देवीदीन ने इकतीस बरस अनाज घर में काटे और आख़िरी दिन उन्होंने चाबियाँ ख़ुद जाकर जमा कीं, बिना किसी के माँगे। जाते हुए उन्होंने सिर्फ़ एक बात कही, कि तीसरी कोठी की उत्तर वाली दीवार में सीलन आती है और बरसात से पहले उसे देख लिया जाए। यह बात उन्होंने चलते-चलते कही और किसी ने उसे लिखा नहीं।

अनाज घर आगरा के क़िले के भीतर था और उसमें चार परगनों का लगान वाला अनाज रखा जाता था। जो आदमी उसकी चाबी रखता है वह किसी को दिखाई नहीं देता, और यही उस जगह की सबसे बड़ी बात है। बोरियाँ आती हैं, गिनी जाती हैं, रखी जाती हैं, और महीनों बाद निकलती हैं। बीच में जो कुछ होता है उसका गवाह कोई नहीं होता, सिवाय चूहों के।

पद ख़ाली होते ही चार नाम आगे आए।

शफ़ीक़ पहले से वहीं दूसरे दर्जे पर था और उसका दावा सबसे मज़बूत माना जा रहा था। रामदयाल दूसरे अनाज घर से आया था और उसका हिसाब साफ़ था। तीसरा आदमी ऊपर से सिफ़ारिश लेकर आया था। चौथा छिद्दा था, जो नौ बरस से वहीं बोरियाँ गिनता था और जिसका नाम सिर्फ़ इसलिए आया कि देवीदीन ने जाते हुए उसे लिख दिया था।

बादशाह ने यह मामला बीरबल को दे दिया और कहा कि चुनाव में जल्दी न की जाए, क्योंकि पिछली बार जल्दी की गई थी और उसका नतीजा ग्यारह बरस भुगतना पड़ा।

📚 यह भी पढ़ें जिसने दावा नहीं किया
जिसने दावा नहीं किया

बीरबल ने चारों को एक ही दिन बुलाया। हर आदमी को मिट्टी का एक गमला दिया गया और उसमें डालने के लिए मुट्ठी भर बीज। बीज एक ही बोरी से निकले। चारों को गिनकर बराबर दिए गए।

"पाँच महीने बाद इन्हें लेकर आना है," उन्होंने कहा। "जिसका पौधा सबसे अच्छा होगा, चाबी उसी को मिलेगी।"

गमले घर ले जाए गए। फिर पाँच महीने बीत गए।

छिद्दा के घर में आँगन नहीं था, इसलिए उसने गमला छत पर रखा। उसने बीज उसी दिन बोए। तीसरे दिन से पानी देना शुरू किया। हफ़्ता बीता और कुछ नहीं निकला। उसने सोचा कि मिट्टी भारी है, इसलिए उसने नीचे से नई मिट्टी लाकर बदली और दोबारा बोया। फिर भी कुछ नहीं निकला।

उसने गोबर मिलाया। उसने गमला छाँव में रखकर देखा, फिर धूप में। उसने पानी कम किया, फिर ज़्यादा किया। तीसरे महीने में उसने बाज़ार से माली को बुलाकर मिट्टी दिखाई और माली ने कहा कि मिट्टी में कोई खोट नहीं है।

📚 यह भी पढ़ें कौवों की गिनती
कौवों की गिनती

चौथे महीने में उसकी बीवी ने कहा कि बाज़ार से चार पैसे के बीज लाकर डाल दो, किसे पता चलेगा। छिद्दा ने कहा कि बीज गिनकर दिए गए थे। बीवी ने कहा कि गिनकर देने वाले को यह थोड़ी याद रहेगा कि कौन सा बीज किसका था। उस रात दोनों में बात नहीं हुई।

पाँचवें महीने के आख़िरी हफ़्ते में उसने गमले की मिट्टी आख़िरी बार पलटी, उसे बराबर किया और पानी दे दिया।

तय दिन चारों दरबार में आए।

रामदयाल का पौधा घुटनों तक आता था। उसमें दो कलियाँ थीं। तीसरे आदमी का उससे भी ऊँचा था। शफ़ीक़ का गमला ख़ाली था।

छिद्दा सबसे पीछे खड़ा था और उसका गमला भी ख़ाली था। उसने उसे नीचे रख दिया और सिर झुकाकर खड़ा हो गया, और उसने कोई सफ़ाई नहीं दी क्योंकि उसे मालूम था कि वह हार चुका है।

📚 यह भी पढ़ें बैंगन की तारीफ़
बैंगन की तारीफ़

बीरबल ने चारों गमले एक क़तार में रखवाए। फिर वे बैठ गए।

"बीज उबले हुए थे," उन्होंने कहा। "चारों के। एक भी उगना नहीं था।"

रामदयाल और तीसरे आदमी ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और कुछ नहीं बोले। शफ़ीक़ ने उसी वक़्त कहा कि उसे यह बात दूसरे हफ़्ते में ही समझ आ गई थी, और उसने इसीलिए और कुछ नहीं किया।

बीरबल उसका गमला उठाकर बादशाह के पास ले गए और उसे उलटा कर दिया। मिट्टी एक ढेले की शक्ल में गिरी, सूखी, और बीच में बीज उसी तरह पड़े थे जैसे पाँच महीने पहले डाले गए थे, एक भी हिला हुआ नहीं।

फिर उन्होंने छिद्दा का गमला उलटा। मिट्टी भुरभुरी होकर बिखर गई, गीली, उसमें गोबर मिला हुआ था और कहीं-कहीं नई मिट्टी की परतें अलग दिख रही थीं। बीज उसमें ढूँढ़ने पड़े और वे चार अलग-अलग जगहों पर मिले।

📚 यह भी पढ़ें जिसने दावा नहीं किया
जिसने दावा नहीं किया

"शफ़ीक़ ने सही अंदाज़ा लगाया और हाथ रोक लिया। इसने ग़लत अंदाज़ा लगाया और पाँच महीने काम किया। चाबी उस आदमी को चाहिए जो तब भी काम करे जब उसे यक़ीन हो कि नतीजा नहीं आएगा, क्योंकि अनाज घर में उसे कोई देखने नहीं आएगा।"

चाबियाँ छिद्दा को मिलीं। शफ़ीक़ को उसी जगह पर रखा गया और उसकी तनख़्वाह बढ़ा दी गई, क्योंकि अंदाज़ा उसने सही लगाया था और यह भी एक काम की चीज़ है।

छिद्दा ने चार्ज लेने के तीसरे दिन तीसरी कोठी की उत्तर वाली दीवार खुदवाई। भीतर सचमुच सीलन थी और नीचे की दो बोरियाँ काली पड़ चुकी थीं।

वह गमला उसने फेंका नहीं। वह अनाज घर की सीढ़ी पर रखा रहा और उसमें कुछ नहीं उगाया गया, और नए लड़के जब पूछते थे तो पुराने लोग कहते थे कि वह चाबी वाले का गमला है, और इससे ज़्यादा कोई कुछ नहीं बताता था।