सुनारों की गली पूरब से पश्चिम को जाती है और उसमें शाम के वक़्त धूप सीधी भीतर आती है। यह बात वहाँ रहने वाले सब जानते हैं। गर्मियों में लोग उस घंटे में शटर आधा गिरा देते हैं, वरना काम करने में आँख जलती है।
चोरी उसी घंटे हुई।
सग़ीर सुनार की दुकान से पौने चार सौ रुपये का माल गया, ज़्यादातर चाँदी, और थोड़ा सोना जो एक कपड़े में बँधा रखा था। दुकान बंद नहीं थी। सग़ीर पीछे वाली कोठरी में तंबाकू लेने गया था और लौटा तो तख़्ते के नीचे वाला ख़ाना खुला पड़ा था।
जुम्मन सामने वाले घर की ऊपरी मंज़िल पर रहता था और उसकी खिड़की सीधे उस दुकान पर खुलती थी।
उसने कोतवाली में कहा कि उसने आदमी को निकलते देखा। उसने यह भी कहा कि उसने उसका चेहरा साफ़ देखा। और उसने नाम बता दिया।
करमू उसी गली में रहता था। वह पालिश का काम करता था और चार दुकानों पर जाता था, जिनमें सग़ीर की भी थी। उसे उसी रात उठा लिया गया।
करमू ने मना किया। उसके पास कोई गवाह नहीं था कि वह उस वक़्त कहाँ था, क्योंकि वह अकेले घर पर था। जुम्मन के पास आँखें थीं और वह उन्हें दो बरस से चश्मे के बिना इस्तेमाल कर रहा था।
उन्नीस दिन करमू हवालात में रहा।
उन्नीस दिन में करमू से चार बार पूछताछ हुई। हर बार वही सवाल और हर बार वही जवाब। पाँचवीं बार की नौबत नहीं आई क्योंकि मुंशी ने लिख दिया कि आदमी क़ुबूल नहीं कर रहा और गवाह पक्का है, और ऐसे मामलों में यही काफ़ी माना जाता था। बाहर उसकी माँ रोज़ आती थी। उसे भीतर जाने नहीं दिया जाता था। वह दोपहर तक बैठी रहती और फिर लौट जाती।
बीसवें दिन उसकी माँ आगरा आई और उसने दरख़्वास्त दे दी। दरख़्वास्त में कुछ नहीं लिखा था सिवाय इसके कि उसका लड़का चोर नहीं है, जो हर माँ लिखती है, इसलिए उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। बीरबल की नज़र उस पर इसलिए पड़ी कि उसमें गली का नाम लिखा था।
वे उस गली में गए। दोपहर में नहीं। शाम को, उसी घंटे।
वे जुम्मन के घर की सीढ़ियाँ चढ़े और उसी खिड़की पर जाकर खड़े हो गए।
सूरज गली के दूसरे सिरे पर था, नीचा, और सीधे उनकी आँखों में आ रहा था। सामने की दुकान का दरवाज़ा उस रोशनी के ठीक बीच में पड़ता था। बीरबल ने अपने आदमी से कहा कि वह नीचे जाकर दुकान से निकले और गली में चार क़दम चले।
आदमी निकला। वह चला। वह लौट आया।
बीरबल ने उसे तीन बार दोहराने को कहा और तीनों बार उन्हें एक काली आकृति दिखी। क़द दिखा, चाल दिखी, कंधे का झुकाव दिखा। चेहरा नहीं दिखा।
जुम्मन वहीं खड़ा था और उसने यह सब देखा। उसने पहले कहा कि उस दिन शायद बादल थे। फिर उसने कहा कि उसे याद है कि उसने चेहरा देखा था। फिर वह चुप हो गया और उसके बाद उसने अपनी बात दोहराई नहीं।
वह झूठ नहीं बोल रहा था। उसने क़द देखा था, चाल देखी थी, और उसका दिमाग़ चेहरा अपने आप भर चुका था, क्योंकि उस क़द और उस चाल का आदमी उस गली में उसने रोज़ देखा हुआ था।
"यह सबसे ख़राब क़िस्म की गवाही है," बीरबल ने कोतवाल से कहा। "क्योंकि गवाह पूरे यक़ीन से बोलता है और उसे ख़ुद नहीं मालूम कि वह ग़लत है।"
करमू छोड़ दिया गया।
उन्नीस दिन का हिसाब यह था। चार दुकानों में से दो ने दूसरे आदमी को रख लिया था। मकान का किराया दो महीने का चढ़ गया था। और गली में यह बात फैल चुकी थी, जो हवालात से निकलने पर मिटती नहीं है। करमू ने इनमें से किसी बात की शिकायत नहीं की, न उस दिन, न बाद में, और यही उसकी माँ को सबसे बुरा लगा।
पर इससे चोरी का पता नहीं चलता था, और जब तक असली आदमी नहीं मिलता, गली में करमू का नाम साफ़ नहीं होता।
बीरबल ने उसी शाम गली के दूसरे सिरे वाले घरों में पूछताछ करवाई। पश्चिम की तरफ़ वाले घरों से देखने पर वही आदमी धूप में होता, अँधेरे में नहीं। उधर वाली तीसरी छत पर एक औरत उस वक़्त कपड़े उतार रही थी और उसने किसी को दुकान से निकलते देखा था, और उसने ध्यान नहीं दिया था क्योंकि वह आदमी वहाँ रोज़ आता था।
उसने जो हुलिया बताया वह करमू का नहीं था। वह सग़ीर के अपने भांजे का था, जो हफ़्ते में दो बार हिसाब लिखने आता था और जिसे कोठरी का और तख़्ते के नीचे वाले ख़ाने का, दोनों का पता था।
सग़ीर ने उसके बाद मुक़दमा आगे नहीं बढ़ाया और यह उसका हक़ था। करमू को उन्नीस दिन का कुछ नहीं मिला। उसकी चार दुकानों में से दो ने उसे वापस रख लिया।
जुम्मन ने उस खिड़की पर परदा डलवा दिया। वह गर्मियों में उसे हटाता नहीं था, हालाँकि उधर से ही हवा आती थी, और जब लोग पूछते थे तो वह कहता था कि उस तरफ़ की धूप ठीक नहीं है।