पेटी का ढक्कन उठाते ही धनराज को पता चल गया। वज़न कम था। उन्होंने थैलियाँ एक-एक करके बाहर निकालीं, गिनीं, फिर दुबारा गिनीं। पाँच सौ रुपये वाली थैली नहीं थी।
दिवाली में ग्यारह दिन बचे थे। आगरा के किनारी बाज़ार में इन्हीं दिनों साल भर का हिसाब मिलाया जाता है और नए चोपड़े खोले जाते हैं। धनराज कपड़े का काम करते थे। उनकी दुकान बाज़ार की सबसे पुरानी दुकानों में गिनी जाती थी और यह बात वे किसी से कहते नहीं थे, पर भूलते भी नहीं थे।
पेटी की चाबी दो जगह रहती थी। एक उनके पास, दूसरी मुनीम परसादी के पास। परसादी बीस साल से उसी गद्दी पर बैठते आ रहे थे। उस दिन दुकान में पाँच लोग थे। परसादी, दो कारीगर, एक नौकर, और फूलचंद।
शर्त रखी गई
फूलचंद चौदह साल का था और दो महीने पहले काम पर लगा था। वह थान उठाता, नाप का फ़ीता सँभालता, और दिन में चार बार बाज़ार के छोर तक जाता। दौड़ता हुआ ही जाता था। उसकी माँ बाज़ार के पीछे वाली गली में चक्की चलाती थीं। घर में और कोई नहीं था। लड़का हँसता बहुत था। यही बात कुछ लोगों को खटकती भी थी।
शाम तक बात पूरी दुकान में फैल गई। परसादी ने धीरे से कहा कि लड़का नया है, और नए लड़कों को बाज़ार का लालच जल्दी लगता है। दो कारीगरों ने सिर हिलाया। नौकर चुप रहा।
फूलचंद की तलाशी ली गई। उसकी पोटली में एक कंघी थी, आधी रोटी थी, और तीन पैसे थे। बस इतना ही। उसने रोते हुए कहा कि उसने पेटी को छुआ तक नहीं। किसी ने उसे थप्पड़ भी मारा। धनराज ने उस वक़्त मना नहीं किया। रात भर यही बात उन्हें चुभती रही।
अगली सुबह फूलचंद की माँ गद्दी के सामने आकर खड़ी हो गईं। वे चीखीं नहीं। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा कि उनका लड़का चोर नहीं है, और वे इसे साबित कराके रहेंगी। फिर वे पलटीं और फतेहपुर सीकरी की तरफ़ चल दीं।
तीसरे दिन वे झरोखे के नीचे खड़ी थीं, जहाँ बादशाह हर सुबह लोगों को दर्शन देते थे। भीड़ बहुत थी। उनकी बारी दोपहर में आई और उन्होंने अपनी बात बीस शब्दों में कह दी। शाम होते-होते हुक्म पहुँच गया कि मामला बीरबल देखेंगे।
जब भेद खुला
बीरबल दुकान पर आए और पहले आधा घंटा कपड़े देखते रहे। उन्होंने रेशम के दाम पूछे। सूती थान का नाप पूछा। परसादी से पिछले साल के हिसाब पर दो बातें कीं और सिर हिलाकर सुनते रहे। चोरी का नाम किसी ने नहीं लिया। फूलचंद कोने में खड़ा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह आदमी कपड़े क्यों देख रहा है।
फिर उन्होंने पाँचों को दुकान के पिछले हिस्से में बुलाया और एक-एक को दीवार के सहारे खड़ा किया। बाहर बाज़ार का शोर चल रहा था। भीतर कोई नहीं बोला। परसादी ने दो बार गला साफ़ किया। एक कारीगर बार-बार दरवाज़े की तरफ़ देख रहा था।
बीरबल ने कहा, "मैं जानता हूँ कि थैली किसने ली।" पाँचों ने उनकी तरफ़ देखा। "मुझे कल रात ही पता चल गया था। चोर की दाढ़ी में तिनका फँसा हुआ है। मैं उसी को देख रहा हूँ।"
कुछ पल कुछ नहीं हुआ। बाहर किसी ने ठेला खींचा। एक कारीगर ने पैर बदला। फिर परसादी का हाथ अपने आप उठा और दाढ़ी पर चला गया। उँगलियाँ वहीं रुक गईं। उन्हें ख़ुद पता नहीं चला कि उन्होंने ऐसा किया है।
बीरबल ने उसी हाथ की तरफ़ इशारा किया। कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी। परसादी ने हाथ नीचे कर लिया, मगर तब तक दुकान के पिछले हिस्से में हर आदमी वही देख चुका था। धनराज को अपने कानों में अपनी नब्ज़ सुनाई देने लगी। फूलचंद ने सिर उठाया। वह कुछ समझा नहीं था, फिर भी उसकी साँस लौट आई थी।
परसादी ने झूठ नहीं बोला। दो साल पहले उन्होंने एक जानने वाले को दुकान के पैसों में से उधार दिया था और वह आदमी लौटकर नहीं आया। उस आदमी का नाम उन्होंने नहीं बताया, और उस कमरे में खड़े किसी आदमी ने पूछा भी नहीं। तब से हर महीने वे हिसाब में थोड़ा-थोड़ा हेरफेर करते आ रहे थे, इस उम्मीद में कि किसी महीने रकम अपने आप पूरी हो जाएगी। दिवाली पर पूरा चोपड़ा खुलना था। पाँच सौ की थैली उसी गड्ढे को भरने के लिए थी।
धनराज ने उनसे सिर्फ़ एक सवाल पूछा। "बीस साल में एक दिन भी मुझसे कह नहीं सकते थे?" परसादी ने जवाब देने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर लिया। धनराज ने उनके सामने हाथ बढ़ाया और चाबी ले ली।
फूलचंद उसी शाम काम पर लौट आया। उसकी माँ उसे दुकान के दरवाज़े तक छोड़ने आईं और भीतर नहीं आईं। धनराज ने उन्हें कुछ देना चाहा। उन्होंने थैली की तरफ़ देखा, फिर हाथ जोड़े, और चली गईं।
दिवाली की रात किनारी बाज़ार में हर दुकान के आगे दीये की कतार थी। धनराज की दुकान में नया चोपड़ा खुला और पहली पंक्ति उन्होंने अपने हाथ से लिखी। अक्षर टेढ़े पड़े, क्योंकि बीस साल से वह काम कोई और करता आया था। गद्दी के दूसरे सिरे पर परसादी का पीढ़ा वैसा ही रखा था, जैसा वे छोड़ गए थे।