शहज़ादी अस्तबल की सबसे पुरानी घोड़ी थी और बादशाह उस पर सात बरस चढ़े थे। वह उस रात खोर के पास गिरी और सुबह तक ठंडी हो चुकी थी।
अस्तबल में उस रात तीन आदमी थे। पंचम, जो चालीस बरस से वहाँ था। एक जवान साईस। और फतिंगा, जो सोलह का था और छह महीने पहले आया था।
सुबह जब ख़बर ऊपर गई तो पहला सवाल यही पूछा गया कि रात कौन था।
फतिंगा का नाम सबसे पहले लिया गया। इसकी वजह कोई सुबूत नहीं था। वजह यह थी कि वह सबसे नया था, सबसे छोटा था, और उसका कोई नहीं था।
दूसरी वजह यह थी कि उस रात दाना डालने की बारी उसकी थी।
दरबार में यह मामला उसी दिन उठा। दो दरबारियों ने कहा कि लापरवाही हुई है और लापरवाही की सज़ा तय है। बादशाह ने बीरबल की तरफ़ देखा और पूछा कि उनका क्या ख़याल है।
बीरबल ने कहा कि वे देखकर बताएँगे। इससे ज़्यादा उन्होंने उस दिन कुछ नहीं कहा।
अगले दिन उन्होंने यही कहा। शब्द भी नहीं बदले।
तीसरे दिन बादशाह ने ज़ोर से पूछा और बीरबल ने वही जवाब दिया, उन्हीं शब्दों में, और उसके बाद वे चुप हो गए।
यह चुप्पी दरबार में चार दिन चली और वह किसी को अच्छी नहीं लगी।
फतिंगा उन चार दिनों में अस्तबल में ही रहा। उसे बाँधा नहीं गया था, पर वह बाहर भी नहीं निकलता था। पंचम ने उसे रोज़ खाना दिया और दो बार उससे कहा कि वह अपने गाँव लौट जाए, और दोनों बार लड़के ने मना कर दिया, इस डर से कि भागने का मतलब मान लेना समझा जाएगा। उसकी उम्र सोलह की थी और यह बात उसने ख़ुद सोची थी।
चौथे दिन एक दरबारी ने कहा कि बीरबल जवाब इसलिए नहीं दे रहे क्योंकि उनके पास जवाब नहीं है। दूसरे ने कहा कि लड़के को बचाने की कोई वजह उनके पास ज़रूर होगी। यह दूसरी बात ज़्यादा ख़तरनाक थी और उसे कहने वाले को यह मालूम था।
बादशाह ने उस दिन बीरबल से अकेले में पूछा।
"तुम्हें कुछ मालूम है?" "अभी नहीं, जहाँपनाह।" "तो कह क्यों नहीं देते कि नहीं मालूम?" "क्योंकि जिस दिन मैं यह कहूँगा, उसी शाम उस लड़के को सज़ा हो जाएगी। मेरी चुप्पी अभी उसे रोके हुए है।"
बादशाह ने इसका जवाब नहीं दिया। उन्होंने दो दिन और दे दिए।
बीरबल उन चार दिनों में तीन बार अस्तबल गए और हर बार अलग वक़्त पर गए। उन्होंने खोर देखी, दाना देखा, पानी की नाँद देखी। उन्होंने पंचम से बात की और साईस से भी की, और फतिंगा से सबसे कम बात की, क्योंकि वह इतना डरा हुआ था कि उससे कुछ निकलना नहीं था।
पाँचवें दिन उन्हें वह चीज़ मिली जो वे ढूँढ़ रहे थे, और वह घोड़ी के मुँह में थी।
इसे ढूँढ़ने में इतने दिन इसलिए लगे कि किसी ने वहाँ देखा ही नहीं था। मरे हुए जानवर का मुँह खोलकर कोई नहीं देखता। पहले तीन दिन बीरबल भी वही देखते रहे जो बाक़ी सब देख रहे थे, यानी दाना, पानी, और रात की बारी। चौथी शाम उन्होंने हकीम से पूछा कि घोड़ी कमज़ोर कब से थी, और हकीम ने कहा कि वह कमज़ोर थी ही, यह सबको मालूम था। यही वाक्य उन्हें मुँह तक ले गया।
उसके ऊपर के दाएँ तरफ़ के दो दाँत घिसकर तिरछे हो चुके थे और उनके नीचे मसूड़ा फूला हुआ था। यह कई महीनों का काम था। ऐसी घोड़ी दाना चबाती है और आधा गिरा देती है, और धीरे-धीरे उसका पेट भरना बंद हो जाता है।
पंचम ने पूछने पर बताया कि उसने यह छह महीने पहले देखा था। उसने ऊपर कहा भी था।
"किससे कहा था?" उसने नाम बता दिया। वह नाम उन दो दरबारियों में से एक का था जिन्होंने पहले दिन लापरवाही की सज़ा की बात उठाई थी। घोड़ों का ख़र्च उसी के हाथ में था और उस बरस उस मद में कटौती करके उसने अपना हिसाब अच्छा दिखाया था।
बीरबल ने दरबार में यह नाम नहीं लिया। एक बार भी नहीं।
उन्होंने सिर्फ़ घोड़ी के दाँतों की बात बताई, हकीम से उसकी तसदीक़ करवाई, और कहा कि इस जानवर को छह महीने से नरम चारा चाहिए था। फिर उन्होंने यह भी कह दिया कि यह बात अस्तबल से ऊपर पहुँची थी।
इससे आगे उन्होंने कुछ नहीं कहा और बादशाह ने भी उनसे नहीं पूछा।
उस दरबारी से घोड़ों का ख़र्च ले लिया गया। उस पर कोई इलज़ाम नहीं लगा और उसे यह भी नहीं बताया गया कि क्यों लिया जा रहा है, जो उसके लिए शायद सज़ा से ज़्यादा भारी पड़ा।
फतिंगा अस्तबल में रहा। उसे कुछ नहीं कहा गया। पंचम ने उसे उसके बाद अपने साथ लगा लिया और वही उसे सिखाता रहा।
बाद में एक बार बादशाह ने बीरबल से पूछा कि अगर उन दाँतों में कुछ न मिलता तो वे क्या करते। जवाब में कहा गया कि तब भी वे चार दिन चुप ही रहते, क्योंकि चार दिन में जो नहीं मिलता वह पाँचवें दिन मिल सकता है, और जो लड़का चौथे दिन सज़ा पा जाए उसके लिए पाँचवाँ दिन नहीं आता।