दीनदयाल उस मेज़ पर इकतीस बरस बैठा और उसके रिटायर होने के दिन दफ़्तर में केक कटा।
दफ़्तर बरेली के एक सरकारी विभाग का है, जहाँ ज़मीन के दाख़िल-ख़ारिज के काग़ज़ चलते हैं।
उसकी विदाई पर जो कहा गया, वही कहा जाता है। कि वह मेहनती था, कि उसने कभी छुट्टी नहीं ली, और कि उसके जाने से कमी रहेगी।
उसकी जगह जो लड़का आया, उसका नाम हरकिशन है और वह छब्बीस का है।
पहले हफ़्ते में उसे वह मेज़ ख़राब लगी। पुरानी और गंदी।
उसकी वजह साफ़ थी। मेज़ पुरानी थी, उसके दोनों दराज़ ठीक से नहीं खुलते थे, और उसकी लकड़ी पर जगह-जगह पेंसिल से निशान बने थे, जो गंदे लगते थे।
उसने पहले महीने में तीन बार दूसरी मेज़ माँगी और तीनों बार यह कहा गया कि अभी दूसरी नहीं है।
पहला महीना उसे भारी पड़ा और उसकी वजह मेज़ नहीं थी।
उस सीट पर काम बहुत है। रोज़ चालीस से साठ आवेदन आते हैं और हर एक में तीन-चार जगह देखनी पड़ती हैं, कि खाता किसका है, बकाया है या नहीं, और कोई पुराना मामला अदालत में चल रहा है या नहीं।
पहले महीने में उसका काम पीछे रह गया और उस पर उसे दो बार टोका गया।
दूसरे महीने में उसने एक चीज़ देखी। ग़ौर से देखी।
मेज़ की लकड़ी पर जो पेंसिल के निशान थे, वे बेतरतीब नहीं थे।
बाईं तरफ़ के किनारे पर, ऊपर से नीचे, सत्रह छोटी लकीरें थीं और उनके आगे अक्षर लिखे थे। हर लकीर के आगे दो या तीन अक्षर।
उसने उन्हें पढ़ा। कुछ समझ नहीं आया।
तीसरे महीने में उसे एक अक्षर का मतलब समझ आया, इत्तिफ़ाक़ से।
उसमें से एक जोड़ा था, दो अक्षर, जो उस तहसील के एक गाँव के नाम के पहले दो अक्षर थे।
इसके बाद उसने बाक़ी सोलह जाँचे और वे सब गाँवों के नाम निकले।
उन सत्रह गाँवों में एक बात आम थी।
ये उस तहसील के वे गाँव हैं जिनका पुराना रिकॉर्ड दो हज़ार तीन की चकबंदी में गड़बड़ हुआ था, और उनके किसी भी मामले में पुरानी खतौनी भी देखनी पड़ती है, वरना काग़ज़ आगे जाकर लौट आता है।
यानी वह सूची एक चेतावनी थी। सत्रह नामों की।
जो आदमी उस मेज़ पर बैठता है, उसे यह सत्रह नाम याद रखने पड़ते हैं, और दीनदयाल ने उन्हें याद नहीं रखा था, उन्हें मेज़ पर लिख रखा था।
हरकिशन ने इसके बाद पूरी मेज़ देखी।
दाईं तरफ़ के किनारे पर तीन लकीरें थीं और उनके आगे तीन अंक। वे तीन तारीख़ें थीं, महीने की, जिन पर उस सीट के काग़ज़ ऊपर भेजे जाते हैं।
दराज़ के अंदर, ऊपर की तरफ़, जो दिखता नहीं है, वहाँ एक क्रम लिखा था। पाँच शब्द, जो पाँच रजिस्टरों के नाम थे, और उनका क्रम वही था जिसमें उन्हें देखना चाहिए।
हरकिशन को यह क्रम किसी ने नहीं बताया था और वह पहले दो महीने उलटे क्रम से देखता रहा था, जिससे उसका वक़्त लगभग दुगुना लगता था।
इस पूरी चीज़ को समझने में उसे छह महीने लगे और उसके बाद उसका काम पीछे रहना बंद हो गया।
एक बात उसे बहुत बाद में समझ आई।
दीनदयाल ने वह सब मेज़ पर लिखा था और कहीं और नहीं। न किसी कापी में, न किसी काग़ज़ पर।
इसका कारण उसने किसी से नहीं पूछा और अंदाज़ा उसका यह है कि कापी घर चली जाती है और मेज़ वहीं रहती है।
दीनदयाल उसी शहर में है और दफ़्तर से दो किलोमीटर दूर रहता है।
हरकिशन उससे आज तक नहीं मिला। एक बार भी नहीं।
यह उसने जान-बूझकर नहीं किया। पहले छह महीने उसे यह मालूम नहीं था कि वह मिलने लायक़ आदमी है, और उसके बाद जाकर पूछना अजीब लगा, क्योंकि तब तक उसे सब समझ आ चुका था।
बीच में एक बार वह लगभग मिल भी गया था। दो हज़ार पच्चीस के जुलाई में दीनदयाल किसी काम से उसी दफ़्तर आया, अपनी पेंशन के एक काग़ज़ के लिए, और वह उसी कमरे से गुज़रा। हरकिशन उस वक़्त उसी मेज़ पर बैठा था और उसने सिर उठाकर देखा और पहचाना नहीं, क्योंकि उस चेहरे को उसने पहले कभी नहीं देखा था। दीनदयाल ने उस मेज़ की तरफ़ देखा और आगे बढ़ गया।
पिछले बरस उस दफ़्तर में नई मेज़ें आईं।
हरकिशन को भी एक मिली और उसने वह ले भी ली, क्योंकि मना करने का कोई कारण नहीं था।
पुरानी मेज़ स्टोर में चली गई। वहीं पड़ी है।
जाने से पहले उसने एक काम किया, जिसमें उसे दो शामें लगीं। उसने उन सत्रह नामों, तीन तारीख़ों और पाँच रजिस्टरों के क्रम को नई मेज़ पर उतारा।
पेंसिल से, उसी तरह, उसी जगह पर, यानी बाएँ किनारे पर, दाएँ किनारे पर, और दराज़ के अंदर ऊपर की तरफ़।
उसने उसमें दो नाम और जोड़े, क्योंकि दो हज़ार तेईस में दो और गाँवों का रिकॉर्ड गड़बड़ हो गया था।
अब उन्नीस लकीरें हैं। दो उसकी अपनी।
यह उसने किसी को नहीं बताया और दफ़्तर में किसी ने पूछा भी नहीं, क्योंकि नई मेज़ पर पेंसिल के निशान गंदे लगते हैं और उस पर लोग यही कहते हैं कि लड़का लापरवाह है।