ढोल चबूतरे पर बँधा रहता था और उसे बजाने का एक ही मतलब होता था। ख़तरा। आग, चोर, या पानी।
जो सुनता वह उठता और चबूतरे की तरफ़ भागता। यह इंतज़ाम उस गाँव में साठ बरस से चल रहा था और उसमें कभी कोई दिक़्क़त नहीं आई थी।
रुस्तम अस्सी के आसपास का था और उसकी आँखें कमज़ोर हो चुकी थीं। वह चबूतरे के बग़ल वाले घर में अकेला रहता था और रात में उसकी नींद टुकड़ों में आती थी।
पहली बार उसने ढोल तब बजाया जब उसे लगा कि पीछे वाले बाड़े में कोई है। लोग आए। वहाँ एक कुत्ता था।
किसी ने बुरा नहीं माना। दूसरी बार भी नहीं माना। तीसरी बार दो-चार लोगों ने मुँह बनाया।
छह महीने में ढोल सत्रह बार बजा और सत्रहों बार कुछ नहीं निकला।
गाँव ने इसे रोकने की कोशिश की और तीनों कोशिशें नाकाम रहीं। पहले दो आदमी उससे बात करने गए और उसने कहा कि वह ग़लत बजाना बंद कर देगा, और वह ग़लत बजा ही नहीं रहा था, इसलिए इस वादे का कोई मतलब नहीं था। फिर किसी ने रात में डंडियाँ छिपा दीं और उसने ढोल हाथ से बजा दिया। फिर उससे कहा गया कि वह पहले किसी को जगा ले, और उसका घर चबूतरे से सटा था, बाक़ी घर दूर थे।
बारहवीं बार के बाद लोग उठना बंद कर चुके थे। पंद्रहवीं बार सिर्फ़ तीन आदमी आए। सत्रहवीं बार कोई नहीं आया और रुस्तम आधे घंटे अकेला बजाता रहा।
उन्नीसवीं रात को घूरे के पास सचमुच आग लगी।
हवा उस रात पश्चिम से थी और उधर तीन घर फूस के थे। रुस्तम ने ढोल बजाया, उसी तरह बजाया, और कोई नहीं उठा।
आग एक घर तक पहुँची। उसमें एक बुढ़िया और उसका पोता सो रहे थे। दोनों बच गए क्योंकि पोते की नींद खुल गई, और यह इत्तिफ़ाक़ था, इंतज़ाम नहीं।
घर जल गया। अनाज जल गया। एक बकरी मर गई।
सुबह गाँव में जो झगड़ा हुआ उसमें दो तरफ़ बन गईं। एक तरफ़ के लोग कहते थे कि रुस्तम से ढोल छीन लिया जाए। दूसरी तरफ़ के लोग कहते थे कि उसने तो बजाया था, क़ुसूर उनका है जो नहीं उठे।
दोनों बातें सही थीं और इसीलिए फ़ैसला नहीं हो रहा था।
मामला आगरा गया क्योंकि जला हुआ घर लगान वाली ज़मीन पर था और उसकी माफ़ी की दरख़्वास्त देनी थी। बीरबल उस दरख़्वास्त के साथ आए।
वे पहले जले हुए घर के पास गए और वहाँ आधा घंटा खड़े रहे। दीवार की एक तरफ़ फूस का ढाँचा अब भी काला खड़ा था और दूसरी तरफ़ की मिट्टी दरक गई थी। बुढ़िया वहीं बैठी थी और उसके पास वह पीतल का लोटा रखा था जो आग में से निकल आया था, काला पड़ा हुआ, और वही उस घर में से बचा था।
उन्होंने रुस्तम से बात की। उन्होंने उससे यह नहीं पूछा कि उसने झूठा ढोल क्यों बजाया, क्योंकि उसने झूठा नहीं बजाया था। हर बार उसे सचमुच लगा था कि कुछ है।
"आप देख नहीं पाते।" "पहले देखता था।" "और सुन लेते हैं।" "सुनने में कुछ नहीं गया, हुज़ूर। सुनने में सब आता है। कौन सी आवाज़ किस चीज़ की है, यही गड़बड़ हो गया है।"
बीरबल ने ढोल नहीं छीना। उन्होंने रुस्तम से यह भी नहीं कहा कि वह कम बजाया करे, क्योंकि इससे अगली बार उसका हाथ रुक सकता था और अगली बार सचमुच आग हो सकती थी।
उन्होंने दो चीज़ें बदलीं और दोनों छोटी थीं।
पहली यह कि ढोल दो तरह से बजेगा। जो आदमी ख़तरा देखे, वह पहले रुककर तीन धीमी चोट मारेगा और फिर तेज़ बजाएगा। तीन धीमी चोट का मतलब है कि बजाने वाले ने ख़ुद देखा है। जो सिर्फ़ तेज़ बजे उसका मतलब है कि किसी को शक है।
दूसरी यह कि रात में चबूतरे पर एक और आदमी बैठेगा, बारी-बारी से, हर घर से एक रात। उसका काम सिर्फ़ इतना है कि जब रुस्तम उठे तो वह उसके साथ जाकर देख आए।
गाँव के कुछ लोगों ने कहा कि यह उनके सिर पर एक और काम डाल दिया गया।
"साठ बरस तक तुम्हें कुछ नहीं करना पड़ा," बीरबल ने कहा। "क्योंकि साठ बरस तक कोई ऐसा नहीं था जिसे कम दिखता हो। अब है। इंतज़ाम आदमी के हिसाब से बदलता है, आदमी इंतज़ाम के हिसाब से नहीं बदल जाता।"
जले हुए घर का लगान उस बरस माफ़ हुआ और उसे दोबारा बनवाने में गाँव लगा, क्योंकि ढोल तो सबका था।
उसके बाद के डेढ़ बरस में ढोल नौ बार बजा। छह बार तीन धीमी चोट के साथ और उन छहों में सचमुच कुछ था। तीन बार बिना धीमी चोट के, और उन तीनों में कुछ नहीं निकला, और उन तीनों बार लोग फिर भी उठे, क्योंकि उठने में अब पहले जितना ग़ुस्सा नहीं आता था।
रुस्तम दो बरस और जिया। उसके बाद ढोल चबूतरे पर वैसे ही बँधा रहा और तीन धीमी चोट वाला क़ायदा चलता रहा, हालाँकि गाँव में अब कोई ऐसा नहीं था जिसे कम दिखता हो।