रेशम में लिपटी तीनों गुड़ियाँ एक ही डिब्बे से निकलीं और तीनों बिलकुल एक जैसी थीं। चाँदी की, बालिश्त भर लंबी, और चेहरे इतने मिलते-जुलते कि जिसने उन्हें ढाला होगा उसने एक ही साँचा तीन बार भरा होगा। ख़्वाजा ने उन्हें मेज़ पर एक क़तार में रखा, कपड़ा तह किया और अपने हाथ पीछे कर लिए।
माघ का महीना था और दीवान-ए-ख़ास में चार अंगीठियाँ जल रही थीं। बुख़ारा से आया वह क़ाफ़िला ग्यारह दिन पहले पहुँचा था और उसके साथ घोड़े थे, ख़रबूज़े के बीज थे, और एक चिट्ठी थी जिसका मज़मून सीधा था। साथ में यह डिब्बा था, जिसके बारे में चिट्ठी में एक शब्द नहीं लिखा गया था।
"तीनों में से सबसे अच्छी कौन सी है?" ख़्वाजा ने पूछा।
बादशाह ने डिब्बा देखा, फिर उसे देखा। "अच्छी से क्या मतलब?" "यही तो सवाल है, जहाँपनाह। मेरे बादशाह ने यह डिब्बा तीन दरबारों में भेजा है। दो में जवाब नहीं मिला।"
यह वाक्य कहने का ढंग ऐसा था कि किसी ने उस पर आपत्ति नहीं की और सबको बुरा लगा।
दरबारी बारी-बारी आगे आए। किसी ने तीनों को हाथ में तौला और कहा कि तीनों बराबर हैं। किसी ने चाँदी की चमक देखी। एक ने उन्हें उलटकर पैरों के नीचे कोई निशान ढूँढ़ा और नहीं मिला। तानसेन ने तीनों को अंगीठी की रोशनी के सामने रखकर देखा और कहा कि उसे कोई फ़र्क़ नहीं दिखता, और यह कहकर वे पीछे हट गए।
बदरुद्दीन आगे बढ़े। उन्होंने बीच वाली गुड़िया उठाई, दो बार तौली, और कहा कि यही सबसे भारी है इसलिए यही सबसे अच्छी है। ख़्वाजा ने तराज़ू मँगवाया। तीनों का वज़न रत्ती भर भी अलग नहीं निकला।
बदरुद्दीन उसके बाद भी बोलते रहे। उन्होंने कहा कि यह सवाल ही बेतुका है, कि चाँदी की गुड़ियों में अच्छाई-बुराई कहाँ से आएगी, और कि मेहमान अगर पहेली लेकर आए हैं तो पहेली का जवाब देना ज़रूरी नहीं। बादशाह ने उन्हें रोका नहीं और सुना भी नहीं।
तीन दिन बीत गए। ख़्वाजा रोज़ आता, बैठता, और शाम को चला जाता। तीसरे दिन उसने बादशाह से पूछा कि क्या वह डिब्बा वापस बाँध ले।
ख़्वाजा के बारे में एक बात दरबार में किसी को नहीं मालूम थी। वह डिब्बा लेकर तीसरी बार निकला था और उसके बादशाह ने कह रखा था कि जवाब लेकर लौटना है। दो दरबारों में वह ग्यारह-ग्यारह दिन रुका था और दोनों बार ख़ाली हाथ लौटा था। तीसरी बार भी ऐसा होता तो उसका आना-जाना बंद हो जाता और उसकी जगह कोई और भेजा जाता, और यह बात उसने आगरा में किसी से नहीं कही।
बीरबल ने उसी शाम तीनों गुड़ियाँ माँग लीं और घर ले गए।
उन्होंने पहले उन्हें पानी में डाला। तीनों बराबर डूबीं। फिर उन्होंने तीनों को मेज़ पर गिराकर आवाज़ सुनी और तीनों की आवाज़ एक जैसी थी। फिर उन्होंने दीये को क़रीब लाकर उनके चेहरे देखे, और तब उन्हें दिखा कि तीनों के कानों में छेद हैं। किसी गहने के लिए नहीं। छेद भीतर तक जाते थे।
आधी रात के बाद उन्होंने तीनों को उठाकर कान की तरफ़ से दीये के सामने रखा और भीतर देखने की कोशिश की। भीतर अँधेरा था। फिर उन्होंने पानी की एक बूँद कान में डाली और गुड़िया को झुकाया। पहली में से बूँद दूसरे कान से निकल आई। दूसरी में से वह मुँह की तरफ़ से टपकी। तीसरी को उन्होंने उलटा करके काफ़ी देर पकड़े रखा और उसमें से कुछ नहीं निकला। तब उन्हें यक़ीन हुआ कि तीनों के भीतर रास्ते बने हुए हैं और वे तीनों अलग हैं।
उन्होंने सुनार के यहाँ से एक पतला तार मँगवाया।
पहली गुड़िया के दाएँ कान में तार डाला तो वह बाएँ कान से बाहर निकल आया। सीधा, बिना अटके।
दूसरी में तार कान से गया और मुँह से बाहर आया।
तीसरी में तार कान से भीतर गया और कहीं नहीं निकला। बीरबल ने उसे उलटा किया, हिलाया, दूसरे कान में डालकर देखा। तार भीतर जाकर नीचे उतरता था और वहीं रुक जाता था।
अगली सुबह उन्होंने यही तीनों बातें दरबार के सामने करके दिखाईं, एक-एक करके, और तार हर बार वहीं से निकला जहाँ से निकलना था।
"तीसरी सबसे अच्छी है, जहाँपनाह। पहली जो सुनती है वह दूसरे कान से निकाल देती है, उसका कोई हर्ज नहीं। दूसरी जो सुनती है वह मुँह से निकाल देती है, और यहीं नुक़सान होता है। तीसरी जो सुनती है वह भीतर रख लेती है।"
ख़्वाजा ने सिर झुकाया और कहा कि यही जवाब है। उसने यह भी कहा, बिना पूछे, कि पिछले दोनों दरबारों में गुड़ियाँ तौली गई थीं।
बादशाह ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने सिर्फ़ दूसरी गुड़िया उठाई और उसे कुछ पल हाथ में रखा, और उनकी नज़र एक बार बदरुद्दीन की तरफ़ गई और लौट आई। दरबार में जितने लोग थे, सबने वह देख लिया।
बदरुद्दीन उस हफ़्ते बीमार पड़े और दस दिन नहीं आए। लौटे तो पहले जैसे ही बैठे, पर बात कम करने लगे, और यह बदलाव उनके सिवा सबको दिखा।
पहली और दूसरी गुड़िया ख़्वाजा को लौटा दी गईं, यह कहकर कि तोहफ़े में जो सबसे अच्छा हो वही रखा जाता है। तीसरी बादशाह ने अपने कमरे में उस ताक़ पर रखी जहाँ वे चिट्ठियाँ रखते थे। वह वहीं रही, और दरबार में जो लोग सबसे ज़्यादा बोलते थे उनमें से कुछ ने उसके बाद उस कमरे में जाना कम कर दिया।