अल्लारक्खा का आदमी सुबह-सुबह धौलू के खेत की मेंड़ पर खड़ा था और उसके हाथ में रस्सी थी। वह नाप ले रहा था। धौलू ने उसे देखा और भागकर नहीं आया, वह धीरे-धीरे आया, क्योंकि उसे मालूम था कि भागने से नाप नहीं रुकेगी।

क़र्ज़ चार बरस पहले लिया गया था। बाईस रुपये, बहन की शादी के लिए। यह बात दोनों मानते थे और इस पर कोई झगड़ा नहीं था।

झगड़ा इस बात पर था कि धौलू कहता था कि उसने तीन बरस पहले अनाज देकर वह क़र्ज़ चुका दिया है, और अल्लारक्खा कहता था कि उसने कभी कुछ नहीं दिया।

रसीद नहीं थी। धौलू ने माँगी भी नहीं थी, क्योंकि अनाज उसने ख़ुद जाकर अल्लारक्खा के भंडार में उतारा था, दिन में, और उसे लगा था कि इससे बड़ा सुबूत क्या होगा।

पंचायत बैठी और उसने कहा कि जिसके पास लिखा हुआ है उसकी बात मानी जाएगी, और लिखा हुआ सिर्फ़ क़र्ज़ का था। ब्याज जोड़कर अब रक़म इकतालीस रुपये बैठ रही थी और उतने की ज़मीन धौलू के पास कुल तीन बीघा थी।

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उसका बड़ा लड़का उसे लेकर आगरा गया।

उन तीन बरसों में धौलू ने यह बात चार बार उठाई और चारों बार उससे रसीद माँगी गई। दूसरे बरस उसने अपने साथ उन दो आदमियों को ले जाना चाहा जो उस दिन भंडार के बाहर खड़े थे, पर उनमें से एक तब तक मर चुका था और दूसरा दूसरे गाँव जा बसा था। तीसरे बरस उसने बड़ी बेटी की शादी टाल दी। चौथे बरस उसने मानना शुरू कर दिया कि शायद उसे ही ग़लत याद है, और यही सबसे बुरा था।

बीरबल के सामने अल्लारक्खा भी आया। वह घबराया हुआ नहीं था और उसने अपनी बात बहुत साफ़ रखी। उसने कहा कि वह तीस बरस से यह काम कर रहा है, कि उसका हिसाब कभी ग़लत नहीं निकला, और कि अगर हर आदमी यह कहने लगे कि उसने बिना रसीद के चुका दिया तो कोई किसी को उधार नहीं देगा।

यह बात भी सही थी और बीरबल ने उससे यह कहा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सुबूत नहीं निकला तो फ़ैसला उसी के हक़ में जाएगा, और इस पर अल्लारक्खा ने सिर हिला दिया।

फिर उन्होंने धौलू से पूछा कि उसने कितना अनाज दिया था।

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"सोलह पैली।" "किसकी पैली से नापा?" "उन्हीं की। भंडार में उन्हीं की रखी रहती है।" "किसने नापा?" "उनके मुनीम ने। मैं बोरी उलटता गया, वह नापता गया।"

बीरबल ने यह सब लिखवाया। फिर उन्होंने अनाज का उस साल का भाव मँगवाया, वह साल जिसमें धौलू के मुताबिक़ उसने अनाज दिया था।

उस साल भाव नीचा था। सोलह पैली अनाज का दाम उस भाव पर, ब्याज मिलाकर, ठीक उतना बैठता था जितना उस दिन तक धौलू पर बाक़ी था। कम नहीं, ज़्यादा नहीं।

यह अपने आप में सुबूत नहीं था। कोई भी आदमी बैठकर हिसाब लगा सकता है और फिर वही संख्या बोल सकता है।

पर एक बात थी।

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दो बरस पहले सरकारी हुक्म से अनाज नापने का पैमाना बदला गया था। पूरे सूबे में एक ही नाप तय हुई थी, नई पैली छोटी थी, और पुराने पैमाने जमा करवा लिए गए थे। हर नए पैमाने पर ठप्पा लगता था और बिना ठप्पे वाले पैमाने से नापना जुर्म था।

सोलह पुरानी पैली और सोलह नई पैली में इतना फ़र्क़ था कि दूसरी सूरत में दाम पूरा नहीं बैठता। कहीं से नहीं बैठता।

"अगर यह आदमी आज बैठकर झूठ गढ़ता," बीरबल ने कहा, "तो वह आज की पैली से गिनकर संख्या बताता, क्योंकि आज उसी से नापा जाता है। इसने जो संख्या दी है वह सिर्फ़ पुरानी पैली में सही बैठती है। और पुरानी पैली तीन बरस पहले चलती थी।"

अल्लारक्खा ने कहा कि यह सब अंदाज़ा है।

बीरबल ने कमरुद्दीन को उसके भंडार में भेजा।

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पैमाना वहीं मिला, बोरियों के पीछे वाली कोठरी में, लकड़ी का, किनारे से घिसा हुआ, और उस पर कोई ठप्पा नहीं था। नई वाली भी वहीं रखी थी, ठप्पे वाली, आगे की तरफ़।

अल्लारक्खा ने कहा कि पुरानी वह इसलिए रखे हुए है कि उसमें उसके पिता का नाम खुदा है। यह बात भी सच थी और वह नाम सचमुच वहाँ खुदा हुआ था।

उसे रखने की सज़ा अलग थी और उसका फ़ैसला कोतवाली ने किया। धौलू का क़र्ज़ चुका हुआ मान लिया गया और उसकी ज़मीन की नाप वहीं रुक गई।

बीरबल ने जाते हुए धौलू से एक बात कही, कि अगली बार अनाज उतारते वक़्त वह गाँव के दो आदमियों को साथ खड़ा कर ले, और धौलू ने कहा कि अगली बार वह क़र्ज़ ही नहीं लेगा। यह बात उसने ग़ुस्से में कही थी और वह उसे निभा नहीं पाया, क्योंकि दो बरस बाद उसके छोटे लड़के की बीमारी में उसे फिर लेना पड़ा।

वह पुराना पैमाना कोतवाली में ज़ब्त होकर पड़ा रहा और किसी ने उसे जलाया नहीं, क्योंकि उस पर एक आदमी के बाप का नाम खुदा था। वह वहीं अलमारी के ऊपर रखा रहा, ख़ाली, और उसकी घिसी हुई किनार पर धूल जमती रही।