गर्मी में परिंदख़ाने का काम सूरज निकलने से पहले निपट जाता था। मकबूल उस सुबह भी अँधेरे में पहुँचा, कटोरियाँ बदलीं, फ़र्श पर पानी छिड़का, और हरे तोते वाले पिंजरे के पास आकर रुक गया। तोता डाली पर नहीं था। वह नीचे पड़ा था, पंख बंद और पंजे मुड़े हुए।
उस तोते को ईरान से आए एक सौदागर ने भेंट किया था और बादशाह ने उसे नौ बरस रखा था। वह चार बोल जानता था। तीन आम थे। चौथा उसने अकबर की अपनी आवाज़ से सीखा था और किसी को मालूम नहीं था कब। दरबार में जब कोई ज़रूरत से ज़्यादा बोलता, तो तोता बीच में से कहता, "बस।" इसी पर बादशाह हँसते थे, और यही बात उन्हें सबसे प्यारी थी।
दो बरस पहले शिकार से लौटते हुए उनका एक बाज़ मर गया था और वह ख़बर उन्हें रास्ते में सुनाई गई थी। उसी शाम उन्होंने कह दिया था कि जो कोई इस तोते की मौत की ख़बर लेकर आएगा, उसका सिर उतार लिया जाएगा। बात ग़ुस्से में कही गई थी और किसी ने उसे लिखा नहीं। पर परिंदख़ाने के सातों आदमियों को वह याद थी।
मकबूल उन्नीस बरस से वहाँ था। तीन बच्चे थे, और नीचे वाले शहर में दो कमरों का घर जिसकी छत उसने पिछली बरसात में डलवाई थी। उसने तोते को उठाया, कपड़े में लपेटा और पीछे वाले कमरे में अनाज की बोरियों के पीछे रख दिया। फिर पिंजरा साफ़ किया, दाना डाला, पानी बदला, दरवाज़ा बंद किया।
परिंदख़ाने के बाक़ी छह आदमियों को दूसरे ही दिन मालूम हो गया, और उनमें से किसी ने यह बात आगे नहीं बढ़ाई। तीसरे दिन सबसे बूढ़े रखवाले ने मकबूल के हाथ में एक चिट्ठी थमाई जिस पर उसके अपने गाँव का पता लिखा था, और इतना कहा कि ज़रूरत पड़ जाए तो बच्चों को वहाँ भेज देना। मकबूल ने वह चिट्ठी कमर में खोंस ली और सात दिन खोंसे रहा।
ऊपर, दरबार की तरफ़ से, चार दिन तक कोई पूछताछ नहीं आई। पाँचवें दिन बादशाह ने पूछा।
"तोता क्यों नहीं आया?" मकबूल ने कहा कि उसके पंख झड़ रहे हैं और हकीम ने हवा से बचाने को कहा है। बादशाह ने सिर हिलाया और बात वहीं रह गई।
छठे दिन उन्होंने दोबारा पूछा। सातवें दिन उन्होंने कहा कि वे ख़ुद परिंदख़ाने आएँगे।
उस रात मकबूल ग़यासुद्दीन के पास गया, जो दीवान के यहाँ मुंशीगिरी करते थे और जिनसे उसकी पुरानी जान-पहचान थी। ग़यासुद्दीन ने पूरी बात सुनी, फिर कहा कि ऐसे मामले में बीरबल से बेहतर सलाह कोई नहीं दे सकता, और यह भी कि ख़बर ख़ुद बीरबल पहुँचाएँ तो सबसे अच्छा रहेगा। मकबूल को उस घड़ी यह बहुत अच्छी सलाह लगी।
उस पूरे हफ़्ते मकबूल ने घर पर किसी से कुछ नहीं कहा। उसकी बीवी ने चौथे दिन पूछा कि वह रात में उठकर बैठ क्यों जाता है, और उसने कहा कि गर्मी है। पाँचवें दिन उसने अपने बड़े लड़के को, जो नौ बरस का था, परिंदख़ाने का रास्ता दिखाया और बताया कि कटोरियाँ किस क्रम में बदली जाती हैं। लड़के ने पूछा कि यह उसे क्यों बताया जा रहा है। जवाब उसे नहीं मिला।
बीरबल के घर का दरवाज़ा आधी रात के बाद खुला। मकबूल भीतर गया, रोया नहीं, बस खड़ा रहा और सब कह गया। "बादशाह ने उस दिन जो कहा था, हूबहू क्या कहा था?" मकबूल ने दोहराया। "तुमने ख़ुद सुना था या किसी ने बताया?" "मैं वहीं खड़ा था।"
बीरबल ने वही वाक्य उससे तीन बार दोहरवाया और तीनों बार वह एक जैसा निकला। जो कोई इस तोते की मौत की ख़बर लेकर आएगा। बीरबल ने चिराग़ की बत्ती नीची कर दी और कहा कि वह सुबह परिंदख़ाना वैसे ही खोल दे जैसे रोज़ खोलता है।
सुबह बीरबल वहाँ गए। उन्होंने पिंजरा देखा। उन्होंने दाने की कटोरी देखी, जो सात दिन से रोज़ भरी जा रही थी और सात दिन से भरी ही रह रही थी। पीछे के कमरे में बोरियों के पीछे रखा कपड़ा भी उन्होंने देख लिया। उसे खोला नहीं।
दोपहर को दीवान-ए-ख़ास में बादशाह की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने पूछा कि परिंदख़ाने से क्या ख़बर है।
"जहाँपनाह, तोता दाना नहीं उठाता।" बादशाह ने आँख उठाई। "पानी को चोंच नहीं लगाता। डाली नहीं बदलता। सात दिन में एक बार नहीं बोला।" दरबार में कोई नहीं हिला। "पंख नहीं फड़फड़ाता। आँख नहीं खोलता।"
"तो वह मर चुका है," बादशाह ने कहा।
"यह आपने कहा, जहाँपनाह। मैंने नहीं कहा।"
ग़यासुद्दीन दो क़दम आगे खड़े थे। उन्होंने अपनी जगह से हिलना चाहा और फिर नहीं हिले।
बादशाह ने तख़्त की बाज़ू पर उँगलियाँ रखीं और वहीं रखे रखीं। "हुक्म मेरा था," उन्होंने आख़िर में कहा। "और उसे बेकार भी मैंने ही किया।"
"जिसने इसे सात दिन छिपाए रखा, वह कौन है?" "जिसने छिपाया उसने ख़बर नहीं दी, जहाँपनाह। हुक्म ख़बर देने वाले के लिए था।"
बादशाह उठे और परिंदख़ाने तक गए, और पूरा दरबार पीछे-पीछे गया। उन्होंने बोरियों के पीछे से कपड़ा निकलवाया और ख़ुद खोला। नौ बरस में यह पहली बार था कि उन्होंने उस तोते को छुआ।
उसे परिंदख़ाने के पीछे वाले आँगन में, अनार के पेड़ के नीचे दबाया गया। बादशाह वहाँ खड़े रहे जब तक मिट्टी बराबर नहीं हो गई। लौटते हुए उन्होंने मकबूल की तरफ़ देखा और सिर्फ़ इतना पूछा कि उसने सात दिन खाना खाया या नहीं।
उस हुक्म को किसी ने वापस लेने का ऐलान नहीं किया, क्योंकि वह कभी लिखा ही नहीं गया था। ग़यासुद्दीन ने उसके बाद परिंदख़ाने का ज़िक्र कहीं नहीं किया।
पीतल का वह पिंजरा आज भी वहीं लटका है और उसमें कोई परिंदा नहीं रखा गया। मकबूल सुबह आकर उसका दरवाज़ा खोल देता है और शाम को बंद कर देता है, और किसी ने उससे यह करने को नहीं कहा, न किसी ने रोका है।