पंडित शिवदत्त ने फ़र्श पर खड़िया से एक लकीर खींची और सीधे खड़े हो गए। "इसे छोटा कर दीजिए," उन्होंने कहा। "शर्त एक ही है। लकीर को छूना नहीं है।"
दरबार भरा हुआ था और जेठ की दोपहर थी। छत के पंखे खींचने वाले लड़के दीवार के पास बैठे थे और उनकी रस्सियाँ सुस्त चल रही थीं। यह तीसरा दिन था। शिवदत्त काशी से आए थे, उम्र साठ के आसपास थी, और वे बहुत धीमे बोलते थे, जैसे हर शब्द तौलकर निकाल रहे हों। पहले दो दिन उन्होंने दरबार के दो विद्वानों को हरा दिया था, और दोनों बार इतनी नरमी से हराया था कि हारने वाले को गुस्सा भी नहीं आ सका।
पहले दिन उन्होंने पूछा था कि ऐसी कौन सी चीज़ है जो देने से बढ़ती है। जवाब आया, विद्या। शिवदत्त ने कहा कि जवाब ठीक है, मगर अधूरा है, और फिर उन्होंने चार और चीज़ें गिना दीं। दूसरे दिन का सवाल इससे भी कठिन था और उसका जवाब किसी के पास नहीं था।
बादशाह अकबर को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। बात हार-जीत की नहीं थी। बात यह थी कि उनका दरबार पूरे हिंदुस्तान में सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे लोगों का दरबार माना जाता था, और तीन दिन से वह बात हर शाम थोड़ी कमज़ोर होती जा रही थी।
दरबार का हाल-रोज़नामचा सरजू लिखता था। उसकी उम्र चौबीस बरस थी। यह काम उसे छह महीने पहले मिला था, उस बूढ़े मुंशी की जगह पर जो लिखते-लिखते अंधा हो गया था। दो दिन से वह हार की ख़बर लिख रहा था। उसे यह भी पता था कि रोज़नामचा सिर्फ़ आज के लिए नहीं लिखा जाता, और जो आज लिखा जाएगा वही सौ साल बाद सच माना जाएगा। उस दिन उसने दवात खोली और कलम हाथ में लेकर रख दी।
पहला जवाब एक नौजवान अमीर की तरफ़ से आया। उसने कहा कि लकीर के आधे हिस्से पर कपड़ा डाल दिया जाए। शिवदत्त ने पूछा कि कपड़ा लकीर को छुएगा या नहीं। सवाल वहीं का वहीं रह गया।
दूसरा जवाब आया कि फ़र्श का वह हिस्सा तोड़ दिया जाए। तीसरा यह कि खड़िया के ऊपर से धूल डाल दी जाए। चौथा जवाब देने वाला बोलते-बोलते ख़ुद ही रुक गया, क्योंकि उसे बीच में समझ आ गया कि उसका तरीक़ा भी लकीर को छुए बिना पूरा नहीं होता। शिवदत्त ने हर जवाब पर वही एक सवाल लौटा दिया। बोलने वाला बीच में ही रुक जाता।
आधा घंटा बीत गया। दरबार में वह ख़ास किस्म की चुप्पी फैल गई जो तब होती है जब बहुत सारे लोग एक ही बात सोच रहे हों और कोई उसे कहना न चाहे। कोई नहीं हिला। बादशाह ने बीरबल की तरफ़ देखा।
बीरबल उठे और शिवदत्त के पास गए। उन्होंने लकीर को झुककर देखा, फिर सीधे हुए, फिर एक बार और देखा। सरजू ने कलम उठा ली। उसे लग रहा था कि अब बीरबल कोई सवाल पूछेंगे, और सवाल पूछना हार की शुरुआत होती है।
बीरबल ने शिवदत्त से खड़िया माँगी। शिवदत्त ने खड़िया दे दी और थोड़ा पीछे हट गए, क्योंकि उन्हें लगा कि यह आदमी अब लकीर मिटाने जा रहा है और शर्त तोड़ने जा रहा है।
बीरबल नीचे बैठे और उसी लकीर के ठीक नीचे, उसे बिना छुए, एक दूसरी लकीर खींच दी। यह लकीर पहली से लंबी थी। बस इतना ही किया। फिर वे खड़े हो गए और खड़िया वापस पकड़ा दी।
कुछ पल किसी की समझ में नहीं आया। दरबार चुप था। फिर सरजू ने देखा कि ऊपर वाली लकीर अब छोटी दिख रही है। उसने दुबारा देखा। वह सचमुच छोटी थी, और किसी ने उसे छुआ तक नहीं था।
"आपकी लकीर वहीं है जहाँ थी," बीरबल ने कहा। "मैंने उसमें से कुछ नहीं घटाया। छोटी वह अब भी नहीं हुई। बस उसके बगल में एक बड़ी लकीर आ गई है।"
शिवदत्त बहुत देर तक फ़र्श की तरफ़ देखते रहे। दरबार में कोई नहीं बोला, क्योंकि सब उनके बोलने का इंतज़ार कर रहे थे। फिर उन्होंने सिर हिलाया और कहा कि वे तीन दिन से गलत जगह जवाब ढूँढ़ रहे थे। उनकी आवाज़ में हार नहीं थी। उसमें कुछ और था, जिसे सरजू बाद में कई बार लिखने की कोशिश करके भी नहीं लिख पाया।
बादशाह ने उन्हें दरबार में रुकने को कहा। शिवदत्त ने हाथ जोड़े और मना कर दिया। उन्होंने कहा कि काशी में उनके पढ़ाने के दिन तय हैं और वे पहले ही चार दिन ज़्यादा रुक चुके हैं। जाते हुए उन्होंने बीरबल से सिर्फ़ इतना पूछा कि यह जवाब उन्हें कब सूझा, और बीरबल ने कहा कि जब सब लोग लकीर को देख रहे थे, तब उन्होंने फ़र्श को देखा।
उस शाम सरजू ने रोज़नामचे में तीसरे दिन का हाल लिखा। दो दिन उसने पूरे-पूरे पन्ने भरे थे। तीसरे दिन उसने सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी, और उसे लिखने में उसे बहुत देर लगी।
अगली सुबह झाड़ू लगाने वाला दरबार साफ़ करने आया। उसने दोनों लकीरों पर एक साथ झाड़ू फेरी और आगे बढ़ गया। उसे कभी मालूम नहीं हुआ कि उसने क्या मिटाया है।