रघुनाथ की दुकान में तीन दीये जलते थे और तीनों एक ही तरफ़ रखे रहते थे, ताकि रोशनी हाथ पर पड़े और आँख में न आए। उस शाम वह अँगूठी के भीतरी हिस्से पर हरफ़ खोद रहा था और बीच-बीच में रुककर आँख मलता था। हरफ़ छोटे थे और उन्हें भीतर की तरफ़ आना था, जहाँ पहनने वाले के सिवा कोई नहीं देखता।

बात आठ दिन पहले शुरू हुई थी।

बादशाह उस दिन बुरे मन में थे। सुबह ख़बर आई थी कि गुजरात की तरफ़ से आ रहा एक क़ाफ़िला लूट लिया गया है और उसमें अठारह आदमी मारे गए हैं। दोपहर तक वे किसी से बात नहीं कर रहे थे। शाम को उन्होंने दरबार में एक अजीब चीज़ माँगी।

"मुझे ऐसी कोई चीज़ चाहिए जो मैं ख़ुश हूँ तो मुझे उदास कर दे, और दुखी हूँ तो सहारा बन जाए। एक ही चीज़। दो नहीं।"

कुछ दिन तक चीज़ें आती रहीं। एक दरबारी आईना लाया और कहा कि आदमी अपना चेहरा देख ले तो दोनों काम हो जाते हैं। बादशाह ने आईना लौटा दिया। कोई एक क़सीदा लिखवा लाया जिसकी पहली छह पंक्तियाँ ख़ुशी की थीं और आख़िरी छह ग़म की। उन्होंने वह भी लौटा दिया और कहा कि यह दो चीज़ें हैं जिन्हें एक काग़ज़ पर रख दिया गया है।

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आठवें दिन बीरबल आए और उन्होंने मेज़ पर एक अँगूठी रखी। सोने की, सादी, बिना नग की।

बादशाह ने उसे उठाया और उलट-पुलट कर देखा। "इसमें क्या है?" "भीतर देखिए, जहाँपनाह।"

भीतर की तरफ़ चार लफ़्ज़ खुदे थे। बादशाह ने उन्हें पढ़ा और अँगूठी वापस मेज़ पर रख दी।

"बस?" "जी।" "आठ दिन में तुम चार लफ़्ज़ लाए हो।" "आठ दिन इसी में लगे कि चार से ज़्यादा न हों, जहाँपनाह।"

बादशाह ने वह अँगूठी उस दिन पहन तो ली, पर उनके चेहरे से साफ़ था कि उन्हें ठगा हुआ महसूस हो रहा है। रघुनाथ को उसके पैसे मिल गए, पूरे और वक़्त पर, और उससे किसी ने यह नहीं कहा कि वे हरफ़ किसके लिए खोदे गए थे। उसने पूछा भी नहीं।

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उसके बाद चार महीने तक कुछ नहीं हुआ।

फिर सावन में ख़बर आई कि दक्खिन की मुहिम जीत ली गई है और जिस क़िले को छह महीने से घेरा हुआ था वह बिना लड़े खुल गया है। उस रात दरबार में रोशनी हुई, तानसेन ने गाया, और आँगन में लोग सुबह तक बैठे रहे। बादशाह उस रात सबसे ज़्यादा बोले जितना वे बरसों में नहीं बोले थे।

आधी रात के बाद वे बरामदे में अकेले खड़े थे और उन्होंने अपनी अँगूठी घुमाकर भीतर की तरफ़ देखी।

सुबह उन्होंने बीरबल से कहा कि रात एक घड़ी ऐसी आई जब उन्हें वह जीत छोटी लगने लगी। "तो चीज़ ने अपना आधा काम कर दिया, जहाँपनाह।" "आधा ही किया। और वह हिस्सा मुझे पसंद नहीं आया।" "दूसरा हिस्सा माँगने की नौबत न आए, यही अच्छा है।"

नौबत अगले जाड़े में आई।

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बख़्शी उनतालीस बरस से बादशाह के साथ था। वह शिकार पर साथ जाता था, कपड़े रखता था, और वही एक आदमी था जो बिना पूछे कमरे में चला आता था। जाड़े में उसे बुख़ार हुआ और सत्रह दिन रहा। अठारहवें दिन सुबह उसकी साँस चली गई।

बख़्शी के बारे में कहने को ज़्यादा कुछ नहीं था और शायद इसीलिए वह इतने बरस टिका। वह कम बोलता था, हिसाब का पक्का नहीं था, और उसे कोई ओहदा कभी नहीं दिया गया। उसे इतना मालूम था कि बादशाह किस दिन कौन सा रंग नहीं पहनेंगे, किस मौसम में उन्हें कमरे में अंगीठी नहीं चाहिए, और खाने के बाद पानी कितना ठंडा। यह सब उसने किसी से पूछकर नहीं सीखा था और किसी को बताया भी नहीं था, इसलिए उसके जाने के बाद यह सब दोबारा से सीखा जाना था।

बादशाह उस दिन दरबार में नहीं आए। दूसरे दिन भी नहीं आए। तीसरे दिन आए और बैठे रहे और किसी काम पर हुक्म नहीं दिया।

बीरबल उस पूरे वक़्त कुछ नहीं बोले। वे रोज़ आते, अपनी जगह खड़े रहते, और चले जाते।

चौथे दिन शाम को बादशाह ने उन्हें बुलाया और अपना हाथ आगे कर दिया। अँगूठी उँगली में थी और वह घुमी हुई थी, हरफ़ों वाला हिस्सा बाहर की तरफ़। "तीन दिन से इसी तरफ़ है।" "मैंने देख लिया था, जहाँपनाह।" "तुमने कहा क्यों नहीं?" "जो चीज़ काम कर रही हो उसके बारे में बोलने से वह छोटी हो जाती है।"

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उसके बाद बादशाह ने काम पर हुक्म देना शुरू कर दिया। बख़्शी की जगह किसी और को नहीं दी गई और वह काम आपस में बँट गया, जो सबको मालूम था और किसी ने कहा नहीं।

बरसों बाद एक सुनार ने वे हरफ़ दोबारा गहरे खोदने की पेशकश की, क्योंकि उँगली में घूमते रहने से वे घिस चुके थे और उन्हें पढ़ने के लिए रोशनी के सामने ले जाना पड़ता था। बादशाह ने मना कर दिया। वह अँगूठी उसी तरह घिसी हुई रही और आख़िर तक उसी उँगली में रही।