भगौती की झोंपड़ी रास्ते पर थी और यह बात सब जानते थे।
रास्ता गाँव के भीतर से निकलकर सड़क तक जाता था और उस पर बैलगाड़ी निकलती थी। भगौती ने अपनी झोंपड़ी उसके एक किनारे पर बनाई थी, चार बरस पहले, जब उसका आदमी मरा और उसकी ससुराल ने उसे निकाल दिया।
उसने किसी की ज़मीन नहीं ली थी। रास्ता किसी का नहीं था। इसीलिए वह ले पाई।
पहले साल किसी को कुछ नहीं लगा। झोंपड़ी छोटी थी और गाड़ी बग़ल से निकल जाती थी। दूसरे साल उसने पीछे की तरफ़ एक कोठरी बढ़ाई क्योंकि बकरियाँ आ गई थीं। तीसरे साल आगे एक छप्पर डाला ताकि बरसात में चूल्हा भीग न जाए।
चौथे साल गाड़ी नहीं निकलती थी।
यह एक दिन में नहीं हुआ। पहले गाड़ी रगड़ खाकर निकलने लगी। फिर बैल अड़ने लगे। फिर गाड़ीवान ख़ुद ही घूमकर जाने लगे, क्योंकि झगड़ा करने में जितना वक़्त लगता उतने में नाला पार हो जाता। किसी ने भगौती से कुछ नहीं कहा। कहने का मौक़ा हर साल था और हर साल वह मौक़ा निकल गया, क्योंकि कहने वाले को अकेले कहना पड़ता और सुनने वाली अकेली औरत थी।
यह बात तब तक किसी के लिए ज़्यादा बड़ी नहीं थी, क्योंकि गाड़ी वाले घूमकर नाले के रास्ते चले जाते थे, जो आधा कोस लंबा पड़ता था और बरसात में बंद रहता था।
फिर वह हुआ जिसकी वजह से मामला बाहर गया।
गाँव के एक आदमी को रात में साँप ने काटा और उसे सड़क तक ले जाना था, जहाँ से इक्का मिलता। गाड़ी भीतर तक नहीं आ सकी। उसे चारपाई पर उठाकर नाले के रास्ते ले जाया गया और उसमें जो वक़्त लगा उसका हिसाब किसी ने नहीं रखा। आदमी बच गया, पर उसका पैर काटना पड़ा।
पंचायत बैठी। फ़ैसला भगौती के हक़ में गया।
यह हैरत की बात नहीं थी। पूरा गाँव उसके साथ था। वह अकेली औरत थी, उसने चोरी नहीं की थी, और जिस ज़मीन पर वह बैठी थी वह किसी की नहीं थी। जिस आदमी का पैर गया उसने भी कहा कि वह भगौती को नहीं हटवाना चाहता।
इलाही, जो गाँव का मुखिया था, यह फ़ैसला लेकर आगरा गया, इस उम्मीद में कि उस पर मुहर लग जाएगी।
बीरबल गाँव आए और उन्होंने रास्ता देखा। उन्होंने दोनों सिरे नापे। उन्होंने नाले वाला रास्ता भी चलकर देखा, पूरा, और उसमें उन्हें एक घंटा दस मिनट लगे।
फिर उन्होंने भगौती से बात की और उसकी बात पूरी सुनी। उसमें कुछ भी झूठ नहीं था।
फ़ैसला उन्होंने उसके ख़िलाफ़ दिया।
यह सुनकर भगौती रोई नहीं। उसने सिर्फ़ इतना पूछा कि कब तक हटना है। बताया गया कि असाढ़ से पहले। उसने पूछा कि बकरियाँ कहाँ बाँधेगी। इसका जवाब उस वक़्त किसी के पास नहीं था और बीरबल ने यह कह भी दिया, कि जवाब नहीं है, और वे उसे ढूँढ़कर ही जाएँगे।
गाँव में इस पर नाराज़गी हुई और इलाही ने कहा कि यह इंसाफ़ नहीं है, कि औरत जाएगी कहाँ, और कि गाँव को इस रास्ते से कोई तकलीफ़ नहीं है।
"गाँव को नहीं है," बीरबल ने कहा। "जो आदमी अगली बरसात में रात के दो बजे बीमार पड़ेगा, उसको होगी। वह अभी यहाँ खड़ा नहीं है और उसकी तरफ़ से बोलने कोई नहीं आया।"
इलाही ने कहा कि यह तो सिर्फ़ अंदाज़ा है। बीरबल ने सिर हिलाया।
"एक आदमी का पैर जा चुका है। वह अंदाज़ा नहीं था।"
झोंपड़ी हटाने का हुक्म हुआ और उसी हुक्म में दूसरी बात भी लिखी गई। गाँव की परती ज़मीन में से, जो लगान से बाहर थी, भगौती को उतनी ही जगह दी जाएगी जितनी वह छोड़ रही है, और वहाँ झोंपड़ी बनाने की मज़दूरी गाँव देगा, क्योंकि गाँव ने चार बरस तक उसे वहाँ बैठे रहने दिया था।
इलाही ने कहा कि गाँव यह ख़र्च क्यों उठाए।
"क्योंकि पहले साल किसी ने उससे नहीं कहा। दूसरे साल भी नहीं कहा। जब कोठरी बढ़ी तब भी नहीं कहा। चार बरस की चुप्पी की क़ीमत होती है।"
झोंपड़ी उस बरस असाढ़ से पहले हट गई। नई जगह गाँव के उत्तर में थी और वह सड़क से थोड़ी और दूर पड़ती थी, जो भगौती के लिए घाटे की बात थी और उसने यह कहा भी।
उसे सुना गया। फ़ैसला नहीं बदला।
रास्ता खुल गया और उसके बाद उस पर से गाड़ियाँ निकलती रहीं। जिस आदमी का पैर गया था वह वहीं बैठा दिखाई देता था, दोपहर में, दीवार के सहारे, और गाड़ियाँ उसके सामने से गुज़रती थीं।
उस बरसात में दो बार रात को गाड़ी भीतर तक आई। एक बार एक औरत के लिए जिसका बच्चा उलटा हो गया था, और एक बार बग़ल के गाँव के एक आदमी के लिए जो यहाँ मेहमान था और जिसकी छाती में दर्द उठा। दोनों बार लोग जुटे और दोनों बार किसी ने यह नहीं कहा कि रास्ता खुलवाने का फ़ैसला ठीक था। ऐसी बातें कही नहीं जातीं। वे बस काम कर जाती हैं।
भगौती की नई झोंपड़ी के पीछे बकरियों की कोठरी उसने पहले ही बनवा ली, दूसरे साल का इंतज़ार किए बिना, और आगे की तरफ़ छप्पर उसने कभी नहीं डाला।