ताहिर चौदह बरस से ड्योढ़ी पर था और महीने की पहली तारीख़ को उसका काम एक ही था। दरबारियों की थैलियाँ भीतर से आतीं और वह उन्हें नाम पुकारकर देता। बीरबल जब अपनी थैली लेते तो वहीं खड़े-खड़े उसका मुँह खोलते, ऊपर वाला सिक्का निकालते और ताहिर की हथेली पर रख देते। फिर थैली बाँधकर चले जाते। यह चौदह बरस से हो रहा था और ताहिर ने कभी शुक्रिया कहना बंद नहीं किया, हालाँकि बीरबल ने बहुत पहले सुनना बंद कर दिया था।

मालगुज़ारी के एक हिसाब पर उस साल दरबार में तकरार हुई। बात लंबी खिंची और बादशाह चिढ़ गए। उन्होंने भरे दरबार में कहा कि बीरबल हर मामले में इस तरह दाना गिनते हैं जैसे किसी और के खलिहान में खड़े हों।

दरबार हँसा। बादशाह भी हँसे। बीरबल नहीं हँसे।

वे उस दिन शाम को घर गए और अगली सुबह नहीं आए। दूसरे दिन भी नहीं आए। तीसरे दिन उनके घर आदमी भेजा गया तो पता चला कि वे रात में निकल गए हैं और घोड़ा तबेले में ही छोड़ गए हैं।

उन्होंने कोई चिट्ठी नहीं छोड़ी थी।

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बादशाह ने पहले हफ़्ते कुछ नहीं कहा। दूसरे हफ़्ते उन्होंने चुपचाप सवार भेजे, आगरा, मथुरा, कालपी, इटावा। सवार लौटते रहे और हर बार वही ख़बर लाए, जो कोई ख़बर नहीं थी।

सवारों को यह नहीं बताया गया था कि वे किसे ढूँढ़ रहे हैं। उनसे कहा गया था कि हर सराय में उतरने वालों के नाम देखें और लौटकर बताएँ। एक सवार कालपी से एक ऐसे आदमी का नाम लाया जो बही लिखता था और बहुत बोलता था, और बादशाह ने उसे बुलवाया। वह आदमी आया। वह बीरबल नहीं था और वह इस बात से बहुत ख़ुश हुआ कि उसे बुलवाया गया, और बादशाह ने उसे बिना कुछ कहे लौटा दिया।

तीसरे महीने बादशाह ने एक तरकीब चलाई। उन्होंने हर क़स्बे में मुनादी करवाई कि जो कोई एक सवाल का जवाब देगा उसे सौ अशर्फ़ी मिलेंगी। सवाल यह था कि दुनिया में सबसे भारी चीज़ क्या है और सबसे हल्की क्या।

छब्बीसवें दिन मथुरा से जवाब आया, और वह ऐसा था कि उसे सुनते ही बादशाह खड़े हो गए। जवाब लेकर आया हीरा नाम का एक किसान था, जिसकी दस बीघा ज़मीन थी और जिसने अपनी उम्र में आगरा नहीं देखा था।

"यह तुमने सोचा?" हीरा ने साफ़ मना कर दिया। उसने कहा कि घाट पर एक बाबा बैठते हैं, उन्होंने बताया था। "कहाँ हैं वे?" "जिस दिन मैं चला, उसी दिन से नहीं दिखे, हुज़ूर।"

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अशर्फ़ियाँ हीरा को दी गईं क्योंकि मुनादी में यह नहीं कहा गया था कि जवाब अपना होना चाहिए। बादशाह ने उसके बाद तीन और पहेलियाँ भिजवाईं और तीनों के जवाब आए, तीनों अलग-अलग आदमियों के हाथ, और तीनों बार वह आदमी किसी और का नाम लेता रहा।

यह साफ़ हो गया कि पहेली से वह आदमी नहीं मिलेगा जो पहेलियों से खेलता है।

उस रात बादशाह ड्योढ़ी से निकल रहे थे और उन्होंने ताहिर को देखा, जो पहली तारीख़ का हिसाब मिला रहा था। बादशाह रुके और उन्होंने उससे पूछा कि उसकी थैली में इस महीने कम है या पूरा। ताहिर ने कहा कि पूरा है, बस एक सिक्का कम आता है। "कैसा एक सिक्का?" ताहिर ने बता दिया।

बादशाह ने अगले दिन नई मुनादी करवाई। हर क़स्बे में, हर घाट पर, हर सराय के सामने। सवाल इतना आसान रखा गया कि कोई भी जवाब दे सके, और इनाम इतना छोटा कि लालच में भीड़ न लगे। ग्यारह अशर्फ़ी, हाथ के हाथ, थैली में।

मुराद उन हरकारों में था जो मथुरा भेजे गए। उसे और बाक़ी सबको एक ही अलग हुक्म दिया गया था, और वह हुक्म सवाल के बारे में नहीं था। उन्हें यह देखना था कि थैली लेने वाला उसके बाद क्या करता है।

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इकतालीसवें दिन मुराद की चिट्ठी आई। मथुरा के घाट पर एक अधेड़ आदमी ने, जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और जो नावों का हिसाब लिखता था, जवाब देकर थैली ली, उसका मुँह वहीं खोला, ऊपर वाला सिक्का निकाला, और घाट पर पानी ढोने वाले एक लड़के को दे दिया। फिर थैली बाँधकर अपनी जगह बैठ गया।

बादशाह ख़ुद गए, और अकेले गए। घाट पर वे उस आदमी के सामने जाकर खड़े हो गए और कुछ नहीं बोले। बीरबल ने सिर उठाया, उन्हें देखा, और अपनी बही बंद कर दी।

"चौदह बरस में मैंने वह सिक्का चौदह सौ बार नहीं दिया होगा," उन्होंने कहा। "पर एक बार भी नहीं भूला।" "तुम खलिहान वाली बात के लिए गए थे।" "मैं इसलिए गया कि उस पर दरबार हँसा और आपने रोका नहीं।"

बादशाह उस दिन घाट पर बैठे रहे जब तक शाम की नावें नहीं लग गईं। लौटते हुए दोनों साथ थे, और रास्ते में मालगुज़ारी के उसी हिसाब की बात हुई जिस पर तकरार हुई थी, और इस बार बादशाह ने बीरबल की बात मान ली।

अगले महीने की पहली तारीख़ को ताहिर ड्योढ़ी पर था और थैलियाँ नाम से बँटीं। बीरबल ने अपनी थैली ली, उसका मुँह वहीं खोला और ऊपर वाला सिक्का उसकी हथेली पर रख दिया। ताहिर ने शुक्रिया कहा। उसे इस बार जवाब मिला।