखवाया है, चारपाई के सिरहाने, उसी ऊँचाई पर, और उस पर वे ही चीज़ें रखी रहती हैं जो नीचे रखी रहती थीं, उसी क्रम में, और उसके एक कोने पर वह छह बरस पुरानी परची दबाकर रखी है।