बीजापुर से आया दूत शहाबुद्दीन तीसरे दिन भी उसी जगह बैठा था, दीवान-ए-आम के बाएँ खंभे के पास। वह बहुत कम बोलता था, और जब बोलता था तो हँसकर बोलता था, जिससे बात की धार देर से महसूस होती थी। उस दोपहर उसने कहा कि हिंदुस्तान के दरबार में जवाब बहुत अच्छे मिलते हैं, बशर्ते सवाल पहले से मालूम हो। बात हँसी में कही गई थी।

बादशाह अकबर ने प्याला रकाबी पर रखा और कुछ देर ख़ामोशी रही। बीरबल का नाम लेकर उन्होंने पूछा कि आगरा में कुल कितने कौवे हैं। दरबार में कोई हिला नहीं। सवाल हँसी में पूछा गया था, पर पूछा भरे दरबार में गया था, और यह फ़र्क़ वहाँ बैठे हर आदमी ने समझ लिया।

बीरबल ने कहा कि कल दोपहर तक बता देंगे। शहाबुद्दीन ने कहा कि गिनती जो भी निकले, वह उसे अपने दरबार तक ज़रूर ले जाएगा। बादशाह हँसे, और बीरबल उठकर चले गए।

एक तरकीब

उस दिन वे दरबार से सीधे घर नहीं गए। वे अनाज मंडी की तरफ़ निकले, फिर कसाइयों की गली से होते हुए जमुना के घाट तक। जेठ की धूप में छतें तप रही थीं। कौवे मुंडेरों की छाँव में बैठे थे, चोंच खोले, ज़बान बाहर निकाले। घाट पर धोबियों के पास वे ज़्यादा थे और मंडी के पीछे उससे भी ज़्यादा। बीरबल कहीं रुके नहीं, बस देखते हुए चलते रहे।

शाम को वे क़िले के बाहरी सहन में पहुँचकर एक किनारे खड़े हो गए। वहाँ एक बूढ़ा आदमी झाड़ू लगा रहा था, धीरे-धीरे, जैसे उसे कहीं पहुँचना न हो। उसका नाम मलूक था और वह चालीस बरस से वही सहन बुहार रहा था। रोज़ शाम बुहारने के बाद वह किनारे की मुंडेर पर मुट्ठी भर दाना डालता था, और दाना डालते ही सहन काला हो जाता था।

📚 यह भी पढ़ें बैंगन की तारीफ़
बैंगन की तारीफ़ एक शाम बैंगन सब्ज़ियों का बादशाह था और दस दिन बाद काँटा। पढ़ें 'बैंगन की तारीफ़', जिसमें जोरावर के एक जवाब पर पूरा दरबार हँसा और बीरबल चुप रह गए।

"कितने आते हैं?" बीरबल ने पूछा। मलूक ने झाड़ू नहीं रोकी। "गिने नहीं कभी। पर जेठ में ज़्यादा आते हैं, सावन में कम।" "क्यों?" "बरसात में गाँवों में खाने को हो जाता है, तो ये उधर चले जाते हैं।"

बीरबल ने अगला सवाल तुरंत नहीं किया। थोड़ी देर बाद उन्होंने पूछा कि क्या ये सब आगरा के ही हैं। मलूक हँस पड़ा। "कहाँ साहब। फ़सल कटती है तो आस-पास के गाँवों से भी चले आते हैं। हफ़्ता-दस दिन रहते हैं, फिर लौट जाते हैं। कौन किसका है, यह तो इनकी माँ भी न बता पाए।"

बीरबल मुंडेर के पास बैठ गए और शाम ढलने तक बैठे रहे। नौबतख़ाने का पहला डंका पड़ा और सारे कौवे एक साथ उठे, जिससे हवा में एक पल के लिए अँधेरा हो गया। मलूक ने ऊपर नहीं देखा। वह चालीस बरस से यही देख रहा था।

आख़िरी दलील

रात को क़िले में इसी बात की चर्चा रही और कुछ लोगों ने आपस में शर्तें भी लगा लीं। एक नौजवान मुंशी बीरबल के घर तक आया और बोला कि वह हर मोहल्ले के लिए अलग काग़ज़ बनवा देगा, हर काग़ज़ पर दो आदमी लगवा देगा, और भोर तक गिनती हो जाएगी। बीरबल ने उसे शरबत पिलाया और घर भेज दिया। काग़ज़ नहीं बना।

अगले दिन दोपहर के दरबार में बीरबल ने बिना किसी भूमिका के कहा, "उन्नीस हज़ार नौ सौ चौबीस, जहाँपनाह।" बादशाह ने भौंह उठाकर पूछा, "इतने ठीक-ठीक?" "जी।"

📚 यह भी पढ़ें छोटी लकीर
छोटी लकीर काशी से आए एक पंडित ने दरबार के सामने लकीर खींची और कहा कि इसे छुए बिना छोटा कर दीजिए। पढ़ें 'छोटी लकीर', और वह जवाब जो तीन दिन में किसी को नहीं सूझा।

शहाबुद्दीन आगे बढ़ा और उसने बताया कि रात ही उसने अपने दो आदमियों को क़िले की दीवारों और आस-पास की छतों पर बिठा दिया था। भोर तक उन्होंने गिना, और गिनती इक्कीस हज़ार से ऊपर निकली। "आपकी संख्या कम है, बीरबल साहब।"

बीरबल के चेहरे पर कोई हैरानी नहीं आई। उन्हें इसी का इंतज़ार था। "जो ज़्यादा निकले हैं, वे मेहमान हैं। आस-पास के गाँवों में फ़सल कट रही है और रिश्तेदार शहर आए हुए हैं, हफ़्ता-दस दिन में लौट जाएँगे। आप सावन में गिनवाइएगा। तब मेरी संख्या से कम निकलेंगे, क्योंकि तब हमारे वाले उधर गए होंगे।"

दरबार देर तक हँसता रहा। शहाबुद्दीन भी हँसा, पर उसकी हँसी आँखों तक नहीं पहुँची। उसने दो बार कुछ कहने के लिए मुँह खोला और दोनों बार बंद कर लिया। फिर वह अपनी जगह लौट गया और उस दिन दोबारा नहीं बोला।

दरबार उठने के बाद बादशाह ने बीरबल को रोका। "सच बताओ, गिने कैसे?" "गिने नहीं, जहाँपनाह।" "तो?" "एक आदमी से पूछा जो चालीस बरस से उन्हें देख रहा है। उसने कोई संख्या नहीं बताई, बस इतना बताया कि ये आते-जाते रहते हैं और कौन किसका है यह कोई नहीं जानता। संख्या मैंने ख़ुद रख दी।"

"और अगर वह गिनकर बता देता?" "तो मैं आज मुश्किल में होता, जहाँपनाह। जो आदमी संख्या बता देता है, उससे संख्या माँगी जा सकती है।" बादशाह देर तक उन्हें देखते रहे। आख़िर में उन्होंने पूछा कि वह आदमी कौन है, और बीरबल ने नाम बता दिया, साथ में यह भी कि वह हर शाम बाहरी सहन बुहारता है।

📚 यह भी पढ़ें कुएँ का सौदा
कुएँ का सौदा चालीस रुपये में कुआँ बिका, फिर बेचने वाला बोला कि पानी नहीं बेचा। पढ़ें 'कुएँ का सौदा', जिसमें बीरबल ने उसी कागज़ के शब्दों से पूरा दावा उलट दिया।

तीन दिन बाद शहाबुद्दीन बीजापुर लौट गया। जाते हुए उसने बीरबल से हाथ मिलाया और कहा कि वह गिनती सचमुच अपने दरबार तक ले जाएगा। बीरबल ने कहा कि ले जाइए, पर सावन का हिस्सा भी साथ ले जाइएगा, वरना आधी बात रह जाएगी।

उस शाम मलूक ने रोज़ की तरह सहन बुहारा। कोने में पत्ते जमा किए, बोरी में भरे, और मुंडेर पर मुट्ठी भर दाना डाल दिया। सहन काला हुआ, फिर नौबत का पहला डंका पड़ा और सब एक साथ उठ गए। मलूक ने झाड़ू दीवार से टिकाई और घर चल दिया। दरबार में क्या हुआ था, इसकी ख़बर उस सहन तक कभी नहीं पहुँची।