गली नौ फ़ुट की है और दोनों घरों की खिड़कियाँ आमने-सामने पड़ती हैं।
झगड़ा दो हज़ार में हुआ और वह दीवार का था।
नथमल के घर की पिछली दीवार और पड़ोसी के आँगन की दीवार साझा थी और उस पर पड़ोसी ने अपनी छत की एक शहतीर टिका दी।
यह छोटा मामला है और उस मुहल्ले में ऐसे मामले हर बरस निपटते हैं।
यह नहीं निपटा। कभी नहीं।
उसकी वजह शहतीर नहीं थी। वजह यह थी कि नथमल उस दिन घर पर नहीं था और उसकी पत्नी ने रोका, और पड़ोसी ने उससे कहा कि तुम्हें इसका मतलब नहीं मालूम, आदमी को भेजो।
यह बात नथमल तक पहुँची और उसने उसे शहतीर से बड़ा मान लिया।
पंचायत में मामला गया और उसमें फ़ैसला नथमल के हक़ में हुआ। शहतीर हटी।
उसके बाद बात करने की कोई ज़रूरत नहीं बची और दोनों ने नहीं की।
छब्बीस बरस। एक बात नहीं।
इन छब्बीस बरसों में दोनों घरों की सामने वाली खिड़कियाँ बंद रहीं।
यह किसी ने कहा नहीं था। पहले दो-तीन महीने वे बंद रहीं क्योंकि आमने-सामने पड़ना अजीब था, और उसके बाद वे बंद ही रहीं, और फिर उनके चौखट में कील ठुक गई।
गली में और भी घर हैं और उनमें से कोई इस झगड़े में नहीं था। मुहल्ले के काम, शादियाँ, दुख-सुख, इनमें दोनों घर जाते रहे और एक ही जगह बैठते भी रहे, और आपस में बात नहीं की।
बच्चे इसमें बड़े हो गए। तीनों।
नथमल के दोनों बेटे और पड़ोसी की एक बेटी, तीनों उसी गली में खेले और एक ही स्कूल में पढ़े। छोटी उम्र में वे खेलते रहे और किसी ने उन्हें रोका भी नहीं, और बड़े होने पर वे अपने आप अलग हो गए, जैसे बच्चे होते हैं।
पड़ोसी की बेटी की शादी दो हज़ार सोलह में हुई।
उस शादी का कार्ड नथमल के घर नहीं आया। किसी ने पूछा भी नहीं।
यह उस मुहल्ले में बड़ी बात मानी जाती है और उस पर लोगों ने बात भी की।
जो किसी को मालूम नहीं हुआ, वह यह है। कार्ड बना था और उस पर नथमल का नाम भी लिखा गया था, और वह कार्ड पड़ोसी ने भेजा नहीं।
उसने वह अपनी अलमारी में रख दिया, और यह उसकी बेटी को दस बरस बाद पता चला।
इन बरसों में एक चीज़ दोनों घरों में एक जैसी हुई। दोनों की छतों पर पानी की टंकी उसी बरस लगी, दो हज़ार आठ में, और दोनों ने वही मिस्तरी बुलाया, क्योंकि उस मुहल्ले में वही एक था। मिस्तरी ने दोनों से कहा था कि साझा पाइप डलवा लो, आधा-आधा ख़र्च, और दोनों ने अलग-अलग डलवाया, दोनों ने पूरा ख़र्च दिया।
पिछले बरस गली में नाली का काम आया।
नगर पालिका की एक योजना में गली की नाली पक्की होनी थी और उसके लिए हर घर से हामी चाहिए थी, क्योंकि नाली सबके दरवाज़े से गुज़रती है।
दस्तख़त लेने वाला आदमी दोनों घरों में गया।
दोनों ने दस्तख़त कर दिए, अलग-अलग, अपने-अपने दरवाज़े पर।
काम शुरू हुआ और उसमें गली खुद गई और चार दिन दोनों घरों के दरवाज़े से निकलना बंद रहा। उन चार दिनों में पूरी गली एक तरफ़ की छत से दूसरी तरफ़ जाती रही, क्योंकि वहाँ छतें मिली हुई हैं।
तीसरे दिन नथमल की पत्नी को दवा चाहिए थी और नीचे उतरना मुमकिन नहीं था।
छत के रास्ते जो घर पड़ता है, वह उसी पड़ोसी का था।
नथमल का बेटा उस छत से उतरा, उनके घर के अंदर से गुज़रा, और बाहर निकल गया।
पड़ोसी उस वक़्त आँगन में बैठा था। उसने देखा।
उन दोनों में कोई बात नहीं हुई। पड़ोसी ने सिर हिलाया और लड़का निकल गया, और लौटते वक़्त भी वही रास्ता था और वही सिर हिलाना।
यह छब्बीस बरस में उन दोनों घरों के बीच पहला आना-जाना था।
नथमल को यह मालूम नहीं है कि उस दिन उसका बेटा उनके घर से निकला था। लड़के ने घर पर यह नहीं बताया और उसने अपनी माँ से कह दिया कि पीछे वाली गली से घूमकर गया था। यह झूठ उसने सोच-समझकर बोला, क्योंकि सच बोलने पर घर में बात लंबी होती।
इसके बाद भी कुछ नहीं बदला। नाली बन गई, गली खुल गई, और बात दोबारा नहीं हुई।
पड़ोसी की बेटी को वह कार्ड दिखा भी। वह पिछले बरस मायके आई थी और अलमारी से कोई पुराना काग़ज़ निकालते हुए उसे वह मिला, नथमल के नाम के साथ, और उसने अपने पिता से पूछा। उन्होंने कहा कि रह गया होगा। वह उतना ही जवाब था जितना दिया जा सकता था।
जो बदला वह एक चीज़ है और उसे किसी ने नहीं कहा।
उन चार दिनों के बाद पड़ोसी के घर की सामने वाली खिड़की खुली रहने लगी। दिन में, हवा के लिए, और उसके पल्ले में जो कील ठुकी थी वह उसने निकलवा दी। नथमल के घर की खिड़की अब भी बंद है और उसका पल्ला अब खुलेगा भी नहीं, क्योंकि अंदर से उसमें अलमारी लग चुकी है, और यह उसके घर में किसी को खटकता नहीं है।