पौ फटने से पहले आठ दरबारी हौज़ के ठंडे पानी में कमर तक खड़े थे। जेठ का महीना था, पर सुबह के उस पहर में पत्थर अब भी रात की ठंडक पकड़े हुए था, और किसी के दाँत बज रहे थे। किनारे पर बादशाह चौकी पर बैठे थे, चादर ओढ़े, और उनके सामने पीतल की एक ख़ाली टोकरी रखी थी जिसमें थोड़ी देर पहले तक आठ अंडे थे।

बात एक रात पहले शुरू हुई थी। खाने के बाद फ़तेह ने कहा था कि अक़्लमंदी की परख बातों से नहीं होती, मौक़े से होती है, और मौक़ा वह होता है जो अचानक आए। बादशाह को यह बात पसंद आई। उन्होंने कहा कि कल सुबह मौक़ा दिया जाएगा।

सुबह उन्होंने आठ अंडे हौज़ में डलवाए और कहा कि हर आदमी पानी में उतरे और एक अंडा निकालकर लाए। जो ख़ाली हाथ लौटे, वह अपनी अक़्ल का दावा आज के लिए छोड़ दे।

हौज़ बड़ा नहीं था पर उसका फ़र्श काई से फिसलन भरा था और पानी छाती तक आता था। अंडे तली में जाकर अलग-अलग बिखर गए थे। अमरचंद ने पहले ढूँढ़ा और उसे सबसे पहले मिला भी। जमाल दो बार डुबकी लगाकर ख़ाली निकला और तीसरी बार में उसके हाथ आया। फ़तेह को अपना अंडा किनारे के पास मिला, जहाँ उसने ख़ुद खड़े होकर देखा था कि वह जा गिरा है।

यह देखने लायक़ था। जमाल हर डुबकी के बाद ऊपर आकर पहले साँस लेता, फिर अपनी पगड़ी सँभालता, जो उसने उतारने से मना कर दिया था। अमरचंद ने अपना अंडा मिलते ही मुट्ठी में इतना कस लिया कि वह वहीं टूट गया, और उसे दोबारा उतरना पड़ा। एक दरबारी दो बार फिसला और दूसरी बार उसने काई भरे फ़र्श पर हाथ टिकाकर ख़ुद को सँभाला और उसके बाद वह पानी में बहुत धीरे चला।

📚 यह भी पढ़ें अंधों की सूची
अंधों की सूची

आधे घंटे में आठ में से आठ अंडे निकल आए और आठों आदमी ऊपर आ गए, भीगे हुए, हाँफते हुए, और ख़ुश।

बीरबल तब तक नहीं आए थे।

वे उस रात आगरा से बाहर थे। उनकी माँ के गाँव में कुएँ की जगत टूट गई थी और वे राजगीर के साथ नाप लेने गए थे। लौटते हुए बैलगाड़ी का धुरा बैठ गया और उन्होंने आख़िरी छह कोस पैदल तय किए।

रात कुएँ की जगत की नाप लेते-लेते बीत गई थी। राजगीर बूढ़ा था और उसे अँधेरे में गज़ पकड़ने में दिक़्क़त हो रही थी, इसलिए बीरबल ने ख़ुद एक सिरा पकड़ा और वे दोनों तीन बार नापते रहे जब तक दोनों बार एक ही नाप नहीं आ गई। बैलगाड़ी का धुरा उसके बाद बैठा, आधी रात के क़रीब, और गाड़ीवान ने कहा कि सुबह तक ठीक हो जाएगा। बीरबल ने इंतज़ार नहीं किया।

फ़तेह को यह सब मालूम था। यह भी मालूम था कि बीरबल सुबह देर से पहुँचेंगे। उसने बादशाह से रात को यह नहीं कहा।

📚 यह भी पढ़ें कौवों की गिनती
कौवों की गिनती

बीरबल जब हौज़ के पास पहुँचे तो धूप निकल चुकी थी और उनके जूतों पर छह कोस की धूल थी। बादशाह ने उन्हें देखा और मुस्कुराए। "देर हो गई। खेल ख़त्म हो चुका है।" "क्या खेल था, जहाँपनाह?"

बादशाह ने बताया। बीरबल ने आठों दरबारियों को देखा, जो भीगे कपड़ों में खड़े थे, और फिर ख़ाली टोकरी को देखा।

"अब तो कोई अंडा बचा नहीं," फ़तेह ने कहा। "पर आप चाहें तो देख आइए।"

बीरबल ने जूते उतारे, कमरबंद कसा और पानी में उतर गए। वे तली तक गए, एक कोने से दूसरे कोने तक गए, और तीन बार डुबकी लगाई। पानी हिलता रहा और फिर शांत हो गया।

वे ख़ाली हाथ ऊपर आए। पानी उनकी दाढ़ी से टपक रहा था। वे सीढ़ियों पर चढ़े, बादशाह के सामने आकर सीधे खड़े हुए, गर्दन थोड़ी ऊपर उठाई और ज़ोर से बाँग दी।

📚 यह भी पढ़ें बैंगन की तारीफ़
बैंगन की तारीफ़

आवाज़ हौज़ के तीनों तरफ़ की दीवारों से टकराकर लौटी। परकोटे पर बैठे कबूतर एक साथ उड़ गए। किसी ने भी वह आवाज़ किसी आदमी के मुँह से पहले नहीं सुनी थी।

बादशाह ने चादर हटा दी। "यह क्या है?"

"अंडा मुर्गियाँ देती हैं, जहाँपनाह। मुर्गा नहीं देता। मुर्गा सिर्फ़ बाँग देता है, और वह मैंने दे दी।"

आठों दरबारी चुप खड़े रहे और उनके कपड़ों से पानी पत्थर पर टपकता रहा। बादशाह देर से हँसे, पर जब हँसे तो काफ़ी देर तक हँसते रहे।

"तुम्हें कैसे मालूम कि एक भी अंडा नहीं बचा है? तुम तो अभी आए हो।" "टोकरी ख़ाली थी और आठों भीगे हुए थे। आठ अंडे, आठ आदमी। मुझे नौवाँ ढूँढ़ने जाना ही नहीं था। मैं पानी में इसलिए उतरा कि आप कह न दें कि मैंने कोशिश नहीं की।"

📚 यह भी पढ़ें अंधों की सूची
अंधों की सूची

फ़तेह ने उस दिन कुछ नहीं कहा। हफ़्ते भर बाद उसने बादशाह से कहा कि अगली बार कोई खेल हो तो सबको एक ही घड़ी में ख़बर की जाए, और बादशाह ने पूछा कि यह बात उसके मन में अभी क्यों आई। फ़तेह के पास इसका जवाब नहीं था।

पीतल की वह टोकरी परिंदख़ाने वालों को दे दी गई और उसमें अब दाना रखा जाता है। हौज़ की काई हर बरसात में लौट आती है और उसे साफ़ करवाने का हुक्म अब तक किसी ने नहीं दिया।