जेठ की उस दोपहर हौज़ के किनारे खड़े होकर देखने पर पानी साफ़ दिख रहा था और तली के पत्थर गिने जा सकते थे। बीरबल ने झुककर उसमें उँगली डाली, बाहर निकाली और उसे धूप में देखा। उँगली पर कुछ नहीं लगा था।
हुक्म पाँच दिन पहले निकला था। बरसात दो बरस से कम हुई थी और आगरा के आसपास के चार परगनों में जो लोग बिना अनाज के रह गए थे, उनके लिए एक बड़ा भंडारा तय हुआ था। बादशाह ने कहा था कि अनाज सरकार देगी और दूध शहर देगा। हर घर से रात में एक लोटा। कोई और शर्त नहीं थी और किसी से रसीद नहीं ली जानी थी।
हौज़ बीच चौक में था, पत्थर का, और उसे सुबह ही ख़ाली करके धुलवा दिया गया था।
मोतिया के घर में उस शाम इसी पर बात हुई थी। उसकी सास ने कहा कि दूध डालना ही चाहिए क्योंकि हुक्म बादशाह का है, और मोतिया ने कहा कि डालेंगे ही, पर घर में बच्चा है और सुबह उसे क्या दिया जाएगा। दोनों ने काफ़ी सोचा और फिर यह तय हुआ कि आधा दूध और आधा पानी डाल दिया जाएगा, क्योंकि उतने बड़े हौज़ में आधा लोटा पानी किसी को नहीं दिखेगा। लोटा लेकर जो गया वह मोतिया का देवर था, और उसने रास्ते में सोचा कि जब आधा चल सकता है तो पूरा क्यों नहीं चलेगा, और उसने घर लौटकर किसी को यह नहीं बताया।
उस रात लोग आते रहे। किसी ने किसी को नहीं देखा, क्योंकि देखने की ज़रूरत नहीं थी। हर आदमी अँधेरे में आता, सीढ़ी चढ़ता, लोटा उलटता और लौट जाता। सुबह हौज़ किनारे तक भरा हुआ था।
और उसमें दूध की एक बूँद नहीं थी, न ऊपर तैरती मलाई, न तली में बैठा कोई निशान।
कोतवाल सुबह से लोगों को पकड़ रहा था जब बीरबल पहुँचे। उन्होंने कोतवाल से कहा कि वह किसी को न पकड़े, क्योंकि अगर पकड़ना ही है तो पूरा शहर पकड़ना पड़ेगा, और उतनी जगह नहीं है।
दोपहर तक बात दरबार पहुँच गई। बादशाह को ग़ुस्सा नहीं आया, उन्हें हैरत हुई, और यह ज़्यादा बुरा था।
"पूरे शहर ने पानी डाला?" "क़रीब-क़रीब पूरे ने, जहाँपनाह।" "एक भी आदमी नहीं जिसने दूध डाला हो?" "होंगे। दो-चार। उनका दूध इस पानी में कहीं खो गया।"
"सबने एक ही बात कैसे सोच ली?" "क्योंकि सोचने को एक ही बात थी। हर आदमी ने यही सोचा कि इतने बड़े हौज़ में उसका एक लोटा पानी किसे दिखेगा। यह बात सही थी। बस सबके लिए सही थी।"
बादशाह उठ खड़े हुए और उन्होंने कहा कि पूरे शहर पर जुर्माना लगेगा। बीरबल ने कहा कि जुर्माने से भंडारे में दूध नहीं आएगा, और भंडारा परसों है।
"तो तुम क्या करोगे?" "वही काम दोबारा करवाऊँगा, जहाँपनाह। बस अँधेरे में नहीं।"
अगली सुबह मुनादी हुई। हौज़ फिर धुला। इस बार वह दोपहर में भरा जाना था, एक-एक करके, और हर आदमी को सीढ़ी चढ़कर अपना लोटा सबके सामने उलटना था। कोई पूछताछ नहीं होनी थी और किसी का नाम नहीं लिखा जाना था।
दो सौ से ऊपर लोग क़तार में लगे। पहला आदमी चढ़ा, लोटा उलटा, और सफ़ेद धार गिरी। दूसरा चढ़ा। तीसरा चढ़ा।
सत्रहवें आदमी ने अपना लोटा उलटा तो उसमें से पानी गिरा, और सारी क़तार ने वह देखा। वह नीचे उतरा, किसी से कुछ कहे बिना अपने घर गया और थोड़ी देर बाद दूसरा लोटा लेकर लौट आया, और इस बार फिर से क़तार के आख़िर में जाकर खड़ा हो गया।
उस दिन हौज़ शाम तक भर गया।
दौलत उसी क़तार में था। उसके पास एक भैंस थी और वह उसका दूध बेचकर घर चलाता था। उसने पहली रात भी दूध डाला था, पूरा लोटा, और उस रात उसके घर में चाय बिना दूध की बनी थी। दूसरे दिन उसने फिर डाला।
यह बात किसी को नहीं मालूम होती अगर उसके पड़ोसी ने बीरबल से न कह दी होती। बीरबल ने उसे बुलवाया और पूछा कि उसने दूसरी बार क्यों डाला जबकि पहली बार का पानी में मिल चुका था। "मुझे यह थोड़ी मालूम था कि बाक़ी लोग पानी डालेंगे, हुज़ूर।" "और अब मालूम हो गया?" "अब भी मुझे उससे क्या लेना-देना।"
दरबार में बादशाह ने पूछा कि क्या किसी को सज़ा दी जाए।
"किसे, जहाँपनाह? जिन्होंने पानी डाला वे सब कल दूध डालकर आए हैं। जिसने दोनों बार दूध डाला, उसे सज़ा नहीं दी जा सकती। और यह जो हुआ, इससे यह भी पता चल गया कि अँधेरे में मँगवाई गई चीज़ आधी ही आती है।"
भंडारा हुआ और चार परगनों के लोग आए। दूध कम नहीं पड़ा और थोड़ा बच भी गया।
उस हौज़ के बारे में उसके बाद यह तय हुआ कि उसमें कुछ भी डलवाना हो तो दिन में डलवाया जाएगा। दौलत की भैंस अगले बरस बिक गई क्योंकि चारा महँगा हो गया और उसके पास उतना पैसा नहीं था कि वह उसे एक और गर्मी खिला सके। यह बात दरबार तक कभी नहीं पहुँची और पहुँचती भी तो उससे कुछ नहीं होता।