साँभर की तरफ़ से आई एक अर्ज़ी उस हफ़्ते नामंज़ूर हुई। उसमें नमक पर लगने वाली चुंगी घटाने की दरख़्वास्त थी। चुंगी बड़ी नहीं थी, मन पीछे कुछ आने, और दफ़्तर की राय यह थी कि इतने से किसी पर बोझ नहीं पड़ता।

उसी हफ़्ते दावत में बात निकली कि सल्तनत की सबसे क़ीमती चीज़ क्या है।

जगमोहन ने सोना कहा। किसी ने हाथी कहे, किसी ने घोड़े। एक ने कहा कि सबसे क़ीमती चीज़ अच्छी ज़मीन है क्योंकि बाक़ी सब उसी से निकलता है, और इस पर कई लोगों ने सिर हिलाया।

बीरबल ने कहा, "नमक।"

दरबार हँसा। जगमोहन ने कहा कि नमक तो हर घर में है और मन के भाव बिकता है। "इसीलिए," बीरबल ने कहा।

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बादशाह को यह जवाब पसंद नहीं आया और उन्होंने कहा कि यह बात कहने की नहीं, दिखाने की है।

बीरबल ने तीन दिन माँगे।

उन्होंने उसी शाम बादशाह को एक बंद पर्चा दिया और कहा कि इसे परसों शाम खोला जाए, खाने के बाद, और उससे पहले नहीं। बादशाह ने वह पर्चा अपने पास रख लिया।

फिर वे रसोई में गए।

रहमत वहाँ इकतालीस बरस से था और वह सिर्फ़ एक बात से डरता था, कि खाना लौटकर आ जाए। बीरबल ने उससे जो कहा, उसे सुनकर उसने हाथ जोड़ लिए।

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"मुझसे यह नहीं होगा।" "हुक्म मेरा है और लिखकर दे रहा हूँ।" "लिखा हुआ काग़ज़ मेरी गर्दन पर नहीं आएगा, हुज़ूर। गर्दन आएगी।"

बीरबल ने उसे वह पर्चा दिखाया जो बादशाह के पास जा चुका था, और उसमें क्या लिखा है यह भी बता दिया। उसके बाद रहमत मान गया, पर उसने उस रात खाना नहीं खाया।

अगले दिन दस्तरख़ान पर सब कुछ वैसा ही था। शोरबा, दो तरह का गोश्त, भरवाँ बैंगन, दही, रोटी, चावल। ख़ुशबू में कोई फ़र्क़ नहीं था क्योंकि मसाले पूरे थे।

नमक कुल मिलाकर उतना डाला गया था जितना एक मज़दूर के घर में महीने भर चलता है, और वह पूरे दस्तरख़ान में बाँट दिया गया था।

रहमत ने उस दिन रसोई में सबको यह नहीं बताया कि क्या हो रहा है। उसने नमक की सारी हांडियाँ भीतर वाली कोठरी में रखवा दीं और उस पर ताला डाल दिया, और चाबी अपने पास रखी। दो हलवाइयों ने पूछा। उसने कहा कि हुक्म है। उसके बाद उसने पूरे दिन में किसी से कोई बात नहीं की और तीन बार बाहर जाकर देख आया कि दस्तरख़ान बिछ रहा है या नहीं।

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पहला निवाला किसी को अटपटा लगा और किसी ने कुछ नहीं कहा। तीसरे निवाले पर जगमोहन ने कटोरी में उँगली डालकर चखा। पाँचवें पर एक दरबारी ने ख़ादिम को इशारा किया।

फिर सब एक साथ बोलने लगे।

किसी ने रोटी छोड़ दी। किसी ने दही में नमक माँगा और जो कटोरी आई वह लगभग ख़ाली थी। एक ने कहा कि गोश्त ख़राब है, हालाँकि गोश्त ठीक था। दस मिनट में दस्तरख़ान पर बैठे इकतीस आदमियों में से उन्नीस खाना छोड़ चुके थे।

बादशाह ने भी छोड़ दिया। उन्होंने दो निवाले लिए थे और तीसरा नहीं लिया।

रहमत दरवाज़े के पास खड़ा था और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था। दो दरबारी उसका नाम ले चुके थे।

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उन्नीस लोगों के उठने के बाद जो चुप्पी आई वह कुछ देर की नहीं थी। ख़ादिम बरतन उठाने आए और उन्हें रोक दिया गया। दो दरबारी बैठे रहे और खाते रहे, और उनमें एक वह था जिसने सबसे पहले शोर मचाया था, और अब वह इसलिए खा रहा था कि उठ नहीं सकता था। बादशाह ने अपनी थाली की तरफ़ देखा और उसे आगे नहीं सरकाया।

तब बादशाह ने पर्चा निकाला।

उसमें तीन लाइनें थीं। पहली में लिखा था कि यह बीरबल का किया हुआ है और रसोई का कोई आदमी इसका ज़िम्मेदार नहीं। दूसरी में लिखा था कि आज के खाने में नमक उतना ही है जितना साँभर वाली अर्ज़ी में लिखे भाव पर एक मज़दूर का घर महीने भर में ख़रीद पाता है। तीसरी में कुछ नहीं लिखा था, सिर्फ़ एक तारीख़ थी, उस अर्ज़ी के नामंज़ूर होने की।

बादशाह ने वह पर्चा दो बार पढ़ा और फिर उसे मेज़ पर रख दिया।

"सोने के बिना यह दस्तरख़ान वैसा ही लगता जैसा लग रहा था," बीरबल ने कहा। "नमक के बिना उन्नीस आदमी उठ गए। जो चीज़ इतनी सस्ती है कि उस पर कोई ध्यान नहीं देता, उस पर चुंगी लगाने से पहले यह देख लेना चाहिए कि उसे कौन ख़रीदता है।"

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चुंगी उस बरस आधी हो गई और अगले बरस साँभर के रास्ते पर एक और नाका बंद कर दिया गया।

जगमोहन ने उस दिन के बारे में दोबारा कभी बात नहीं की। साँभर से जो अगली अर्ज़ी आई वह चुंगी की नहीं थी, रास्ते की मरम्मत की थी, और वह पहले ही हफ़्ते में मंज़ूर हो गई।

रहमत को कुछ नहीं हुआ। उसने उसके बाद रसोई में नमक की कटोरी हमेशा भरी रखनी शुरू कर दी, ज़रूरत से कहीं ज़्यादा भरी, और यह आदत उसने आख़िर तक नहीं छोड़ी।