हफ़ीज़ का दावा था कि वह आँख बंद करके बता सकता है कि कपड़ा कहाँ का है। यह बात उसने दरबार में कई बार कही थी और किसी ने उसे जाँचा नहीं था, क्योंकि जाँचने की किसी को ज़रूरत नहीं थी।

फ़ैज़ू की दुकान चौक में थी और उसके यहाँ दो तरह का रेशम मिलता था। ऊपर के तख़्ते पर जो रखा रहता था उसे वह बनारसी कहता था और उसका दाम अठारह रुपये गज़ था। नीचे वाले तख़्ते पर जो था वह मक़ामी था, दो रुपये गज़।

बात तब उठी जब हफ़ीज़ ने वहाँ से एक थान लिया और दरबार में उसकी तारीफ़ की। उसने कहा कि इसकी बुनाई में जो बात है वह ऊपर की नमी से आती है और आगरा में वैसा कपड़ा बन ही नहीं सकता।

बीरबल उस दिन वहीं थे और उन्होंने कुछ नहीं कहा। दो दिन बाद वे फ़ैज़ू की दुकान पर गए, दोपहर में, जब भीड़ नहीं थी।

उन्होंने दोनों तख़्तों से एक-एक थान निकलवाया और उन्हें आमने-सामने खोलकर देखा। रंग अलग थे। चौड़ाई एक जैसी थी। बुनाई की घनावट भी।

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फिर उन्होंने दोनों के किनारे देखे।

रेशम बुनते वक़्त थान के किनारे पर बाना लौटता है और लौटने की जगह पर एक छोटी सी गाँठ बन जाती है। हर करघे की गाँठ अपनी होती है। यह बात बुनकर जानते हैं और ख़रीदार नहीं जानते।

दोनों थानों की गाँठ एक जैसी थी।

बीरबल ने फ़ैज़ू से कुछ नहीं पूछा। उन्होंने दोनों थानों में से आधा-आधा गज़ कटवाया, दोनों टुकड़ों पर नीचे से निशान लगवाया, और उन्हें साथ ले गए।

अगले दिन दरबार में दोनों टुकड़े हफ़ीज़ के सामने रखे गए। उन पर से दुकान का लेबल हटा दिया गया था और दोनों को एक ही तरह तह किया गया था।

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"इनमें बनारसी कौन सा है?"

हफ़ीज़ ने दोनों उठाए। उसने उन्हें उँगलियों के बीच रगड़ा, रोशनी के सामने किया, और सूँघा भी। दरबार चुप था और यही सबसे बुरा हिस्सा था।

उसने बाईं तरफ़ वाला टुकड़ा उठाकर कहा कि यही है।

किसी ने कुछ नहीं कहा। हफ़ीज़ ने दूसरा टुकड़ा नीचे रख दिया और अपना हाथ पीछे कर लिया, जैसे उसे पहले ही अंदाज़ा हो गया हो।

बीरबल ने दोनों टुकड़े उलटकर निशान दिखाए। दोनों एक ही करघे के थे।

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करघा आगरा में था, यमुना पार, और उसे चलाने वाले का नाम बीरा था।

बीरा बुलवाया गया और वह दरबार में आकर घबरा गया, क्योंकि उसे लगा कि उसने कुछ ग़लत बुन दिया है। उसने बताया कि वह फ़ैज़ू को महीने में चार थान देता है और उसे थान के छह रुपये मिलते हैं।

यमुना पार बुनकरों का मोहल्ला नीचे की तरफ़ है, जहाँ पानी पास पड़ता है। बीरा का करघा उसके अपने कमरे में गड़ा था और कमरा इतना बड़ा था कि करघे के बाद उसमें दो आदमी बैठ सकते थे। वह दिन में दस घंटे उस पर बैठता था। एक थान में उसे नौ दिन लगते थे और उसके बाद तीन दिन उसकी पीठ सीधी नहीं होती थी। यह उसने किसी शिकायत की तरह नहीं बताया, हिसाब की तरह बताया।

छह रुपये थान। अठारह रुपये गज़। एक थान में बीस गज़ होते हैं।

फ़ैज़ू ने अपनी सफ़ाई में जो कहा वह सुनने लायक़ था। उसने कहा कि उसने कभी नहीं कहा कि कपड़ा बनारस में बुना गया है, उसने उसे बनारसी कहा, जो एक क़िस्म का नाम है, और उस क़िस्म का कपड़ा वह बेचता है।

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यह बात क़ानूनन ग़लत नहीं थी और बीरबल ने यह मान भी लिया।

"तो अब से थान के किनारे पर बुनने वाले की गाँठ के साथ उसका निशान भी जाएगा, और वह निशान काटा नहीं जाएगा। जिसे बनारसी चाहिए वह बनारस का निशान देखकर ले। जिसे यह चाहिए वह यह ले।"

यह इंतज़ाम सुनकर चौक के बाक़ी बज़्ज़ाज़ों ने ख़ुशी नहीं मनाई। दो ने कहा कि इससे उनके यहाँ का माल सस्ता लगने लगेगा। एक ने कहा कि बुनकर का निशान लगाने से वह सीधे ग्राहक तक पहुँच जाएगा और बीच वाला ख़त्म हो जाएगा। बीरबल ने इस पर कहा कि बीच वाला तब ख़त्म होगा जब वह सिर्फ़ नाम बदलने का पैसा ले रहा हो, और जो सचमुच माल ढोता है, रखता है और उधार देता है, उसका काम कोई निशान नहीं छीनता।

फ़ैज़ू ने कहा कि इससे उसका धंधा बैठ जाएगा। बैठा नहीं। थोड़ा हिला ज़रूर। अठारह रुपये वाले ग्राहक कम हुए और छह रुपये वाले बढ़े, और साल के आख़िर में उसका हिसाब पिछले साल से थोड़ा ही कम निकला।

बीरा को थान के छह की जगह नौ मिलने लगे। यह बीरबल ने नहीं दिलवाए, यह उसने ख़ुद माँगे, उस दिन के बाद, जब उसे पता चला कि उसका कपड़ा अठारह में बिकता है।

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हफ़ीज़ ने कपड़े के बारे में दरबार में फिर कभी कोई राय नहीं दी। बीरा का निशान एक टेढ़ी लकीर थी जिसके ऊपर तीन बिंदु थे, और वह अगले बीस बरस तक यमुना पार से आने वाले हर थान के किनारे पर मिलती रही।