दुखरन तीन दिन से रोज़ सुबह आता था और रोज़ वही बात दोहराता था। उसका माल गया था, वह वापस चाहिए था, और देने वाला गुलज़ार था।
बात इतनी थी। और उतनी ही उलझी हुई थी। कालपी से आगरा आने वाले एक क़ाफ़िले में दुखरन का माल भी लदा था। रास्ते में क़ाफ़िले पर हमला हुआ, दो गाड़ियाँ लूट ली गईं, और उनमें से एक पर दुखरन का सामान था।
गुलज़ार उस क़ाफ़िले का मालिक था। शर्त यह होती है कि जो माल क़ाफ़िले के साथ जाता है उसकी हिफ़ाज़त क़ाफ़िले वाले की होती है, और लुट जाने पर वह दाम चुकाता है। इस पर कोई झगड़ा नहीं था।
झगड़ा दाम पर था। सिर्फ़ दाम पर।
दुखरन का कहना था कि उसका नुक़सान चार सौ बीस रुपये का है। गुलज़ार का कहना था कि दुखरन ने जो सामान लदवाया था वह डेढ़ सौ से ज़्यादा का नहीं हो सकता।
रसीद बनती है, पर छोटे सौदों में नहीं बनती, और दुखरन का सौदा छोटा माना गया था।
कोतवाली ने दोनों की बात सुनी और फ़ैसला नहीं कर पाई, क्योंकि दोनों में से किसी के पास काग़ज़ नहीं था और दोनों बात पक्की करके कह रहे थे।
बीरबल ने यह मामला अपने पास रख लिया और कुछ अजीब किया। उन्होंने दुखरन से कहा कि वह अपनी पूरी बात शुरू से आख़िर तक सुनाए, और बरकत उसे लिखता जाए।
पहली बार में इक्यावन लाइनें बनीं। बरकत का हाथ दुखने लगा था।
दूसरे दिन उन्होंने उससे कहा कि वह फिर से सुनाए। दुखरन ने कहा कि कल सुना चुका हूँ। बीरबल ने कहा कि फिर सुनाओ। उसने सुनाया और बरकत ने फिर लिखा।
तीसरे दिन उन्होंने फिर सुनवाया।
दुखरन को तीसरे दिन ग़ुस्सा आ गया। उसने कहा कि वह मज़दूर आदमी है और तीन दिन से यहाँ बैठा है, कि उसका काम बंद पड़ा है, और कि अगर उसकी बात पर यक़ीन नहीं है तो साफ़ कह दिया जाए। यह सब उसने ऊँची आवाज़ में कहा। बरकत ने लिखना रोक दिया और बीरबल की तरफ़ देखा। बीरबल ने सिर हिलाकर उसे लिखते रहने को कहा और दुखरन से कुछ नहीं कहा। दुखरन बैठ गया और उसने सुनाना शुरू कर दिया।
यह देखने में बेकार की बात लगती है और गुलज़ार ने कहा भी कि इससे क्या निकलेगा। बीरबल ने उससे कहा कि वह चाहे तो वहीं बैठकर सुन सकता है, और वह बैठा रहा।
तीनों बयान लगभग एक जैसे थे। लगभग।
उनमें जो चीज़ें एक जैसी थीं वे बहुत थीं। गाड़ी का नंबर, गाड़ीवान का नाम, वह जगह जहाँ रुककर खाना खाया गया, हमला किस पहर हुआ, कितने आदमी थे, किस तरफ़ भागे। तीनों बार यह सब बिना हिचके निकला।
फ़र्क़ सिर्फ़ माल की गिनती में था।
यह फ़र्क़ छोटा था और अगर तीनों बयान अलग-अलग दिन अलग-अलग आदमियों ने सुने होते तो किसी को पकड़ में नहीं आता। एक ही आदमी के लिखे तीन काग़ज़ पास-पास रखकर पढ़ने पर वह अपने आप ऊपर आ गया। बाक़ी जगह शब्द तक वही थे। गाड़ीवान का नाम तीनों बार एक ही तरह बोला गया, आधा नाम, जैसा गाँव में बुलाते हैं।
पहली बार उसने कहा था कि उसके पास तेरह गठरी थीं। दूसरी बार सोलह। तीसरी बार उसने चौदह कहा और फिर ख़ुद ही रुककर कहा कि सोलह।
बरकत ने तीनों जगह निशान लगा दिए। तीनों एक ही लाइन पर पड़े।
"बाक़ी सब तीन बार एक जैसा है," बीरबल ने कहा। "आदमी जो देखता है वह उसके भीतर एक ही तरह जमा रहता है और तीन बार में हिलता नहीं। जो उसने बनाया है, वह हर बार नए सिरे से बनाना पड़ता है, और तीन बार में तीन तरह बनता है।"
दुखरन कुछ नहीं बोला। उसने बरकत के काग़ज़ों की तरफ़ देखा और फिर नीचे देखने लगा।
बीरबल ने उससे कहा कि वह लूट के बारे में झूठ नहीं बोल रहा, वह सचमुच लुटा है, और यह बात उन्होंने गुलज़ार के सामने कही ताकि वह सुन ले।
फिर उन्होंने पूछा कि गठरियाँ कितनी थीं।
"तेरह।" उसने यह धीरे कहा। दोहराने को नहीं कहा गया।
तेरह गठरी के हिसाब से नुक़सान दो सौ नब्बे रुपये बैठा और वह गुलज़ार से दिलवाया गया, पूरा, बिना कटौती के, क्योंकि माल की हिफ़ाज़त उसी की ज़िम्मेदारी थी।
दुखरन ने वह रक़म लेते हुए कहा कि उसने ज़्यादा इसलिए बताया था कि उसे लगा था कि जितना माँगोगे उसका आधा मिलेगा।
यह बात उसने सफ़ाई में नहीं कही, वजह की तरह कही, और वह ग़लत भी नहीं था, क्योंकि ज़्यादातर जगह यही होता है।
गुलज़ार ने उसके बाद अपने क़ाफ़िले में छोटे सौदों की भी रसीद देना शुरू कर दिया। यह उसने ईमानदारी से नहीं किया, अपने बचाव में किया, और नतीजा दोनों तरफ़ एक ही निकला।
बरकत के लिखे वे तीन काग़ज़ आपस में सिले जाकर दफ़्तर में रखे रहे। उन पर तीन जगह निशान लगे थे और तीनों निशान एक ही लाइन पर थे, और जिसने भी उन्हें बाद में देखा उसे यह समझने में कुछ पल लगे कि बाक़ी सब मिलता क्यों है।