उस सुबह दीवान-ए-आम में सत्रह अर्ज़ियाँ आईं और सोलह पर हुक्म हो गया। सत्रहवीं धौलपुर की तरफ़ के एक गाँव से थी, जिसमें कुआँ खुदवाने की दरख़्वास्त थी। गाँव का पुराना कुआँ बैठ गया था और औरतें अब डेढ़ कोस दूर से पानी ला रही थीं।
ख़र्च का अंदाज़ा दो सौ इकतालीस रुपये लगा था। बादशाह ने वह अर्ज़ी दो बार देखी और नीचे रख दी, और कहा कि इस साल इस मद में पैसा नहीं है, और यह बात सही थी।
उसी दोपहर शिकार का दल निकला।
बीहड़ धौलपुर से इस तरफ़ शुरू हो जाते हैं और वहाँ ज़मीन ऐसी है कि आधा कोस चलने पर लगता है कि आप वहीं खड़े हैं। मिट्टी की दीवारें एक जैसी हैं, नाले एक जैसे हैं, और ऊपर से देखने पर रास्ता दिखता है जो नीचे उतरते ही ग़ायब हो जाता है।
दल एक नीलगाय के पीछे बँट गया। बादशाह, मानसिंह, बीरबल और चार सवार एक तरफ़ निकल गए और बाक़ी लोग दूसरी तरफ़।
दोपहर तक यह साफ़ हो गया कि वे रास्ता भूल चुके हैं। दो बजे मशक ख़ाली हो गई। किसी ने यह ज़ोर से नहीं कहा।
जेठ नहीं था, पर बैसाख की धूप बीहड़ में सीधी नहीं लगती, वह मिट्टी की दीवारों से लौटकर लगती है, और यह ज़्यादा बुरा होता है। घोड़े पहले थके। आदमी बाद में। एक सवार दो बार गिरते-गिरते बचा और उसके बाद उसे बीच में लिया गया।
किसी ने कोई शिकायत नहीं की। मानसिंह हर आधे घंटे में ऊँची जगह चढ़कर देखते रहे और हर बार नीचे उतरकर वही कहते रहे कि उधर चलते हैं।
उन सात घंटों की बात बाद में किसी ने नहीं की। बीच में एक बार सब रुके। एक सवार ने अपनी मशक खोलकर उलटी की और उसमें से कुछ नहीं गिरा। उसने उसे दोबारा उलटा किया। फिर उसने उसे बाँधकर रख लिया। मानसिंह ने कहा कि ऊपर से नाला दिखा था और नाले में पानी होगा। नाला मिला। वह सूखा था। उसकी तली में दरारें थीं और दरारों में सफ़ेद नमक जमा था, जिसका मतलब यह था कि वहाँ पानी कई महीने से नहीं आया।
सात घंटे बाद, शाम ढलने से कुछ पहले, उन्हें एक आदमी दिखा जो नाले के ऊपरी सिरे से आ रहा था और जिसके कंधे पर भरी हुई मशक थी।
उसका नाम गंगिया था। वह उसी गाँव का था जिसकी अर्ज़ी सुबह नीचे रखी गई थी। वह हफ़्ते में तीन दिन बीहड़ के उस पार वाले कुएँ से पानी लाता था और रास्ते में उसे कोई नहीं मिलता था।
उसने मशक उतारी और बिना कुछ पूछे पहले घोड़ों को पानी दिया, क्योंकि उसे यह मालूम था कि जानवर बोल नहीं सकता। फिर उसने आदमियों को दिया।
बादशाह ने पानी पिया और फिर अपनी उँगली से अँगूठी उतार ली।
"यह रख लो।"
गंगिया ने हाथ नहीं बढ़ाया। वह पीछे भी नहीं हटा। वह उसे देखता रहा और उसे समझ नहीं आया कि यह क्या हो रहा है, और उसने मशक का मुँह बाँधना शुरू कर दिया।
बीरबल ने बादशाह का हाथ रोक दिया।
यह उन्होंने बिना कुछ कहे किया और बादशाह ने उन्हें देखा, फिर अँगूठी को देखा, फिर गंगिया को देखा, जो टूटी हुई जूती पहने खड़ा था और जिसकी मशक में तीन जगह चमड़े के पैबंद लगे थे।
"वह इसे बेचेगा कहाँ, जहाँपनाह? जिस दुकान पर ले जाएगा वहाँ से सीधा कोतवाली जाएगा। और अगर बेच भी दिया, तो जो पैसा उसे मिलेगा उसकी ख़बर तीसरे दिन उसके गाँव में पहुँच जाएगी।"
बादशाह ने अँगूठी वापस पहन ली। किसी ने कुछ नहीं पूछा।
गंगिया को उस दिन कुछ नहीं दिया गया, सिवाय इसके कि मानसिंह ने उससे रास्ता पूछा और वह दल को साढ़े तीन कोस तक साथ लेकर गया, वहाँ तक जहाँ से सराय का रास्ता सीधा था। लौटते हुए उसने अपनी ख़ाली मशक लपेट ली और पैदल चला गया।
आगरा पहुँचने में रात हो गई।
अगले दिन दीवान-ए-आम में बादशाह ने सत्रहवीं अर्ज़ी दोबारा मँगवाई। उन्होंने उस पर कोई बात नहीं की और किसी से कुछ नहीं पूछा। उन्होंने उस पर मुहर लगा दी और अगली अर्ज़ी उठा ली।
दो सौ इकतालीस रुपये उसी मद से निकले जिसमें एक दिन पहले पैसा नहीं था।
रास्ते में उससे किसी ने कुछ नहीं पूछा और उसने ख़ुद भी कुछ नहीं पूछा। वह आगे-आगे चलता रहा और बीच-बीच में रुककर पीछे देख लेता था कि सब आ रहे हैं या नहीं। जहाँ ढलान ज़्यादा थी वहाँ वह घोड़े की लगाम पकड़कर उसे उतारता था, और यह उसने चारों घोड़ों के साथ किया।
कुआँ उस बरसात के बाद खुदा और उसकी जगत अगले जाड़े में बनी। गंगिया के हफ़्ते के तीन दिन उसके बाद ख़ाली हो गए और उसने वे दिन दूसरे गाँवों में पानी पहुँचाने में लगाए, जहाँ अभी कुआँ नहीं था, और उसे इसके पैसे मिलते थे।
उस अँगूठी के बारे में बादशाह ने बाद में सिर्फ़ एक बार बात की, और तब उन्होंने यह पूछा कि अगर बीरबल हाथ न रोकते तो क्या होता। जवाब में जो कहा गया वह यह था कि गंगिया शायद अगली गर्मी नहीं देखता, और उसके बाद इस पर कोई बात नहीं हुई।