ललिता ने आठवीं के बाद स्कूल छोड़ा और उसकी उम्र उस वक़्त चौदह थी।
घर सागर ज़िले के एक क़स्बे में था। उसके पिता की साइकिल मरम्मत की दुकान थी और घर में चार लोग थे।
स्कूल छोड़ने का कारण पैसा था और यह उस क़स्बे में आम था।
उसके बाद उसने एक सिलाई केंद्र में काम शुरू किया, महीने के आठ सौ पर, और उन्नीस बरस उसी काम में रही।
उसका भाई उससे तीन बरस छोटा था और वह पढ़ता रहा। बारहवीं, फिर भोपाल से इंजीनियरिंग, फिर पुणे में नौकरी।
यह पूरी बात उस क़स्बे की सैकड़ों कहानियों जैसी है और उसमें अजीब कुछ नहीं है।
जो चीज़ अजीब है, वह उन्नीस बरस बाद निकली।
ललिता की शादी उसी क़स्बे में हुई और वह चार गली छोड़कर रहती है। उसका भाई पुणे में है और साल में दो बार आता है।
पिछले बरस उनके पिता की दुकान बंद हुई, क्योंकि उनकी उम्र हो गई और उस दुकान में अब कमाई नहीं थी।
दुकान ख़ाली करते वक़्त उसमें से सामान निकला और उसी में एक काठ का संदूक थी।
संदूक में दुकान के पुराने काग़ज़ थे और उनके बीच कॉलेज की रसीद बुक थी।
इंजीनियरिंग की फ़ीस उस बुक में चार बरस की चढ़ी हुई थी, आठ किश्तों में।
हर रसीद पर एक ख़ाना होता है, जिसमें जमा करने वाले का नाम लिखा जाता है।
आठों रसीदों पर ललिता का नाम था। आठों पर।
यह उसने नहीं देखा। भाई ने देखा, क्योंकि संदूक वही खोल रहा था।
और भाई के लिए वह नई बात नहीं थी। यही इस पूरे मामले की जड़ है।
उसे यह दूसरे बरस में मालूम हो गया था। सोलह बरस पहले।
दो हज़ार दस की गरमियों में वह छुट्टी पर घर आया था और उसे तीसरे बरस की पहली किश्त लेकर जाना था। पिता उस दिन दुकान पर थे और पैसा घर में रखा था, और उसे देते वक़्त उसकी माँ ने बात-बात में कह दिया कि यह तेरी बहन की तनख़्वाह का है, संभालकर ले जा।
उसने उस दिन कुछ नहीं पूछा। एक शब्द भी नहीं।
उसके बाद के दो बरस उसने वह पैसा उसी तरह लिया, हर किश्त पर, और एक बार भी यह बात नहीं उठाई।
इसकी वजह लालच नहीं थी। लालच कहना आसान है।
वजह यह थी कि उस वक़्त उसके तीसरे बरस के दो पर्चे बाक़ी थे और उसे यह डर था कि बात उठाने पर घर में कुछ बदल जाएगा, और बदलने का मतलब पढ़ाई रुकना होता।
उसने यह सोचा था कि नौकरी लगने पर वह हिसाब बराबर कर देगा। नौकरी लगने पर उसने पैसा भेजा भी, पहले तीन बरस, हर महीने, और वह पैसा घर के ख़र्च में गया, क्योंकि घर को उसकी ज़रूरत थी।
ललिता तक उसमें से कुछ नहीं गया। उसकी शादी में उसने ख़र्च किया और वह भी घर के हिसाब से हुआ, यानी भाई का हिस्सा माना गया।
पिछले बरस उस रसीद बुक के निकलने पर जो हुआ, वह उलटा हुआ।
भाई ने उससे कुछ नहीं पूछा। ललिता ने पूछा।
उसने उसे बुलाकर वह बुक दिखाई और पूछा कि तुझे यह मालूम था।
उसने हाँ कह दिया। एक बार में, बिना बहाने के, और यही एक चीज़ है जो उसने उस पूरे मामले में ठीक की।
ललिता कुछ देर बैठी रही। दूसरा सवाल नहीं पूछा।
जो सवाल वह पूछ सकती थी, वह यह था कि सोलह बरस में एक बार भी क्यों नहीं कहा, और उसका जवाब उसे पहले से मालूम था। कहने पर हिसाब बनता, और हिसाब बनने पर उसे लौटाना पड़ता, और लौटाने के लिए उसके पास पहले चार बरस कुछ नहीं था और बाद के बारह बरस में यह बात पुरानी हो गई।
उस रात ललिता के घर में झगड़ा हुआ। अपने पति से।
उसके पति ने कहा कि अब भी माँग लो, वह देगा।
ललिता ने कहा कि नहीं माँगूँगी। इस पर उसके पति ने वह बात कही जो उस घर में तीन दिन गूँजती रही। उसने कहा कि तुम्हारी आठवीं की वजह यही आदत है।
यह बात कड़ी थी। पूरी ग़लत नहीं थी।
ललिता ने उसका जवाब नहीं दिया और तीन दिन बाद वह बात ख़त्म हो गई, जैसी उस घर में हो जाती है।
भाई ने उसके बाद पैसे की पेशकश नहीं की। उसने एक और चीज़ की, जो पैसे से आसान नहीं थी।
उसने अपने घर में, अपनी पत्नी और अपनी बेटी के सामने, पूरी बात बताई। कि उसकी पढ़ाई की फ़ीस उसकी बुआ की तनख़्वाह से गई थी, और उसे यह दूसरे बरस से मालूम था, और उसने चुप रहकर पढ़ाई पूरी की।
उसकी बेटी उस वक़्त तेरह की थी। उसने कुछ नहीं पूछा।
इससे कोई फ़ायदा नहीं हुआ। ललिता को उससे कुछ नहीं मिला।
जो हुआ वह इतना है कि उस घर में एक बात अब लिखी हुई की तरह मौजूद है, और उसे मिटाया नहीं जा सकता।
ललिता अब भी उसी सिलाई केंद्र में है। तनख़्वाह अब सात हज़ार दो सौ है।
भाई साल में दो बार आता है। हर बार उसकी गली तक जाता है।
वह रसीद बुक उसने ललिता को नहीं दी और अपने पास रख ली, और उसे वह अपने उस दराज़ में रखता है जिसमें उसके अपने काग़ज़ हैं, और उसकी बेटी को यह मालूम है कि वह वहाँ क्यों रखी है।