हुक्म छह महीने पुराना था और सुनने में ठीक लगता था। कोई भी शिकायत तभी दर्ज होगी जब वह सरकारी ठप्पे वाले काग़ज़ पर लिखी हो। काग़ज़ कचहरी के बाहर मिलता था और उसका दाम चार आने था।
नियाज़ उस क़स्बे का फ़ौजदार था और उसने यह हुक्म बदनीयती से नहीं निकाला था। उसके यहाँ रोज़ चालीस-पचास लोग आ जाते थे और उनमें आधे झगड़े पड़ोसियों की गाली-गलौज के होते थे। उसे लगा कि चार आने की रोक लगा देने से बेकार के मामले अपने आप छँट जाएँगे।
छह महीने बाद उसने आगरा जो हिसाब भेजा उसमें लिखा था कि शिकायतें अस्सी फ़ीसदी कम हो गई हैं।
दीवान के दफ़्तर में यह ख़बर अच्छी मानी गई। बादशाह ने भी सुना और उन्होंने कहा कि यह तरीक़ा बाक़ी परगनों में भी देखा जाए।
बीरबल ने इस पर कोई राय नहीं दी। उन्होंने इतना कहा कि वे ख़ुद जाकर देख आएँ। फिर वे चले गए।
क़स्बा आगरा से इक्कीस कोस पर था। वे वहाँ किसी को बताए बिना पहुँचे और कचहरी के बाहर पीपल के नीचे बैठ गए। उनके पास एक तख़्ती थी, दवात थी, और ठप्पे वाले काग़ज़ों की एक गड्डी थी जो उन्होंने अपने पैसे से ख़रीदी थी।
उन्होंने वहाँ एक बात कहलवा दी। जिसे अर्ज़ी लिखवानी हो, लिखवा ले। काग़ज़ का पैसा नहीं लगेगा और लिखाई का भी नहीं।
पहले दिन दो आदमी आए।
दूसरे दिन ग्यारह आए।
तीसरे दिन सुबह से क़तार लगनी शुरू हुई और शाम तक वह मोड़ तक चली गई। चौथे दिन बीरबल ने दो और लिखने वाले बिठाए। उस दिन तीन सौ से ऊपर अर्ज़ियाँ लिखी गईं।
बीरबल ने वे चार दिन वहीं बैठकर बिताए। वे ख़ुद भी लिखते रहे। दोपहर में धूप सीधी आती थी। तख़्ती गरम हो जाती थी। तीसरे दिन उनकी दवात ख़त्म हो गई और क़स्बे के एक दुकानदार ने अपनी दे दी, और पैसे नहीं लिए। बीरबल ने ज़बरदस्ती नहीं की, क्योंकि उन्हें लगा कि वह आदमी यह पैसे के लिए नहीं कर रहा।
चौथे दिन क़तार में जो लोग खड़े थे उनमें बहुत से ऐसे थे जो पहले भी आ चुके थे। एक बूढ़ा तीन बार आया था। पहली बार उसने चार आने का काग़ज़ ख़रीदा था। दूसरी बार वह पैसे लेकर आया था और रास्ते में ख़र्च हो गए। तीसरी बार वह बिना पैसे के आया और बाहर से लौट गया। अब वह चौथी बार आया था और उसे यक़ीन नहीं हो रहा था कि इस बार उससे कुछ नहीं माँगा जाएगा।
उनमें कोई भी गाली-गलौज का मामला नहीं था। एक भी नहीं।
एक अर्ज़ी उस औरत की थी जिसके पति को ग्यारह महीने से मज़दूरी नहीं मिली थी। एक उस आदमी की जिसकी बकरियाँ रोक ली गई थीं और छुड़ाने का दाम माँगा जा रहा था। एक में सिर्फ़ इतना लिखा गया कि गाँव का रास्ता एक आदमी ने अपनी दीवार बढ़ाकर बंद कर दिया है और अब बच्चे नाले से होकर जाते हैं।
बीरबल ने उन तीन सौ अर्ज़ियों को छाँटा नहीं। उन्होंने उन्हें बाँधा और नियाज़ के सामने रख दिया।
नियाज़ ने गड्डी देखी और उसने पहला सवाल यही पूछा कि इतने काग़ज़ का पैसा कहाँ से आया।
"मेरे पास से।" "तो यह गिनती सही नहीं है।" "गिनती बिलकुल सही है। सिर्फ़ चार आने हटा दिए गए हैं।"
नियाज़ ने कहा कि उसने हुक्म की ख़िलाफ़वर्ज़ी नहीं की, और यह ठीक था। बीरबल ने कहा कि उन्होंने भी नहीं की, क्योंकि हर अर्ज़ी उसी ठप्पे वाले काग़ज़ पर है जिस पर होनी चाहिए।
इस पर नियाज़ के पास कहने को कुछ नहीं था।
उसने बाद में सिर्फ़ इतना कहा कि उसे यह ख़याल नहीं आया। यह सच था और यही सबसे बड़ी बात थी। छह महीने में उसके सामने से जो लोग नहीं गुज़रे, उनके बारे में सोचने का कोई तरीक़ा उसके पास था ही नहीं, क्योंकि जो नहीं आता उसकी गिनती कोई नहीं रखता।
"तुम्हारा हिसाब यह कहता है कि शिकायतें अस्सी फ़ीसदी घट गईं। घटी नहीं थीं। बस उन तक पहुँचने का रास्ता चार आने का हो गया था, और जिनकी शिकायत सबसे सच्ची थी उन्हीं के पास वे चार आने नहीं थे।"
हुक्म वापस नहीं लिया गया, क्योंकि उसे वापस लेने पर वही भीड़ लौट आती जिससे बचने के लिए वह निकाला गया था।
उसकी जगह यह तय हुआ कि काग़ज़ कचहरी मुफ़्त देगी और उस पर लिखने वाला एक आदमी सरकार बिठाएगी। जो चाहे अपना काग़ज़ ख़रीदकर ला सकता है, पर न लाने पर किसी को लौटाया नहीं जाएगा।
नियाज़ हटाया नहीं गया। वह अपनी जगह पर रहा। उसने अगले बरस जो हिसाब भेजा उसमें शिकायतों की संख्या पिछले बरस से छह गुना थी, और उसने उसे कामयाबी लिखकर नहीं भेजा, सिर्फ़ संख्या लिखकर भेजा।
पीपल के नीचे वह तख़्ती छूट गई थी और लिखने वाला आदमी उसी पर बैठकर लिखता रहा। क़स्बे में लोग उस जगह को कचहरी नहीं कहते, पीपल कहते हैं, और आज भी जिसे अर्ज़ी लिखवानी हो वह कचहरी नहीं जाता, पीपल जाता है।