चेतन सुबह चार बजे से चौक बुहारता था और उस दिन उसे कूड़े के ढेर के पास से कपड़े की एक थैली मिली। वह पुरानी थी, उसका मुँह दोहरी गाँठ से बँधा था, और वह भारी थी।
उसने उसे खोला नहीं। उसने उसे अपनी झाड़ू के साथ बग़ल में दबाया और सीधे कोतवाली चला गया, जो वहाँ से आधा कोस था, और वहाँ पहुँचकर उसने तख़्ते पर रख दी।
मुंशी ने उसके सामने खोली। उसमें अड़तालीस रुपये थे, चाँदी की दो चूड़ियाँ थीं, और एक चाबी थी।
यह ख़बर उसी दिन फैल गई।
अगले दिन तक चार आदमी दावा करने आ चुके थे और तीसरे दिन तक नौ। हर आदमी के पास एक कहानी थी और हर कहानी में थैली उसी दिन, उसी रास्ते पर गिरी थी।
मुंशी ने सबको लौटा दिया, क्योंकि पहचान का कोई तरीक़ा उसके पास नहीं था। चौथे दिन मामला ऊपर भेज दिया गया।
बीरबल ने थैली देखी, चाबी देखी, चूड़ियाँ देखीं, और मुनादी करवाने का हुक्म दिया।
मुनादी में कहा गया कि चौक में एक थैली मिली है जिसमें पैंसठ रुपये और कुछ गहना है। जिसका हो वह कचहरी आकर बता दे कि उसमें क्या-क्या था, और थैली उसे लौटा दी जाएगी।
बरकत ने पूछा कि पैंसठ क्यों लिखवाया जा रहा है जबकि अड़तालीस हैं।
"इसीलिए," बीरबल ने कहा।
मुनादी के बाद ग्यारह लोग आए।
हर आदमी को अलग कमरे में बुलाया गया और उससे कहा गया कि वह अपनी थैली का हाल बताए। किसी से जिरह नहीं की गई। बरकत सिर्फ़ लिखता रहा और बीरबल सुनते रहे, और किसी को यह नहीं बताया गया कि वह सही है या ग़लत। सब बाहर निकलकर इसी उम्मीद में बैठे रहे कि शाम तक नाम पुकारा जाएगा।
पहला आया और उसने कहा कि थैली में पैंसठ रुपये थे। दूसरे ने कहा कि पैंसठ रुपये और एक जोड़ी चूड़ी। तीसरे ने चूड़ियों के साथ एक अँगूठी भी जोड़ दी, क्योंकि मुनादी में सिर्फ़ गहना कहा गया था और उसने अंदाज़ा लगाया।
बिस्मिल्ला सातवें नंबर पर आया और उसने सबसे तफ़सील से बताया। पैंसठ रुपये, जिनमें से चालीस उसने पिछले हफ़्ते बेचे गए बैल के थे, और चूड़ियाँ उसकी बीवी की। उसने चूड़ियों का वज़न भी बता दिया।
वज़न ग़लत नहीं था। बाक़ी सब ग़लत था।
बिस्मिल्ला के बारे में बाद में यह पता चला कि उसने सचमुच पिछले हफ़्ते बैल बेचा था और उसकी बीवी की चूड़ियाँ सचमुच उसी वज़न की थीं। उसने अपनी ही ज़िंदगी की सच्ची बातें उठाकर एक झूठी थैली में भर दी थीं, और यही वजह थी कि उसकी बात सबसे भरोसे लायक़ लगी। जो आदमी झूठ में जितनी सच्चाई मिलाता है, उसे पकड़ने के लिए उतनी ही बारीक चीज़ चाहिए।
ग्यारहवें दिन तक अनवारी नहीं आई थी।
वह पंद्रहवें दिन आई और वह दावा करने नहीं आई थी। वह यह पूछने आई थी कि क्या किसी को कहीं एक चाबी मिली है, क्योंकि उसके घर के संदूक़ की चाबी खो गई है और ताला तोड़ने में दो रुपये लगेंगे जो उसके पास नहीं हैं।
मुंशी ने उससे पूछा कि चाबी के साथ और कुछ था।
उसने कहा कि थैली थी।
"कितना था उसमें?" "अड़तालीस रुपये।" "मुनादी में पैंसठ कहा गया था।" "तो वह मेरी नहीं होगी।" और वह जाने के लिए मुड़ गई।
उसे रोका गया।
अनवारी नौ बरस पहले विधवा हुई थी और उसके दो लड़के थे। अड़तालीस रुपये उसने दो बरस में जोड़े थे और उन्हें वह बड़े लड़के के लिए रख रही थी, जो चमड़े का काम सीख रहा था और जिसे अपना औज़ार ख़रीदना था। चूड़ियाँ उसकी अपनी थीं और वह उन्हें पहनती नहीं थी।
थैली उसे लौटा दी गई। उसने उसे खोलकर गिना नहीं।
बीरबल ने उससे पूछा कि वह गिनती क्यों नहीं कर रही। उसने कहा कि गिनने से क्या होगा, जो कम होगा वह कम ही रहेगा। यह उसने शिकायत की तरह नहीं कहा। फिर उसने पूछा कि थैली किसे मिली थी, और जब चेतन को बुलाया गया तो उसने उसे पहचाना नहीं, क्योंकि उसने उसे कभी देखा नहीं था। वह सुबह चार बजे काम पर होता था और वह उस वक़्त सोती थी।
बिस्मिल्ला और बाक़ी दसों पर मुक़दमा नहीं चला। बीरबल ने कहा कि जो आदमी झूठ बोलकर पैसा लेने आया था वह ले नहीं पाया, और इससे ज़्यादा वक़्त उन पर ख़र्च करने से किसी का भला नहीं होगा। उनके नाम कोतवाली में लिख ज़रूर लिए गए।
चेतन को इनाम में पाँच रुपये मिले। उसने पूछा कि यह किस बात के हैं, और जब उसे बताया गया तो उसने कहा कि थैली उठाकर सीधे चलने में उसे कोई मेहनत नहीं लगी थी।
मुनादी के उस तरीक़े को उसके बाद कोतवाली ने अपना लिया। खोई हुई चीज़ का ऐलान करते वक़्त उसमें एक बात हमेशा ग़लत रखी जाने लगी, और वह कौन सी है यह सिर्फ़ मुंशी को मालूम होता था।
चाबी अनवारी ने संदूक़ में ही लगी रहने दी और उसे निकालना बंद कर दिया। ताला तोड़ने के दो रुपये उसने बचा लिए और वे भी उसी थैली में चले गए।