नागौर से आया काफ़िला सराय के बाहर बैठा था और उसके सत्रह ऊँट जुगाली कर रहे थे। बादशाह उस सुबह घोड़े पर निकले थे और लौटते हुए वहीं रुक गए। वे काफ़ी देर उन जानवरों को देखते रहे, फिर उन्होंने बीरबल से एक सवाल पूछा जो उनके मन में शायद बरसों से था।
"ऊँट की गर्दन टेढ़ी क्यों होती है?"
बीरबल ने ऊँटों की तरफ़ देखा और फिर बादशाह की तरफ़। "सुना है कि जो अपना कहा पूरा नहीं करता, उसकी गर्दन इसी तरह मुड़ जाती है, जहाँपनाह।"
बादशाह हँसे और घोड़ा आगे बढ़ा दिया। दोपहर तक वे उस बात को भूल चुके थे।
शाम को खाने के बाद वे बरामदे में बैठे थे और सामने वही सत्रह ऊँट सराय के पास बैठे दिख रहे थे। उन्होंने बीरबल को बुलवाया। "तुमने सुबह जो कहा था, वह किसके लिए कहा था?" "जिसके लिए भी लागू होता हो, जहाँपनाह।" "साफ़ कहो।"
बीरबल ने उस आदमी का नाम लिया जिसे दरबार में कोई नहीं जानता था, कल्याण।
कल्याण जोधपुर की तरफ़ का पत्थर तराशने वाला था और चार महीने पहले उसे सीकरी बुलवाया गया था। उसे और उसके ग्यारह आदमियों को हरम के पास वाले हौज़ की जगत बदलनी थी। काम पैंतालीस दिन में पूरा हो गया था और मज़दूरी का पर्चा दीवान के दफ़्तर में उसी हफ़्ते पहुँच गया था।
वह पर्चा चार महीने से वहीं पड़ा था, उसी दफ़्तर में, उसी अलमारी में।
सराय में वे बारह आदमी एक ही कोठरी में रहते थे, जो काफ़िलों के मौसम में उन्हें छोड़नी पड़ती थी। तब वे बाहर बरामदे में सोते थे। कल्याण हर दस-बारह दिन में दीवान के दफ़्तर जाता और वहाँ बैठा रहता, और उससे कोई बदतमीज़ी से पेश नहीं आता था, बस हर बार यही कहा जाता कि पर्चा ऊपर गया हुआ है। उसने चार महीने में सत्रह बार यही सुना और सत्रहों बार वापस आकर अपने आदमियों से कहा कि हो जाएगा।
"मुझे यह किसने बताया नहीं?" "आपको बताया गया था, जहाँपनाह। तीन बार।"
पहली बार टोडरमल ने बताया था, दीवान-ए-आम में, और बादशाह ने कहा था कि हो जाएगा। दूसरी बार ख़ुद बीरबल ने बताया था, शिकार पर जाते हुए, और बादशाह ने कहा था कि याद दिलाना। तीसरी बार बीरबल ने याद दिलाया था और बादशाह उस दिन किसी और बात में लगे थे।
"वह आदमी अब कहाँ है?" "सराय में है। चार महीने से है।"
बादशाह उठ खड़े हुए। "बुलाओ उसे।"
कल्याण आया तो उसके कपड़े साफ़ थे और चेहरा सूखा हुआ था। उसने झुककर सलाम किया और खड़ा हो गया। बादशाह ने पूछा कि वह लौटा क्यों नहीं। "आदमी बारह हैं, हुज़ूर। मज़दूरी उनकी भी बाक़ी है। मैं अकेला लौट जाता तो वे क्या कहते।" "चार महीने खाया कहाँ से?" "पहले महीने अपने पास से। फिर सराय वाले ने उधार दिया। पिछले महीने से हम लोग वहीं ईंट ढो रहे हैं।"
बादशाह ने यह सुना और कुछ नहीं पूछा। उन्होंने दीवान के दफ़्तर से पर्चा उसी रात मँगवाया। वह मिला भी, तीसरी अलमारी में, दूसरी गड्डी में, ऊपर से नौवें नंबर पर रखा हुआ।
उस पर बादशाह की अपनी मुहर के लिए जगह ख़ाली छोड़ी गई थी।
"इस पर मुहर लगनी थी।" "जी, जहाँपनाह।" "और तुम तीन बार कह चुके थे।" "चार बार, जहाँपनाह। सुबह ऊँट के बारे में भी मैंने यही कहा था।"
बादशाह ने मुहर मँगवाई और वहीं लगा दी। फिर उन्होंने कहा कि बारहों को चार महीने की मज़दूरी अलग से दी जाए, इस बात के लिए कि उन्हें रुकना पड़ा, और सराय वाले का उधार दीवान का दफ़्तर चुकाए।
"और ईंट ढोने का?" "वह उन्होंने ख़ुद किया, हुज़ूर। उसका पैसा उन्हें मिल चुका है।"
अगली सुबह कल्याण को बुलाकर थैली दी गई, और उसने उसे गिना तक नहीं। उसने पूछा कि क्या वह अपने आदमियों को अभी बुला ले, और बादशाह ने कहा कि बुला ले।
थैली खुलने से पहले उन बारह में से एक ने कल्याण से पूछा कि हिसाब किस भाव से लगा है, और कल्याण ने कहा कि उसे भी नहीं मालूम, गिनने पर पता चलेगा। यह सुनकर वह आदमी हँस पड़ा और बोला कि चार महीने में पहली बार कल्याण ने यह नहीं कहा कि हो जाएगा।
बारहों आदमी आँगन में खड़े थे जब पैसा बाँटा गया, और उनमें से चार ऐसे थे जिन्होंने चार महीने में एक बार भी अपने घर ख़बर नहीं भेजी थी क्योंकि भेजने को कुछ था नहीं।
कल्याण जाते हुए बादशाह के सामने रुका और उसने कहा कि हौज़ की जगत का एक पत्थर उसे पसंद नहीं आया था और वह उसे बदलकर जाना चाहता है। उसे इसका पैसा नहीं चाहिए।
बादशाह ने पूछा कि कौन सा पत्थर। "उत्तर वाले कोने से तीसरा। उसमें रेशा है। दो बरसात में चटख जाएगा।" "चार महीने पहले क्यों नहीं बदला?" "तब मालूम नहीं था, हुज़ूर। इन चार महीनों में मैं रोज़ उसके पास से गुज़रा हूँ।"
पत्थर बदला गया और कल्याण उसके बाद जोधपुर चला गया। दीवान के दफ़्तर में उस साल से यह तय हुआ कि जिस पर्चे पर मुहर की जगह ख़ाली हो, वह अलमारी में नहीं, मेज़ पर रखा जाएगा।
नागौर वाला काफ़िला दो दिन बाद आगे बढ़ गया। बादशाह उसके बाद कई बार सराय के सामने से गुज़रे, और हर बार उन्होंने ऊँटों की तरफ़ देखा, और बीरबल ने कभी उस सुबह वाली बात दोबारा नहीं छेड़ी।