छेदी ने बाल्टी कुएँ में डाली ही थी कि जगतपाल ने रस्सी पकड़ ली। "पानी मत निकालना," उसने कहा। छेदी हँसा, क्योंकि उसे लगा कि मज़ाक है। जगतपाल का चेहरा वैसा ही रहा।
जेठ का महीना था और उस साल गर्मी ने गाँव की कमर तोड़ दी थी। पोखर सूख चुका था और उसकी तली में पड़ी दरारें इतनी चौड़ी हो गई थीं कि उनमें बच्चों के पैर फँस जाते थे। हैंडपंप से दिन में दो बार हवा निकलती थी और पानी एक बार। पूरे गाँव में तीन कुएँ बचे थे जिनमें पानी था, और उनमें से एक यही था।
यह कुआँ छेदी ने दो महीने पहले जगतपाल से चालीस रुपये में खरीदा था। पैसे उसने साहूकार से उधार लिए थे। कागज़ लिखा गया था, दो गवाहों के अँगूठे लगे थे, और उसमें साफ़ लिखा था कि जगतपाल अपना कुआँ छेदी को बेचता है।
बादशाह का हुक्म
"कुआँ बेचा था," जगतपाल ने कहा। "पानी कब बेचा था? कागज़ में पानी लिखा है क्या? कुआँ तुम्हारा, पानी मेरा। पानी चाहिए तो अलग से बात करो।"
छेदी के चार बीघे में उस वक़्त बाजरा खड़ा था। तीन दिन पानी न मिले तो वह पीला पड़ने लगता, और एक बार पीला पड़ जाने के बाद उसे वापस लाने का कोई तरीक़ा किसी को नहीं आता था। छेदी ने जगतपाल से बहुत देर बात की, फिर हाथ जोड़े, फिर आवाज़ ऊँची की। जगतपाल ने कागज़ की तह खोली और उसे पढ़कर सुना दिया।
पंचायत बैठी। सरपंच ने कागज़ पढ़ा, फिर दुबारा पढ़ा। कागज़ में सचमुच सिर्फ़ कुआँ लिखा था। पंचों में से दो जगतपाल के खेत जोतते थे और उनका बोलना या न बोलना उसी खेत से तय होता था। बात दो घंटे चली और वहीं ख़त्म हो गई जहाँ से शुरू हुई थी।
उस रात छेदी की घरवाली ने अपनी पायल उतारकर उसके सामने रख दी। छेदी ने बहुत देर तक उसे नहीं उठाया। अगली सुबह उसने पायल बेची, उसमें से कुछ पैसे एक लिखने वाले को दिए, और अर्ज़ी लिखवाकर आगरा की तरफ़ चल पड़ा।
अर्ज़ी चार दिन में सही जगह पहुँच गई और मामला बीरबल के पास आया। दोनों को बुलावा गया। जगतपाल तैयार होकर आया। उसने अच्छा कुर्ता पहना था और कागज़ को कपड़े में लपेटकर सीने से लगा रखा था।
सबके सामने
बीरबल ने कागज़ माँगा और उसे धीरे-धीरे पढ़ा। फिर उन्होंने जगतपाल की तरफ़ देखा। "तुमने कुआँ बेचा।" "जी हुज़ूर।" "पानी नहीं बेचा।" "बिल्कुल नहीं, हुज़ूर। पानी मेरा है।"
बीरबल ने सिर हिलाया, जैसे बात समझ में आ गई हो। जगतपाल ने पीछे खड़े आदमियों की तरफ़ देखा और उसकी गर्दन थोड़ी और सीधी हो गई।
"तो फिर एक बात बताओ," बीरबल ने कहा। "जब कुआँ छेदी का है, तो तुम्हारा पानी उसके कुएँ में क्यों पड़ा है? दो महीने से तुम अपना माल दूसरे आदमी की जगह में रखे हुए हो। या तो बिक्री के दिन से आज तक का किराया चुका दो, या अपना पानी आज ही उठा ले जाओ।"
जगतपाल के चेहरे पर कुछ देर तक कोई भाव नहीं आया। फिर वह हिसाब लगाने लगा। दो महीने का किराया कितना होगा, यह उसे नहीं पता था, मगर इतना पता था कि चालीस रुपये से बहुत ज़्यादा होगा और उसकी वसूली उसी कागज़ के सहारे होगी जिसे वह चार दिन से सीने से लगाए घूम रहा था। पानी उठाकर ले जाने का कोई तरीक़ा उसके पास नहीं था।
उसने कहा कि वह अपना दावा छोड़ता है। बीरबल ने उससे यह बात कागज़ पर लिखवाई और उसी के अँगूठे का निशान लगवाया। छेदी वहीं खड़ा रहा और उसे समझ नहीं आया कि यह सब इतनी जल्दी कैसे हो गया।
बादशाह को यह बात शाम को बताई गई और वे देर तक हँसते रहे। फिर उन्होंने पूछा कि किसान को उसका पानी मिल गया या नहीं। जब उन्हें बताया गया कि मिल गया, तो उन्होंने बात वहीं छोड़ दी और किसी को कोई सज़ा देने का हुक्म नहीं दिया, क्योंकि जिस आदमी से उसका अपना कागज़ छीन लिया गया हो, उसके लिए इतना काफ़ी होता है।
छेदी गाँव लौटा तो दोपहर हो चुकी थी। उसने सबसे पहले बाल्टी कुएँ में डाली और चार बीघे में जितना पानी उस दिन दिया जा सकता था, उतना दिया। शाम तक उसकी हथेलियों में रस्सी के निशान पड़ चुके थे और वह उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा था। बाजरा बच गया। पायल वापस नहीं आई।
जगतपाल ने उसके बाद कभी कुएँ की तरफ़ नहीं देखा। गाँव के लोग महीनों तक यह बात दोहराते रहे, और हर बार कहानी थोड़ी और बड़ी होती गई, जब तक कि उसमें एक ऐसा जवाब न जुड़ गया जो बीरबल ने कभी दिया ही नहीं था।
आषाढ़ में बारिश आई और कुआँ अपने आप ऊपर तक भर गया, जैसे उस पूरे झगड़े से उसका कोई लेना-देना ही न हो। छेदी की लड़की अब वहीं से पानी भरती है और रस्सी वही पुरानी है, जो बीच में से घिसकर पतली हो चुकी है। चालीस रुपये वाला कागज़ छेदी ने एक टीन की डिबिया में तह करके रखा है और आज तक फेंका नहीं है।