मेले के तीसरे दिन दोपहर में झगड़ा उस सलेटी घोड़े पर हुआ जो नीम के नीचे बँधा था। बसंता ने उसकी रस्सी खोलनी चाही और सादिक़ ने उसका हाथ पकड़ लिया, और आधे घंटे में वहाँ इतनी भीड़ जमा हो गई कि कोतवाल को घोड़ा वहाँ से हटवाना पड़ा।
बटेसर का मेला माघ में लगता है और उसमें ऊपर की तरफ़ से घोड़े आते हैं। बीस-पच्चीस हज़ार लोग जुटते हैं, सौदे ज़बानी होते हैं और गवाही भी ज़बानी होती है। लिखा-पढ़ी सिर्फ़ बड़े सौदों में होती है और सलेटी घोड़ा बड़ा सौदा नहीं था।
बसंता खेड़ा के पास के एक गाँव का था और भाड़े पर सामान ढोता था। उसका कहना था कि घोड़ा उसका है और तेरह दिन पहले रात में उसके बाड़े से खोल लिया गया।
सादिक़ घोड़ों का बेपारी था और उसका कहना था कि उसने वह घोड़ा नौ दिन पहले नौ अशर्फ़ी में ख़रीदा है, दो आदमियों के सामने, और वे दोनों आदमी मेले में मौजूद थे।
तेरह दिन बसंता ने ढूँढ़ा। पहले दो दिन उसने अपने गाँव के आसपास देखा। फिर वह चारों तरफ़ के हाटों में गया, एक-एक करके, और हर जगह उसने वही बात पूछी। घोड़ा उसका इकलौता जानवर था और उसके बिना उसका काम बंद था, इसलिए उन तेरह दिनों में उसने कमाया कुछ नहीं। मेले में वह इसी उम्मीद से आया था कि चोरी का जानवर मेले में ही बिकता है।
दोनों सच बोल रहे थे। यह बात कोतवाल कमरुद्दीन को दूसरे दिन समझ आ गई और उसके बाद वह और उलझ गया।
तीसरे दिन उसने मामला आगरा भेज दिया।
बीरबल ने दोनों की बात अलग-अलग सुनी और दोनों से घोड़े की पहचान पूछी। बसंता ने बताया कि वह सलेटी है, माथे पर सफ़ेद निशान है, अगला बायाँ खुर बाक़ी तीनों से थोड़ा चौड़ा है। सादिक़ ने बिलकुल यही बातें बताईं, उसी क्रम में, और एक बात और जोड़ी कि उसकी दुम में तीन बाल सफ़ेद हैं।
"वह भी सही है," बसंता ने कहा जब उसे यह बताया गया। "मैंने गिने नहीं थे।"
बीरबल ने उसके बाद पहचान पूछनी बंद कर दी।
"घोड़ा किसी को दिखाने से पहले तुम क्या करते हो?" उन्होंने सादिक़ से पूछा। "पीठ पर हाथ फेरता हूँ और मुँह की तरफ़ जाता हूँ।" "किस तरफ़ से जाते हो?" "जिस तरफ़ से जगह हो।"
यही सवाल बसंता से पूछा गया तो उसने कहा कि वह ऐसा कुछ करता ही नहीं, वह सीधा जाकर रस्सी खोल लेता है।
अगली सुबह घोड़ा आँगन में लाया गया और खूँटे से बाँध दिया गया। दोनों तरफ़ बराबर जगह छोड़ी गई। बीरबल ने कहा कि दोनों बारी-बारी जाकर उसे खोलें और मेंड़ तक ले जाकर वापस बाँध दें।
सादिक़ पहले गया। वह दाहिनी तरफ़ से बढ़ा। घोड़े ने सिर झटका और एक क़दम पीछे हटा, और सादिक़ रुक गया, फिर उसने घूमकर बाईं तरफ़ से जाकर रस्सी खोली।
बसंता गया। वह पहले क़दम से ही बाईं तरफ़ मुड़ गया और उसने दाहिनी तरफ़ देखा तक नहीं। उसने रस्सी खोली, घोड़ा साथ चल दिया, मेंड़ तक गया और वापस आ गया।
"तुम बाएँ से क्यों गए?" बीरबल ने पूछा। बसंता को समझ नहीं आया कि सवाल किस बात का है। "उधर से ही जाते हैं।" "क्यों?" "पता नहीं। बस उधर से जाते हैं।"
घोड़े का दाहिना कान भीतर से एक जगह मुड़ा हुआ था और उस तरफ़ उसे कोई क़रीब आता अच्छा नहीं लगता था। यह चोट पुरानी थी और बाहर से देखने पर नहीं दिखती थी। सादिक़ ने नौ दिन में यह सीख लिया था और उसे इसकी वजह नहीं मालूम थी। बसंता को यह इतने बरस से मालूम था कि उसे याद भी नहीं था कि उसे मालूम है।
घोड़ा बसंता को दे दिया गया।
सादिक़ अपनी जगह खड़ा रहा और उसने कोई हल्ला नहीं किया। नौ अशर्फ़ी उसकी थीं और वे जा चुकी थीं, और जिन दो आदमियों के सामने सौदा हुआ था उन्होंने बेचने वाले का चेहरा तक ठीक से नहीं देखा था।
बीरबल ने उससे पूछा कि बेचने वाला कैसा था। सादिक़ ने जो बताया उससे कुछ नहीं निकला। फिर उसने कहा कि वह आदमी घोड़े को दाहिनी तरफ़ से पकड़कर लाया था और घोड़ा पूरे रास्ते बिदकता रहा था, और तब उसे लगा था कि जानवर नया-नया बिका है इसलिए घबराया हुआ है।
यह बात लिखवा ली गई। उस निशानी पर उस आदमी को अगले मेले में पहचाना गया, तेरह महीने बाद, जब वह एक और घोड़ा दाहिनी तरफ़ से खींचता हुआ ला रहा था।
सादिक़ को उसके नौ अशर्फ़ी उसी से दिलवाए गए, पूरे नहीं, सात। बाक़ी दो तब तक ख़र्च हो चुके थे।
बसंता उस घोड़े से सात बरस और काम लेता रहा। मेले में जब उससे लोग यह क़िस्सा पूछते थे तो वह उसे ठीक से सुना नहीं पाता था, क्योंकि उसके हिस्से में करने को कुछ था ही नहीं, सिवाय इसके कि वह उस तरफ़ से गया जिस तरफ़ से वह हमेशा जाता था।