बात एक चिट्ठी से शुरू हुई जो बंगाल से आई थी और जिसमें लगान की वसूली दो लाख कम बताई गई थी। बादशाह ने वजह पूछी और बीरबल ने वजह बता दी, जो यह थी कि वहाँ का सूबेदार गाँवों से दो बार वसूल रहा था और एक बार जमा कर रहा था। सूबेदार बादशाह की ख़ालाज़ाद बहन का बेटा था।

दरबार में उस दिन बात बढ़ गई। बादशाह ने कहा कि बिना सुबूत के किसी पर उँगली नहीं उठाई जाती। बीरबल ने कहा कि सुबूत माँगे जाने पर आ जाएगा, पर माँगा किसी ने नहीं। यह वाक्य कहते ही उन्हें लगा कि इसे नहीं कहना चाहिए था।

बादशाह उठ खड़े हुए। "तुम्हारे पास हर बात का जवाब है।" "जहाँपनाह, यह..." "कल सुबह मुझे रेत की एक रस्सी चाहिए। दस हाथ लंबी। नहीं ला सके तो अपनी जगह ख़ाली कर देना।"

दरबार ख़ाली हुआ तो अज़ीज़ ने बीरबल के पास आकर धीरे से कहा कि माफ़ी माँग लेना सबसे आसान रास्ता है और बादशाह का ग़ुस्सा रात भर नहीं टिकता। उन्होंने जवाब दिया कि रास्ता तो आसान है, पर उससे बंगाल का लगान वापस नहीं आएगा।

वे शाम को घर नहीं गए। वे रस्सी बटने वालों के मोहल्ले में गए, जो यमुना की तरफ़ ढलान पर था और जहाँ पूरे दिन मूँज भिगोई जाती थी।

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जुगल वहाँ का सबसे पुराना कारीगर था और उसकी उम्र सत्तर के आसपास थी। उसके आँगन में चरख़ा गड़ा था और ज़मीन पर तीन अधबटी रस्सियाँ बिछी थीं। उसने बीरबल को पहचाना नहीं और उन्हें बैठने को पीढ़ा दे दिया।

"रस्सी किस चीज़ की बनती है?" "जो चीज़ लंबी हो और टूटे नहीं। मूँज, सन, नारियल का जटा, चमड़ा। बाल की भी बनती है।" "रेत की?" जुगल हँसा। फिर उसने हँसना बंद किया और सोचकर कहा, "रेत की नहीं बनती। रेत में पकड़ नहीं होती।"

जुगल ने उन्हें बताया कि मूँज को कम से कम दो दिन भिगोना पड़ता है, और अगर एक दिन भिगोकर बट दी जाए तो रस्सी बनते वक़्त सही लगती है और महीने भर में हाथ में आ जाती है। उसने यह भी बताया कि बटते वक़्त ऐंठन एक ही तरफ़ रखनी होती है और अगर बीच में तरफ़ बदल जाए तो रस्सी उसी जगह से खुलती है, चाहे बीस बरस बाद खुले। बीरबल ने पूछा कि यह सब कहाँ से सीखा, और जुगल ने कहा कि जहाँ से सब सीखते हैं, यानी रस्सी टूटने से।

बीरबल ने पूछा कि अगर कोई उससे रेत की रस्सी माँग ले तो वह क्या करेगा।

जुगल ने चरख़ा घुमाना बंद किया। "मैं पूछूँगा कि कितनी मोटी चाहिए। और नमूना दिखाइए।" "नमूना क्यों?" "बिना नमूने के मैं किसी की रस्सी नहीं बटता, साहब। हर आदमी की पकड़ अलग होती है। जो कहे कि नमूना नहीं है, उसे रस्सी नहीं चाहिए, कुछ और चाहिए।"

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बीरबल उस रात वहीं बैठे रहे और जुगल तीसरी रस्सी पूरी करता रहा। जाते हुए उन्होंने उससे बटी हुई मूँज का एक टुकड़ा माँगा, बालिश्त भर, और उसे अपनी जेब में रख लिया।

सुबह दरबार भरा हुआ था और ख़बर सबको थी। कुछ लोग सिर्फ़ यही देखने आए थे कि क्या होता है, और उनमें वे भी थे जो बीरबल के सामने रोज़ झुककर सलाम करते थे। बीरबल ख़ाली हाथ आए, सलाम किया और अपनी जगह पर खड़े हो गए।

"रस्सी कहाँ है?" बादशाह ने पूछा।

"बन जाएगी, जहाँपनाह। एक अड़चन है। रेत की रस्सी में मोटाई का बहुत फ़र्क़ पड़ता है और मुझे मालूम नहीं कि आपको कितनी मोटी चाहिए। ख़ज़ाने में पुरानी वाली रखी होगी। वह मँगवा दीजिए। मैं उसी नाप की बटवा दूँगा।"

दरबार में कोई नहीं हँसा, क्योंकि किसी को यक़ीन नहीं था कि हँसना चाहिए।

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बादशाह उन्हें देखते रहे और उनका चेहरा नहीं बदला। फिर उन्होंने पूछा कि अगर ख़ज़ाने में पुरानी न निकली तो।

"तो यह मान लिया जाएगा कि यह चीज़ पहले कभी नहीं बनी, और जो पहले कभी नहीं बनी उसका नमूना नहीं होता, और बिना नमूने के कोई कारीगर काम शुरू नहीं करता। यह मैंने रात में सीखा है, जहाँपनाह, और सिखाने वाला रस्सी बटता है।"

बादशाह बैठ गए। उन्होंने जेब वाली बात नहीं पूछी, पर बीरबल ने मूँज का वह टुकड़ा निकालकर मेज़ पर रख दिया और कहा कि यह असली रस्सी का नमूना है, और असली रस्सी बटवाने में उन्हें कोई अड़चन नहीं।

उस दिन के बाद बंगाल की बात दोबारा नहीं उठी, तीन हफ़्ते तक।

चौथे हफ़्ते बादशाह ने ख़ुद वहाँ दो आदमी भेजे, बिना किसी को बताए, और उनसे कहा कि वे गाँवों में जाएँ और यह पूछें कि लगान कितनी बार दिया गया। दोनों लौटे तो जो बताया वह वही था जो बीरबल ने कहा था। सूबेदार बदला गया और उस पर मुक़दमा नहीं चला।

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मूँज का वह टुकड़ा बादशाह की मेज़ पर पड़ा रहा और महीनों बाद तक वहीं दिखता रहा, और किसी ख़ादिम ने उसे उठाकर फेंकने की हिम्मत नहीं की क्योंकि किसी को नहीं मालूम था कि वह वहाँ क्यों है।