रामप्रवेश ने उस क़स्बे के इंटर कॉलेज में अड़तीस बरस पढ़ाया।

गणित। नौवीं से बारहवीं तक। एक ही विषय।

क़स्बा छोटा है और उसमें एक ही इंटर कॉलेज है, इसलिए अड़तीस बरस में उसके पढ़ाए लोगों की गिनती हज़ारों में है।

आज उस क़स्बे में जो लोग किसी काम के हैं, उनमें से आधे उसके पढ़ाए हुए हैं। तहसील में दो बाबू, बिजली विभाग का एक अभियंता, बैंक का एक प्रबंधक, दो वकील, और अस्पताल का एक डॉक्टर।

यह उसे मालूम है और वह इसका इस्तेमाल कभी नहीं करता।

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यह कोई सिद्धांत नहीं है और उसने इसे कभी सिद्धांत की तरह नहीं कहा।

उसकी वजह इतनी है कि उसे यह अच्छा नहीं लगता। उसका कहना है कि पढ़ाने का पैसा उसे तनख़्वाह में मिल चुका है।

रिटायर वह दो हज़ार बीस में हुआ।

उसके बाद उसका काम दफ़्तरों में पड़ने लगा, जैसा हर रिटायर आदमी का पड़ता है। पेंशन की फ़ाइल, बिजली का एक ग़लत बिल, ज़मीन के काग़ज़ में एक नाम का सुधार, और बीमे का एक दावा।

इन चारों कामों में एक बात एक जैसी हुई।

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वे जल्दी हो गए। बहुत जल्दी।

पेंशन की फ़ाइल तीन हफ़्ते में निकल गई, जो उस दफ़्तर में तीन महीने लेती है। बिजली का बिल एक चक्कर में ठीक हुआ। ज़मीन का नाम अठारह दिन में सुधरा।

रामप्रवेश ने इसका कारण यह समझा कि दफ़्तरों में अब काम पहले से बेहतर होता है।

उसने यह अपने घर में भी कहा और दो-तीन जगह लोगों से भी कहा।

उसकी पत्नी ने उससे एक बार कहा कि यह अपने आप नहीं हो रहा।

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उसने कहा कि तो और क्या हो रहा है। कोई जादू है।

उसकी पत्नी ने इस पर बहस नहीं की। दोबारा नहीं कहा।

असल में जो होता था, वह यह था।

उस क़स्बे में सूचना एक ही तरह से चलती है, यानी मुँह से। रामप्रवेश जिस दिन किसी दफ़्तर में जाता था, उसी दिन शाम तक यह बात दो-तीन लोगों तक पहुँच जाती थी।

उसके बाद जो होता था, वह किसी एक आदमी ने तय नहीं किया था।

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तहसील का एक बाबू, जो उसका पढ़ाया हुआ है, फ़ाइल को ऊपर वाले ढेर में रख देता था। बिजली विभाग में उस अभियंता ने अपने कर्मचारी से एक बार कह दिया था कि इनका काम अटकाना नहीं।

ये चीज़ें अलग-अलग लोगों ने कीं, अलग-अलग वक़्त पर, और उनमें किसी ने दूसरे से बात नहीं की।

किसी ने रामप्रवेश को यह नहीं बताया, और ऐसा कोई फ़ैसला भी नहीं लिया गया था।

उसका कारण साफ़ है। बताने पर वह मना कर देता।

यह उन सबको मालूम था, क्योंकि उन्होंने उसे अड़तीस बरस देखा था।

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अड़तीस बरस में उसने जो एक चीज़ बरती, वह गणित के अलावा यह थी। उसने किसी बच्चे को घर पर ट्यूशन नहीं पढ़ाया, एक भी नहीं, पूरे अड़तीस बरस। उस क़स्बे में यह चलता था और उससे अच्छी कमाई होती थी, और तीन-चार बार लोग उसके घर तक आए भी। उसका कहना यह था कि जो कक्षा में नहीं सीखा, वह शाम को पैसे लेकर सिखाना बेईमानी है।

इसमें एक बात ऐसी भी हुई जो उलटी थी।

दो हज़ार तेईस में उसे अस्पताल में एक जाँच करानी थी और उसमें नंबर लगता है। वह सुबह छह बजे लाइन में लगा और नौ बजे उसका नंबर आया।

उस दिन वह डॉक्टर छुट्टी पर था। इत्तिफ़ाक़ से।

यानी जिस दिन उसका पढ़ाया आदमी वहाँ नहीं था, उस दिन उसे पूरी लाइन लगी।

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उसे इससे कुछ अजीब नहीं लगा, क्योंकि उसे यह लगता ही नहीं था कि बाक़ी दिनों में लाइन कम होती है।

अब जो बात इस पूरे किस्से में सबसे भारी है, वह यह है।

उन लोगों में से किसी ने उससे कभी नहीं कहा कि सर, आपका काम मैंने कराया था।

एक ने भी नहीं। छह बरस में एक बार भी नहीं।

इसका कारण अदब नहीं है। कारण यह है कि कहने पर वह अगली बार से किसी और खिड़की पर जाता।

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उन छह बरसों में एक ऐसा भी मौक़ा आया जब उसे शक हुआ। दो हज़ार चौबीस में ज़मीन के काग़ज़ वाले काम में वह जिस बाबू के पास बैठा था, उसने उससे कहा कि सर, आप बैठिए, मैं करा देता हूँ। उस पर रामप्रवेश ने पूछा कि तुम मुझे जानते हो। उसने कहा कि नहीं सर, आप उम्र में बड़े हैं, इसलिए। और यह झूठ था।

पिछले बरस उसके बीमे के एक दावे में देर हुई और वह चार महीने अटका रहा।

इसकी वजह थी कि वह दफ़्तर उस क़स्बे में नहीं है, वह ज़िले में है, और वहाँ उसका पढ़ाया कोई नहीं है।

उन चार महीनों में उसने पहली बार यह कहा कि दफ़्तरों में काम नहीं होता।

यह बात उसकी पत्नी ने सुनी। उसने कुछ नहीं कहा।

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रामप्रवेश की उम्र अब सत्तर है और वह अब भी उसी क़स्बे में रहता है।

वह अपना काम ख़ुद कराने जाता है, हर बार, लाइन में लगकर, और वह अब भी किसी से नहीं कहता।

बाज़ार में उसे रोज़ चार-पाँच लोग रोकते हैं और पैर छूते हैं और यह उसे अच्छा लगता है, और उनमें से कौन-कौन उसकी फ़ाइल ऊपर रख चुका है, यह उसे नहीं मालूम और अब पूछने का कोई तरीक़ा भी नहीं है।