जगरानी उस घर में उन्तीस बरस से खाना बनाती थी।
घर इंदौर के एक पुराने मुहल्ले में है। वह सुबह सात बजे आती थी और दोपहर एक बजे तक रहती थी, और शाम को साढ़े छह से आठ।
उन्तीस बरस में उसने उस घर में तीन पीढ़ियाँ देखीं। तीन।
जो एक चीज़ उसकी पहचान बनी, वह अरहर की दाल थी। बस दाल।
इसमें कुछ ख़ास नहीं लगता और यही बात है। दाल हर घर में बनती है। उस घर में जो बनती थी, वह मेहमानों को याद रह जाती थी और लोग दोबारा माँगते थे।
उस घर की लड़की का नाम दक्षा है और वह उन्तीस में से छब्बीस बरस उसी घर में रही।
पिछले बरस उसकी शादी हुई और उसे अपने पति के साथ कनाडा जाना था।
जाने से चार महीने पहले उसने जगरानी से कहा कि वह दाल की तरकीब लिखकर दे दे।
जगरानी ने कहा कि लिख दूँगी। उसे लिखना आता नहीं था।
उसमें चार महीने लग गए और आख़िर में वह लिखी भी गई और वह काम नहीं आई।
पहली बार में जो लिखा गया, वह इस तरह था। दाल एक कटोरी, पानी अंदाज़े से, हल्दी थोड़ी, नमक स्वाद के हिसाब से, तड़के में जीरा और लहसुन, और आख़िर में एक चीज़ जिसका नाम उसने बताया नहीं।
दक्षा ने कहा कि यह तरकीब नहीं है। कुछ भी नहीं है।
यह ठीक कहा और जगरानी को इससे बुरा नहीं लगा। उसने कहा कि वह जो करती है, वह ऐसे ही करती है।
उसके बाद दक्षा ने दूसरा तरीक़ा अपनाया। वह उसके साथ रसोई में खड़ी हो गई और हर चीज़ तराज़ू पर तुलवाई।
इसमें एक बात निकली। दोनों को अजीब लगी।
जगरानी की एक कटोरी दाल हर बार एक जैसी नहीं थी। जब घर में चार लोग होते थे तब वह कम थी और मेहमान होने पर ज़्यादा, और यह वह नापकर नहीं करती थी।
पानी का हिसाब मौसम से बदलता था। हर मौसम में अलग। गरमी में ज़्यादा, क्योंकि दाल जल्दी गाढ़ी हो जाती है।
और वह आख़िरी चीज़, जो उसने पहली बार बताई नहीं थी, वह अमचूर था, और वह वह उन दिनों डालती थी जब बाज़ार का टमाटर खट्टा नहीं होता।
यानी हर बात किसी और बात से जुड़ी थी। अकेली कोई नहीं थी।
उन चार महीनों में एक शाम ऐसी आई जब जगरानी ने लिखवाना बंद कर दिया। दक्षा ने उससे पूछा था कि आपने यह नाप कहाँ से सीखा, और उसने कहा कि नाप कहीं से नहीं सीखा। उस पर दक्षा ने ज़ोर दिया और तीसरी बार पूछा, और जगरानी उठकर बरतन धोने चली गई। दो दिन बात नहीं हुई। पूरे दो दिन। तीसरे दिन दक्षा ने माफ़ी माँगी और जगरानी ने कहा कि माफ़ी की बात नहीं है, उसे ख़ुद नहीं मालूम, यही सबसे बुरा लगता है।
तीन महीने में उन दोनों ने वह तरकीब सात बार लिखी और हर बार उसे बदला।
आख़िर में जो लिखी गई, वह डेढ़ पन्ने की थी। सातवीं बार में।
दक्षा ने उसे अपने फ़ोन में उतार लिया और कनाडा चली गई।
वहाँ उसने वह चार बार बनाई। चारों बार वह वैसी नहीं बनी।
इसमें उसका हाथ ख़राब नहीं था। वजहें साफ़ थीं। दाल वहाँ की दूसरी है, पानी दूसरा है, चूल्हे की आँच अलग है, और अमचूर वहाँ उसी तरह का नहीं मिलता।
उसने जगरानी को फ़ोन किया और उसे पूरा बताया।
जगरानी ने सुना और उसके बाद जो कहा, उसमें वह बात नहीं थी जो दक्षा सुनना चाहती थी। उसने कहा कि जब बन जाएगी, तब बन जाएगी, और उसमें बरस लगते हैं।
दक्षा ने पूछा कि आपको कितने बरस लगे।
उसने कहा कि उसे यह याद नहीं है, क्योंकि उसने वह अपनी माँ से सीखी थी और उस वक़्त वह ग्यारह बरस की थी।
इस बीच जगरानी की उम्र इकसठ हो गई है और उसके हाथ की उँगलियाँ सुबह अकड़ी रहती हैं।
उस घर में उसका काम अब बहुत कम है और तनख़्वाह वही है, और यह उस घर वालों ने ख़ुद तय किया।
यह बात जगरानी को अच्छी नहीं लगती। उसने एक बार कह भी दिया। काम दो, दया मत दो।
उसके बाद उसे रोटी और दाल का काम वापस दिया गया और सब्ज़ी अब घर वाले बनाते हैं।
शादी के दिनों में उस घर में तीन दिन खाना बाहर से आया, क्योंकि मेहमान बहुत थे। जगरानी उन तीनों दिन आई और उसने कोई काम नहीं किया। तीसरे दिन शाम को उसने अपने आप एक बार दाल बनाई, बीस लोगों की, और वह किसी ने माँगी नहीं थी। वह पूरी ख़त्म हो गई। दो लोगों ने पूछा कि यह किसने बनाई।
दक्षा हर तीसरे रविवार फ़ोन करती है और उसमें आधा वक़्त रसोई की बात होती है।
पिछली बार उसने बताया कि उसने अमचूर की जगह वहाँ की एक खट्टी चीज़ डालकर देखी और दाल अलग बनी, पर ठीक बनी।
जगरानी ने उससे कहा कि उसे वही लिख ले, और उसने यह भी कहा कि अब वह उसकी तरकीब है, मेरी नहीं। उस डेढ़ पन्ने वाली कापी का असली काग़ज़ अब भी उस घर की रसोई में है, ऊपर वाले ख़ाने में, और जगरानी उसे कभी नहीं देखती, क्योंकि उसे पढ़ना नहीं आता।