माघ की उस रात यमुना का पानी लोहे जैसा ठंडा था। नत्थू घुटनों तक उतरा, फिर कमर तक। किनारे पर खड़े सिपाही ने मशाल ऊँची की और हाथ से इशारा किया कि और आगे। नत्थू ने एक लंबी साँस भरी और गर्दन तक चला गया।
दोपहर में फतेहपुर सीकरी से ढिंढोरा पिटा था कि जो आदमी पूरी रात यमुना में गर्दन तक खड़ा रह जाएगा, बादशाह उसे एक हज़ार मोहरें देंगे। शर्तें तीन थीं। न आग, न कम्बल, न किसी का सहारा। शहर में बहुत लोगों ने सुना, हँसे, और अपने काम पर लौट गए। दो आदमी घाट तक आए भी, पानी में हाथ डाला, और चुपचाप पलट गए।
नत्थू नाव खेता था और आगरा के इस घाट को अपनी हथेली की तरह जानता था। बरसात में उसके घर की छत ने पानी छोड़ दिया था। अम्मा की खाँसी उसी महीने से नहीं गई थी। खपरैल का दाम उसने तीन दुकानों पर पूछा था और तीनों जगह वही जवाब मिला था। ढिंढोरा सुनकर उसने नाव किनारे बाँधी, रस्सी दो बार लपेटी, और सीधा घाट चला आया।
बीरबल की सूझबूझ
पहले पहर तक पानी सिर्फ़ ठंडा था। दूसरे पहर में वह चुभने लगा, जैसे कोई सुइयों से गिन-गिनकर वार कर रहा हो। तीसरे पहर में नत्थू को अपने पैर महसूस होने बंद हो गए। यही उसे सबसे ज़्यादा डरावना लगा। उसने गिनना शुरू किया। एक से सौ, फिर उल्टा सौ से एक।
उस पार, दूर किसी घर की खिड़की में एक दिया जल रहा था। नत्थू ने रात भर उसी को देखा। दिया कभी काँपता, कभी सीधा हो जाता। जब तक वह दिखता रहा, नींद नहीं आई। आदमी को जागे रहने के लिए कुछ न कुछ चाहिए होता है, और उस रात नत्थू के पास बस वही था।
भोर से कुछ पहले दिया बुझ गया। उसके बाद का समय सबसे लंबा था। किनारे पर सिपाही आग ताप रहे थे और उनकी बातें पानी पर तैरकर नत्थू तक आती रहीं। एक कह रहा था कि आदमी बच नहीं पाएगा। दूसरे ने कहा कि बच गया तो मोहरें भी नहीं मिलेंगी। नत्थू ने दोनों बातें सुनीं और गिनती नहीं तोड़ी।
सूरज निकलने पर दो सिपाहियों ने उसे बाँहों से पकड़कर बाहर खींचा। वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा था। किसी ने गरम पानी दिया, किसी ने अपना कम्बल। नत्थू हँस रहा था और उसके दाँत आपस में बज रहे थे।
अगली सुबह वह दरबार में हाज़िर हुआ। बादशाह अकबर ने उसे सिर से पैर तक देखा और मोहरें लाने का हुक्म दे दिया। थैली आने ही वाली थी कि रायसल आगे बढ़ा।
इनाम का सवाल
रायसल ने हाथ जोड़े। फिर उसने कहा, "जहाँपनाह, कहने की इजाज़त चाहिए। मैं उस रात घाट पर था। नदी के उस पार एक घर में दिया जल रहा था और यह आदमी रात भर उसी की तरफ़ मुँह किए खड़ा रहा। सारी रात उसे उस दिये की आँच मिलती रही। शर्त तो यह थी कि कोई सहारा नहीं लेगा।"
दरबार में हँसी फैल गई। नत्थू ने कहना चाहा कि दिया इतनी दूर था कि उसकी लौ तक ठीक से नहीं दिखती थी, मगर भरे दरबार में उसकी अपनी आवाज़ उसे पराई लगी। बादशाह कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने कहा कि इस पर कल फ़ैसला होगा। थैली वापस भीतर चली गई।
नत्थू घाट लौट आया। उसने नाव खोली और दिन भर सवारियाँ पार कराईं। शाम को खपरैल वाले की दुकान के आगे से गुज़रते हुए उसने उधर नहीं देखा।
अगले दिन दरबार लगा तो बीरबल की जगह ख़ाली थी। दोपहर तक वे नहीं आए। बादशाह ने दो बार पूछा। तीसरी बार उन्होंने कुछ नहीं पूछा, उठे, और ख़ुद उनके घर की तरफ़ चल दिए।
बीरबल के आँगन में एक छोटी सी आग जल रही थी। आग के ऊपर, बहुत ऊपर, पेड़ की एक डाल से रस्सी बाँधकर हाँडी लटकाई गई थी। हाँडी और आग के बीच इतनी दूरी थी कि बीच में एक आदमी आराम से खड़ा हो सकता था। बीरबल पास ही पीढ़े पर बैठे थे और आग में एक पतली लकड़ी सरका रहे थे।
"यह क्या हो रहा है?" बादशाह ने पूछा। "खिचड़ी चढ़ाई है, जहाँपनाह।" "इतनी ऊँची हाँडी में?" "जी।" "यह खिचड़ी कभी नहीं पकेगी, बीरबल।"
बीरबल उठे और हाथ जोड़कर बोले, "जहाँपनाह, अगर नदी के उस पार जलते एक दिये की आँच से आदमी को पूरी रात गरमी मिल सकती है, तो इस आग की आँच से मेरी खिचड़ी भी ज़रूर पक जाएगी। बस थोड़ा इंतज़ार और कर लेते हैं।"
बादशाह कुछ देर हाँडी को देखते रहे। फिर वे हँसे, और उनकी हँसी आँगन की दीवार से टकराकर लौटी। उसी शाम नत्थू को दरबार में बुलाया गया और मोहरें गिनकर उसके सामने रखी गईं। गिनती पूरी होने से पहले ही रायसल दरबार से निकल गया।
सावन आने से पहले नत्थू के घर पर नई खपरैल चढ़ गई। पहली बारिश की रात अम्मा आँगन में खटिया डालकर बैठी रहीं और बीच-बीच में छत की तरफ़ देखती रहीं, जहाँ से अब कुछ नहीं टपक रहा था। नत्थू उस वक़्त घाट पर था, नाव की रस्सी कसते हुए। उस पार, किसी घर की खिड़की में एक दिया जल रहा था।