तिलका ने उस सुबह अपना बरतन दुकान के तख़्ते पर रखा और कहा कि वह तब तक नहीं उठाएगी जब तक तेल दोबारा नहीं तौला जाता। फ़ख़रू ने तौल दिया। काँटा बीच में आ गया और सबने देखा कि बीच में है। तिलका ने कहा कि तौल तो ठीक है, पर तेल कम है, और यह बात सुनने में बेतुकी थी इसलिए किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया।
फ़ख़रू की दुकान तेलियों के मोहल्ले के नुक्कड़ पर थी और उसके बाप-दादा वहीं बैठते आए थे। वह बत्ती वाला तेल बेचता था और खाने का भी, और मोहल्ले के आधे घरों का चूल्हा उसी की दुकान से चलता था।
शिकायत नई नहीं थी। छह महीने से यह बात चल रही थी। लोग कहते थे कि फ़ख़रू के यहाँ से तेल कम आता है। कुछ लोगों ने दुकान बदल ली थी। कुछ ने बदली नहीं क्योंकि उधार वहीं चलता था।
कोतवाल कमरुद्दीन दो बार आया। दोनों बार उसने तराज़ू देखा, बाट देखे, और दोनों बार सब सही निकला। बाटों पर सरकारी ठप्पा था और तराज़ू की डोरी दोनों तरफ़ बराबर थी।
तीसरी बार जब पंद्रह लोग इकट्ठा होकर कोतवाली पहुँचे तो मामला आगरा भेज दिया गया।
बीरबल दोपहर में वहाँ पहुँचे और उन्होंने पहले घंटे में एक भी सवाल नहीं पूछा। वे तख़्ते के पास एक मोढ़े पर बैठ गए और ग्राहकों को आते-जाते देखते रहे।
जो लोग आ रहे थे वे अपने बरतन साथ लाते थे। कोई पीतल की छोटी कुप्पी लाता, कोई मिट्टी की हाँडी, कोई काँच की शीशी जो किसी दवा के साथ आई होगी। फ़ख़रू बरतन तराज़ू के एक पलड़े पर रखता, दूसरे पर बाट रखता, और तेल तब तक डालता जब तक काँटा बीच में न आ जाए।
बीरबल ने यह पंद्रह बार होते देखा। फिर उन्होंने पूछा कि क्या बरतन का वज़न अलग से घटाया जाता है।
फ़ख़रू ने कहा कि नहीं। उसके बाप ने कभी नहीं घटाया, उसके दादा ने कभी नहीं घटाया, और मोहल्ले में किसी तेली ने कभी नहीं घटाया। ग्राहक बरतन लाता है, बरतन समेत तौला जाता है, और सब इसी तरह चलता आया है।
"तो जिसका बरतन भारी है उसे तेल कम मिलता है।" फ़ख़रू ने यह सुना। फिर उसने कहा कि ऐसा तो होगा, पर ऐसा तो हमेशा से होता आया है।
बीरबल ने कमरुद्दीन से कहा कि दस-बारह बरतन इकट्ठे करवाए जाएँ, जो लोग रोज़ लाते हैं, और उन्हें ख़ाली तौला जाए।
तिलका की मिट्टी की हाँडी सबसे भारी निकली। उसके बाद एक और मिट्टी का बरतन। पीतल की कुप्पियाँ उनसे हल्की थीं और काँच की शीशी सबसे हल्की।
फ़र्क़ रत्ती-माशे का नहीं था। वह दिखने लायक़ था। तिलका की हाँडी और पड़ोस वाले की काँच की शीशी में इतना अंतर था कि एक ही दाम पर एक को दूसरे से लगभग एक चौथाई कम तेल मिलता था।
मोहल्ले में मिट्टी के बरतन कौन लाता है, यह पूछने की ज़रूरत नहीं थी। पीतल जिसके घर में हो वह पीतल लाता है। बाक़ी मिट्टी लाते हैं।
"तूने चोरी नहीं की," बीरबल ने फ़ख़रू से कहा। "पर छह महीने से जो लोग तुझसे लड़ रहे हैं वे झूठ भी नहीं बोल रहे।"
फ़ख़रू ने कुछ नहीं कहा। वह पीछे जाकर बैठ गया और उसने उस दिन दुकान जल्दी बंद कर दी।
अगले दिन बीरबल ने तेलियों के मोहल्ले के सब दुकानदारों को बुलाया। तेरह आदमी आए। उनमें से किसी को यह बात मालूम नहीं थी और किसी ने इससे पहले सोचा नहीं था, और यह सुनकर तीन आदमी नाराज़ हो गए।
एक ने कहा कि अब हर बरतन अलग से तौलने में दिन निकल जाएगा। दूसरे ने कहा कि इससे उनका नुक़सान होगा। तीसरे ने कहा कि यह रिवाज है और रिवाज बदलने का हुक्म कोई नहीं दे सकता।
बीरबल ने कहा कि हुक्म देने की ज़रूरत भी नहीं है, और उन्होंने वहीं बैठे-बैठे दूसरा रास्ता निकाल दिया। हर दुकान पर तीन नाप के अपने बरतन रखे जाएँगे, दुकान के, और तेल उन्हीं में नापकर ग्राहक के बरतन में उड़ेला जाएगा। तराज़ू बत्ती वाले तेल के लिए रह जाएगा, जहाँ मात्रा बड़ी होती है और बरतन एक ही तरह का आता है।
यह इंतज़ाम सस्ता था और उसमें किसी को अपनी ग़लती मानने की ज़रूरत नहीं थी, इसलिए तेरह में से ग्यारह ने उसी हफ़्ते मान लिया।
फ़ख़रू ने अपने तीन नाप के बरतन उसी दिन बनवाए और उन पर अपना नाम नहीं लिखवाया, नाप लिखवाई। उसने उस महीने तिलका से कोई उधार नहीं माँगा।
तिलका ने वह हाँडी नहीं बदली। वह उसी में तेल लेती रही, क्योंकि उसके घर में पीतल था नहीं और लेने की गुंजाइश भी नहीं थी। फ़र्क़ यह पड़ा कि अब उसे उतना ही तेल मिलता था जितना बग़ल वाले को। यह उसने महीने के आख़िर में जाना, जब दीया उन्हीं दिनों तक चला जितने दिन चलना चाहिए था।
पुराना तराज़ू उसने हटाया नहीं। वह दुकान के भीतर वाली कील पर टँगा रहा और उसके पलड़े ख़ाली रहे, और जब कोई नया लड़का पूछता था कि यह क्यों टँगा है तो फ़ख़रू कहता था कि यह सही था और फिर भी काफ़ी नहीं था।