मेहरू सात बरस की थी और उसे रंगों के नाम पूछने की आदत थी। यह उसकी माँ के लिए दिन भर की सबसे थकाने वाली चीज़ थी। दाल किस रंग की है, छत किस रंग की है, चाची की चूड़ी वाला रंग किस रंग से बनता है। रुक़य्या ज़्यादातर जवाब नहीं देती थी और मेहरू फिर भी पूछती रहती थी।
चोरी दोपहर में हुई, जब रुक़य्या पानी भरने गई थी और घर में सिर्फ़ मेहरू थी।
पीतल का बड़ा लोटा गया, दो कटोरियाँ गईं, और चौकी के नीचे कपड़े में बँधे सत्रह रुपये गए, जो रुक़य्या ने डेढ़ बरस में जोड़े थे।
मेहरू ने माँ को बताया कि एक आदमी आया था।
कोतवाली में उससे पूछा गया कि वह आदमी कौन था। उसे नहीं मालूम था। पूछा गया कि कैसा दिखता था। उसने कहा कि बड़ा था। पूछा गया कि और। उसने कहा कि उसने चौकी हटाई थी।
मुंशी ने लिखना बंद कर दिया।
यह उसने बदनीयती से नहीं किया। कचहरी में यह तय बात थी कि सात बरस के बच्चे की गवाही पर कोई मुक़दमा खड़ा नहीं होता, और इस पर बहस करने की न उसे आदत थी न फ़ुरसत।
"बच्ची है," उसने रुक़य्या से कहा। "इसकी बात पर मुक़दमा नहीं चलता।"
उसी शाम लालमन को पकड़ लिया गया। वह मोहल्ले का नहीं था, वह बाहर से आकर मस्जिद के पास रहता था और भीख माँगता था। उसे इसलिए पकड़ा गया कि वह उस दोपहर उसी गली में देखा गया था, और इसलिए भी कि उसे पकड़ने पर कोई कुछ नहीं कहता।
उससे पूछताछ हुई। पूछताछ में उसकी बाईं कलाई टूट गई और यह लिखा नहीं गया।
रुक़य्या ने तीसरे दिन आगरा जाकर दरख़्वास्त दी। वह लालमन के लिए नहीं गई थी। वह अपने सत्रह रुपये के लिए गई थी और उसका कहना यह था कि जो पकड़ा गया है उसके पास से कुछ नहीं निकला, इसलिए पैसा अब भी कहीं है।
बीरबल दो दिन बाद उस घर में आए और उन्होंने मेहरू से बात की।
उन्होंने उससे नाम नहीं पूछा। उन्होंने यह भी नहीं पूछा कि वह आदमी कैसा दिखता था।
"तुम कहाँ बैठी थीं?" उसने जगह दिखा दी। "वह कहाँ खड़ा हुआ था?" उसने वह जगह भी दिखा दी, और वह दरवाज़े के भीतर थी, चौखट से एक क़दम अंदर। "उसने किस हाथ से चौकी हटाई?" मेहरू ने अपना दाहिना हाथ उठा दिया।
"उसके हाथ किस रंग के थे?"
यह पहला सवाल था जिस पर वह ख़ुश हुई।
"नीले," उसने कहा। "यहाँ तक।" और उसने अपनी कलाई पर उँगली रखकर एक जगह दिखा दी, कलाई से थोड़ा ऊपर।
मोहल्ले में रंगरेज़ तीन थे।
दो उस दोपहर अपने कुंड पर थे और उनके साथ काम करने वाले चार आदमी यह कह सकते थे। तीसरा कादिर था, जिसका कुंड पिछले महीने से बंद पड़ा था क्योंकि उस पर उधार चढ़ गया था, और जो उस दोपहर कहीं नहीं था।
तीनों रंगरेज़ों तक पहुँचने में एक दिन लगा और यह काम आसान नहीं था, क्योंकि पूछने पर हर आदमी पहले यह पूछता था कि क्यों पूछा जा रहा है। पहले दोनों के साथ काम करने वाले चार आदमी अलग-अलग बुलाए गए और चारों ने बिना एक-दूसरे से मिले वही बात कही, कि दोनों उस्ताद दोपहर भर कुंड पर थे और उस दिन नीले का बड़ा भरा हुआ था इसलिए कोई उठकर जा भी नहीं सकता था।
बीरबल ने कोतवाल से कहा कि पकड़ने से पहले चौखट देखी जाए।
चौखट के भीतर वाले किनारे पर, ज़मीन से चार हाथ ऊपर, नीले रंग का एक हल्का निशान था। वह अँगूठे के बराबर था और उसे इससे पहले किसी ने नहीं देखा था, क्योंकि उसे देखने के लिए यह जानना ज़रूरी था कि उसे ढूँढ़ना है।
लोटा और कटोरियाँ बरामद हुए। रुपये में से नौ बचे थे।
कादिर ने पहले मना किया और फिर मान लिया, इसलिए नहीं कि उसके पास सफ़ाई नहीं थी, बल्कि इसलिए कि लोटा उसकी अपनी कोठरी की छत पर मिला, कपड़े में लपेटकर रखा हुआ। उसने कहा कि उसका कुंड बंद है और उधार वाले उसके घर के बाहर बैठने लगे थे, और यह बात सच थी। यह उसके काम आई नहीं, पर उसे सुना गया, और उसकी सज़ा उससे कम रही जितनी उस मोहल्ले में उम्मीद की जा रही थी।
लालमन को छोड़ दिया गया। उसकी कलाई का इलाज कोतवाली के ख़र्च पर हुआ, इस पर बीरबल ने ज़ोर दिया, और उसका जो नुक़सान हो चुका था उसका कोई हिसाब नहीं था।
"बच्ची झूठ नहीं बोल रही थी," बीरबल ने मुंशी से कहा। "तुमने उससे वे चीज़ें पूछीं जो बड़े याद रखते हैं। नाम, वक़्त, हुलिया। बच्चे जगह याद रखते हैं और रंग याद रखते हैं। सवाल ग़लत थे, गवाह नहीं।"
मेहरू को यह सब समझ नहीं आया और उसने उस दिन बीरबल से यह पूछा कि नीला रंग किस चीज़ से बनता है। जवाब उसे मिल गया, और वह उस जवाब को कई दिन तक हर आने-जाने वाले को सुनाती रही।