गेहूँ पक चुका था और कटाई दो दिन में शुरू होनी थी, पर बुधना ने हँसिया नहीं उठाया। वह सुबह से खेत की मेंड़ पर बैठा था और जब चंपावती का आदमी उसे बुलाने आया तो उसने कहा कि वह इस बार आधा हिस्सा तब लेगा जब बँटवारा उसके सामने होगा।
यह गाँव आगरा से पंद्रह कोस पर था और उसका नाम खेड़ा था। वहाँ की ज़मीन का बड़ा हिस्सा चंपावती के नाम था, जो नौ बरस पहले विधवा हुई थी और तब से ख़ुद हिसाब देखती थी। बुधना उसी ज़मीन पर बँटाई करता था। शर्त सीधी थी और लिखी हुई नहीं थी। आधा उसका, आधा मालकिन का।
बँटवारा हर बरस चंपावती का आदमी करता था। वह खड़ी फ़सल में से एक लकीर खींच देता और कहता कि उस तरफ़ का हिस्सा बुधना का है।
नौ बरस से बुधना को हर बार वही तरफ़ मिली थी जिधर बालियाँ पतली थीं।
खेड़ा का खेत उत्तर की तरफ़ ढलान लिए हुए है और उस सिरे पर बरसात का पानी ठहर जाता है। ठहरे पानी से नीचे की मिट्टी में नमक ऊपर आ जाता है और गेहूँ की जड़ें छोटी रह जाती हैं। यह बात गाँव में सब जानते थे। यह भी सब जानते थे कि लकीर हर बरस उसी नमक वाली पट्टी के बाहर से खींची जाती थी।
बुधना ने चार बार कहा था। तीन बार उसे यह जवाब मिला था कि खेत मालकिन का है और लकीर मालकिन खिंचवाएगी। चौथी बार उसे यह जवाब मिला कि अगर उसे बँटाई पसंद नहीं तो वह ज़मीन छोड़ दे।
इस बार वह ज़मीन छोड़ने की जगह पंचायत में गया, और पंचायत ने कहा कि शर्त तो आधी-आधी की ही है, इसलिए कोई ग़लती नहीं हुई है।
वह वहाँ से आगरा चला गया।
बीरबल के सामने वह चौथे दिन पहुँचा और उसने पूरी बात दो मिनट में कह दी, बिना किसी को बुरा कहे। बीरबल ने उससे एक ही सवाल पूछा। "लकीर कौन खींचता है और चुनता कौन है?" "लकीर उनका आदमी खींचता है, हुज़ूर। चुनना कुछ नहीं होता। वह बता देता है कि कौन सा हिस्सा मेरा है।"
चंपावती को बुलावा गया और वह आई। वह डरी हुई नहीं थी और उसने अपनी बात साफ़ रखी। शर्त आधी-आधी की है, आधी-आधी ही दी जाती है, और खेत नापा जा सकता है।
"नाप बराबर है?" बीरबल ने पूछा। "बिलकुल बराबर। कोई नाप ले।" "तो झगड़ा किस बात का है?" "यही तो मैं पूछ रही हूँ।"
बीरबल ने कहा कि इस बरस बँटवारा वे करवाएँगे और तरीक़ा ज़रा अलग होगा। खेत में लकीर बुधना खींचेगा, और दोनों हिस्सों में से जो चाहिए वह चंपावती चुनेगी।
कमरे में कुछ पल कोई नहीं बोला।
"मुझे यह मंज़ूर नहीं," चंपावती ने कहा। "क्यों नहीं?" "क्योंकि लकीर वही खींचेगा तो अपने फ़ायदे की खींचेगा।" "चुनना आप चुनेंगी। जो हिस्सा बेहतर लगे वही ले लीजिए।" "फिर भी नहीं।"
बीरबल ने यह जवाब लिखवा लिया और उसके बाद कोई सवाल नहीं पूछा।
वे दो दिन बुधना ने सुबह से शाम तक खेत में बिताए। पहले दिन उसने उत्तर की पट्टी की चौड़ाई क़दमों से नापी, तीन जगह से, और तीनों नाप अलग निकलीं क्योंकि नमक की सीमा सीधी नहीं थी। दूसरे दिन उसने बालियाँ देखीं, हर दस क़दम पर एक मुट्ठी पकड़कर, और जहाँ दाना हल्का लगा वहाँ उसने एक पत्थर रख दिया। शाम तक ज़मीन पर पत्थरों की एक टेढ़ी लकीर बन गई थी और उसी को उसने सीधा करने के बजाय वैसा ही रहने दिया।
उस टेढ़ी लकीर का मतलब यह था कि नमक वाली ज़मीन आर-पार एक ही तरफ़ नहीं पड़ी। उसका आधा हिस्सा एक तरफ़ गया और आधा दूसरी तरफ़, और अच्छी ज़मीन भी उसी तरह बँटी। बुधना ने इसे नापकर नहीं, चलकर तय किया था।
चंपावती दोपहर में आई। वह पूरब वाले सिरे पर खड़ी होकर देखती रही, फिर पश्चिम वाले सिरे पर गई, फिर बीच में आई। उसने तीन बार चक्कर लगाया और हर बार वहीं आकर रुकी जहाँ पत्थर तिरछे मुड़ते थे।
उसे हिस्सा चुनने में डेढ़ घंटा लगा। नौ बरस में लकीर खींचने में उसके आदमी को कभी दस मिनट से ज़्यादा नहीं लगे थे।
उस साल दोनों हिस्सों से लगभग बराबर अनाज निकला। फ़र्क़ इतना था कि बुधना के हिस्से में डेढ़ मन कम आया, और यह उसने ख़ुद खींची लकीर से आया, इसलिए उसने कहीं शिकायत नहीं की।
अगले बरस चंपावती ने उत्तर वाली पट्टी में गोबर और भूसा डलवाना शुरू किया, जो उसे नौ बरस से करवाना चाहिए था और जिसका ख़र्च बँटाई करने वाले से नहीं लिया जाता।
मुक़दमा दरबार तक कभी नहीं पहुँचा। खेड़ा से आगरा पंद्रह कोस है और उतनी दूर से जो बातें आती हैं वे लगान की होती हैं, बँटवारे की नहीं।
खेड़ा में वे पत्थर आज भी उसी तिरछी क़तार में गड़े हैं। हर बरस बँटवारा उन्हीं से होता है और कोई नई लकीर नहीं खींची जाती, और गाँव में अब उस खेत को आधा खेत कहते हैं, दोनों हिस्सों को मिलाकर।