फ़तेहपुर सीकरी की रसोई से जो ख़ुशबू उठी, वह दालान पार करके दीवान-ए-ख़ास तक पहुँच गई। जेठ की शाम थी और हुसैनी ने थाल ख़ुद लगाया। बैंगन का भरता था, ऊपर से हरी मिर्च और कच्ची घानी का तेल। बादशाह अकबर ने पहला कौर लिया और कुछ देर तक सिर्फ़ खाते रहे। थाल आधा हो चुका था जब उन्होंने कहा कि इस मौसम में ऐसा कुछ नहीं खाया।
दरबार के लोग एक-दूसरे को देखने लगे। जोरावर सबसे पहले उठा। वह तीन बरस पहले मालवा के एक छोटे क़स्बे से आया था और अब भी हर सुबह यह सोचकर उठता था कि कहीं आज उसकी जगह किसी और को न दे दी जाए। उसने हाथ जोड़े।
"जहाँपनाह, बैंगन सब्ज़ियों का बादशाह है," उसने कहा। "देखिए, इसके सिर पर ताज है। और किस सब्ज़ी के सिर पर ताज देखा है आपने? रंग शाही है, स्वाद शाही है। हकीमों ने लिखा है कि यह दिमाग़ को हल्का रखता है और नींद गहरी करता है।"
दरबार में सवाल
किसी ने नहीं पूछा कि किन हकीमों ने। बादशाह हँसे। थाल ख़ाली कर दिया। उसी रात ख़बर क़िले से निकलकर बाज़ार तक गई, और अगली सुबह जिन घरों में महीनों से बैंगन नहीं पका था, वहाँ भी कढ़ाई चढ़ गई। दाम उसी हफ़्ते तिगुना हो गया।
मंगतू की ज़मीन जमुना के उस तरफ़ थी, दो बीघे से कुछ कम। बरसों से वह उस पर तीन चीज़ें बोता आया था, थोड़ा-थोड़ा करके, ताकि एक मारी जाए तो दो बची रहें। इस बार उसने पूरा खेत बैंगन का कर दिया। हिसाब सीधा था। दाम तिगुना था और क़िले की रसोई ने पूरे मौसम का सौदा बोल दिया था। उसने पेशगी लेकर बैलों की एक जोड़ी ख़रीदी और पड़ोसी को दिखाने ले गया।
सावन की एक रात बादशाह की तबीयत बिगड़ी। रात भर हकीम आते-जाते रहे। सुबह तक बात सँभल गई थी, पर उठते ही उन्होंने कहा कि अब बैंगन नहीं खाएँगे। कहा और भूल भी गए।
उस दोपहर दरबार में किसी ने बात छेड़ दी। जोरावर फिर सबसे पहले उठा। "बैंगन से नीच सब्ज़ी कोई नहीं, जहाँपनाह," उसने कहा। "तासीर ठंडी है, ख़ून में भारीपन लाती है। और वह ताज नहीं है, काँटा है। हाथ में चुभ जाए तो शाम तक टीसता रहता है।"
दरबार ने सिर हिलाए। दो और लोग बोले, और दोनों ने वही बात दूसरे शब्दों में कही। बीरबल अपनी जगह पर बैठे रहे। उन्होंने न सिर हिलाया, न मुँह खोला।
जो किसी ने नहीं सोचा
शाम तक क़िले की रसोई का आदमी मंगतू के खेत पर पहुँच गया। सौदा रद्द था। पेशगी लौटानी थी। मंगतू खेत के बीच खड़ा रहा और उसे बहुत देर तक कुछ नहीं सूझा। बैंगन उस दिन भी उतने ही अच्छे थे। बैंजनी, चिकने, धूप में चमकते हुए।
अगले हफ़्ते उसने एक बैल बेच दिया। दूसरा उसने नहीं बेचा, क्योंकि एक बैल से हल नहीं चलता और उसे उम्मीद थी कि जोड़ी फिर बन जाएगी। बाक़ी फ़सल आधे दाम पर उठ गई। दाम कोई नहीं पूछ रहा था। कुछ बोरे उसने चारे वालों को दे दिए और बाक़ी खेत में ही सड़ने के लिए छोड़ दिए।
दस दिन बाद बादशाह ने भरे दरबार में जोरावर पर नज़र डाली। "जोरावर, तुमने उस शाम बैंगन को सब्ज़ियों का बादशाह कहा था।" "जी, जहाँपनाह।" "और परसों तुमने उसे काँटा कहा।" "जी।"
"दोनों बातें एक ही आदमी के मुँह से कैसे निकल सकती हैं?" जोरावर ने सिर झुकाया, फिर उठाया। उसकी आवाज़ ज़रा भी नहीं काँपी। "जहाँपनाह, मैं हुज़ूर का नौकर हूँ। बैंगन का नौकर नहीं हूँ।"
दरबार हँसी से भर गया। बादशाह भी हँसे, देर तक हँसे, और हँसते-हँसते उनकी नज़र बीरबल पर पड़ी। बीरबल नहीं हँस रहे थे।
"आप चुप क्यों हैं, बीरबल?" "जहाँपनाह, इजाज़त हो तो आज शाम का खाना मेरे घर पर हो जाए।" बादशाह मान गए। शाम को वे बीरबल के आँगन में पीढ़े पर बैठे और थाल आया। एक ही सब्ज़ी थी, गाढ़ी और गरम, ऊपर से भुना जीरा। बादशाह ने खाया, फिर दोबारा माँगा।
"यह क्या है?" "बैंगन, जहाँपनाह।" बादशाह का हाथ रुक गया। "मुझे तो बैंगन रास नहीं आता।" "उस रात आपने बैंगन के साथ पूरा दस्तरख़्वान भी खाया था, जहाँपनाह। बकरे का कोरमा, तीन तरह की रोटियाँ, और आख़िर में मालपुए। उनमें से किसी पर किसी ने उँगली नहीं उठाई।"
बादशाह देर तक कटोरी की तरफ़ देखते रहे। बीरबल ने आगे कोई बात नहीं जोड़ी। वे उठकर चिराग़ की बत्ती ठीक करने लगे। रात ठंडी थी। आँगन में सिर्फ़ भुने जीरे की गंध थी और दूर कहीं पानी भरने की आवाज़।
अगले महीने क़िले की रसोई का सौदा फिर मंगतू के नाम बोला गया। तब तक आधी फ़सल जा चुकी थी और बैल एक ही बचा था। जोड़ी फिर नहीं बनी। उसने पड़ोसी से दूसरा बैल माँगकर हल चलाया, और अगले मौसम में खेत को तीन हिस्सों में बाँट दिया।
उसी शाम जोरावर अपने घर लौटा। बाज़ार में बैंगन आधे दाम पर बिक रहा था, इसलिए उसकी रसोई में भी वही चढ़ा था। थाली आई तो उसने चुपचाप खाना शुरू किया, और बीच में एक बार और माँगा। घर में किसी को मालूम नहीं था कि दिन कैसा गुज़रा है, और उसने किसी को बताया भी नहीं।