होली के तीन दिन बाद तक आगरा के बाज़ार में रंग सूख नहीं पाया था। दीवारों पर गुलाल की धारियाँ थीं और नाली का पानी अब भी हल्का गुलाबी बह रहा था। बीरबल उसी बाज़ार से गुज़र रहे थे जब उन्होंने सुजान को देखा, जो अपनी दुकान के बाहर बैठा चारपाई बुन रहा था और बुनते-बुनते सामने से गुज़रने वाले हर आदमी से हाल पूछ रहा था।

बीरबल रुके और उन्होंने पूछा कि वह किसका इंतज़ार कर रहा है। "किसी का नहीं। बान ख़त्म हो गया है और बनिया कल से टाल रहा है।" "तो माँगा क्यों नहीं?" "माँगा था। उसने कहा भिजवा देता हूँ।"

अगले दिन दीवान-ए-आम में बादशाह ने एक अजीब बात कही। उन्होंने कहा कि शहर में अंधों की तादाद बढ़ती जा रही है और ख़ैरात का हिसाब ठीक से नहीं बैठ रहा, इसलिए एक सूची बनवाई जाए। जिसे दिखाई न देता हो, उसका नाम उसमें आए, और महीने के आख़िर में उन सबको अनाज बँधा दिया जाए।

काम बीरबल के ज़िम्मे आया।

उन्होंने रूपचंद को साथ लिया, जो दफ़्तर के सबसे तेज़ लिखने वालों में थे, और दोनों उसी दिन शहर में निकल गए। पर बीरबल ने रूपचंद से कहा कि वे किसी से यह नहीं पूछेंगे कि उसे दिखाई देता है या नहीं। वे बस चलेंगे, और बीरबल जो कहें वह लिखा जाए।

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पहला ठिकाना जामा मस्जिद की सीढ़ियाँ थीं। वहाँ चार आदमी बैठे थे जिन्हें सचमुच दिखाई नहीं देता था। चारों के नाम लिखे गए। रूपचंद को लगा कि काम आसान है।

फिर बीरबल तेलियों के मोहल्ले में गए और एक दुकान के सामने खड़े हो गए। दुकानदार तराज़ू में तेल तौल रहा था। बीरबल कुछ नहीं बोले, बस खड़े रहे। दुकानदार ने उन्हें देखा, फिर तराज़ू देखा, फिर उनसे पूछा कि क्या चाहिए। बीरबल ने कहा कुछ नहीं, और आगे बढ़ गए। "नाम लिख लो," उन्होंने रूपचंद से कहा। "इसका? इसे तो दिखता है।" "पासंग नीचे दबा हुआ था और उसने नहीं देखा। तीन बरस से नहीं देखा होगा।"

उस दिन शाम तक सूची में ग्यारह नाम थे। उनमें से सिर्फ़ चार वे थे जिनकी आँखें काम नहीं करती थीं। बाक़ी सात में एक कोतवाल का मुंशी था, एक पीतल का बरतन बेचने वाला, और एक वह बनिया जो सुजान को चार दिन से बान भिजवाने का कह रहा था।

अगली सुबह वे चौक के एक बड़े घर के सामने रुके। भीतर से एक औरत निकली और उसने अपने बेटे को पुकारा, जो आँगन पार करके आया। लड़का बाएँ पैर पर पूरा वज़न नहीं डाल रहा था और यह हर क़दम पर दिख रहा था। बीरबल ने घर का नाम पूछकर लिखवा लिया। "लड़का लँगड़ाता है।" "तो नाम लड़के का लिखूँ?" "माँ का लिखो।"

तीसरे दिन वे दफ़्तर के भीतर ही रुक गए, जहाँ एक मुंशी बैठा हिसाब उतार रहा था। बीरबल ने उसका काग़ज़ उठाकर देखा और वापस रख दिया। मालगुज़ारी के एक गाँव का नाम उसने चार पन्नों में तीन बार एक ही ग़लत तरीक़े से लिखा था, और चौथी बार सही लिखा था, और चारों बार उसे यह ध्यान नहीं आया कि वह वही गाँव है। उसका नाम भी सूची में गया।

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रूपचंद ने रात को लिखते हुए हाथ रोक लिया। "यह सूची जब पढ़ी जाएगी तो झगड़ा होगा।" "होगा।" "और आपका नाम?" बीरबल ने काग़ज़ अपनी तरफ़ खींचा और सबसे नीचे अपना नाम ख़ुद लिखा। बारहवाँ।

अगले पाँच दिन में सूची सत्रह पर पहुँची।

जिस दिन वह दरबार में पढ़ी गई, उस दिन नाम सुनते ही हल्ला मच गया। कोतवाल का मुंशी खड़ा होकर चिल्लाया कि उसकी दोनों आँखें सही हैं। बनिया आगे आकर बोला कि उसने बान भिजवा दिया था, बस दो दिन देर हुई। बीरबल ने दोनों की बात सुनी और किसी का नाम नहीं काटा।

बादशाह ने सूची अपने हाथ में ली और ऊपर से नीचे तक पढ़ी। फिर उन्होंने उसे उलट कर पीछे देखा।

"इसमें अठारहवाँ नाम मेरा नहीं है।" "नहीं है, जहाँपनाह।" "क्यों नहीं है?" "आपने अंधों की सूची माँगी थी। मैं उन लोगों के नाम लाया हूँ जो देखने की जगह पर होते हुए नहीं देखते। आपका नाम लिखने के लिए मुझे यह जानना पड़ता कि आपने पिछले महीने कितनी अर्ज़ियाँ पढ़े बिना नीचे रख दीं। वह हिसाब मेरे पास नहीं है।"

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दरबार में इसके बाद कोई नहीं बोला। बादशाह ने सूची नीचे रखी, फिर उठाई, फिर रख दी।

"अनाज सत्रह को बँधेगा या चार को?" "चार को, जहाँपनाह। बाक़ी तेरह को अनाज की ज़रूरत नहीं है।" "तो उनका नाम क्यों लिखा?" "क्योंकि आपने गिनती माँगी थी, ख़ैरात नहीं।"

उस महीने ख़ैरात चार लोगों को गई और सूची दफ़्तर में रख दी गई। पंद्रह दिन बाद कोतवाल के मुंशी ने अपनी मेज़ का रुख़ बदलवा लिया ताकि दरवाज़ा उसके सामने पड़े। बनिया ने सुजान को बान भिजवाया, और साथ में एक बोरी और भेजी जो सुजान ने माँगी नहीं थी। सुजान ने वह बोरी लौटा दी और बान रख लिया।

दफ़्तर में वह काग़ज़ अब भी है, तह किया हुआ, और उसके सबसे नीचे बीरबल का अपना नाम बारहवें नंबर पर लिखा हुआ है, जिसे उन्होंने कभी कटवाया नहीं।