शादी वाले घर में सबसे पहले चूड़ियों की आवाज़ उठती है। नफ़ीसा सीढ़ियों के नीचे खड़ी थी और ऊपर से वही आवाज़ लगातार आ रही थी, जैसे कोई बार-बार कलाई हिला रहा हो। आँगन में शामियाने की रस्सी अभी कसी जा रही थी और उसके नीचे कुर्सियाँ उलटी रखी थीं। काम आधा भी नहीं हुआ था। सावन का आख़िरी हफ़्ता था और सुबह की बारिश के बाद भोपाल की उमस दीवारों से चिपकी हुई थी। सायरा बेगम नीचे उतरीं, उसका हाथ पकड़ा और बिना कुछ कहे ऊपर ले चलीं।

ऊपर वाले कमरे के दरवाज़े पर चार औरतें खड़ी थीं और किसी ने रास्ता नहीं छोड़ा, जब तक सायरा बेगम ने हाथ से इशारा नहीं किया। कमरे के कोने में लोहे की अलमारी थी, वैसी ही जैसी पुराने शहर के हर घर में एक होती है, और उसका निचला ख़ाना खुला पड़ा था। उसमें मख़मल का एक डिब्बा रखा था। डिब्बा खाली था।

"नाज़िया का सेट था, बारह तोले का," सायरा बेगम ने कहा। "कल रात तक इसी डिब्बे में था, मैंने अपनी आँख से देखा था। सुबह नौ बजे मैंने ख़ुद ताला लगाया और चाबी ब्लाउज़ में रखी। उसके बाद यह दरवाज़ा किसी ने नहीं खोला।"

चाबियाँ कुल कितनी हैं, इस पर उन्होंने जवाब देने के बजाय तीन उँगलियाँ उठा दीं। एक उनके पास। एक रुख़साना के पास, जो घर की बड़ी बहू थी और सुबह से रसोई में थी, जहाँ बीस औरतें उसे लगातार देख चुकी थीं। तीसरी रसोई के आले में सालों से टँगी रहती थी और आज भी अपनी जगह पर मिली, क्योंकि सायरा बेगम ने सबसे पहले वही देखी थी।

इनायत सीढ़ियों पर बैठा सब सुन रहा था और उसने नीचे आँगन की तरफ़ इशारा किया। वहाँ एक अधेड़ औरत दीवार से लगकर बैठी थी, घुटनों में मुँह दिए, और उसके पास झाड़ू पड़ी थी। दो लड़कियाँ उसके सामने खड़ी थीं और उनमें से एक कुछ कह रही थी जो ऊपर तक सुनाई नहीं दिया। औरत ने सिर नहीं उठाया।

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"वह फूलवती है," सायरा बेगम ने कहा, और उनकी आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई। "सुबह वही अकेली ऊपर आई थी। सब यही कह रहे हैं, मैंने नहीं कहा।"

नफ़ीसा नीचे उतरी और फूलवती के पास उसी दीवार से लगकर ज़मीन पर बैठ गई। ऊपर से किसी ने झाँका और फिर हट गया। ज़मीन ठंडी थी। उसने पूछा कि आज झाड़ू किस तरतीब से लगाई गई थी, और यह सवाल शायद वह नहीं था जिसकी फूलवती को उम्मीद रही होगी, क्योंकि उसने पहली बार सिर उठाकर देखा।

"जैसे रोज़ लगाती हूँ। पहले ऊपर के दो कमरे, फिर सीढ़ियाँ, फिर नीचे का बरामदा, आख़िर में आँगन। ऊपर से नीचे, बहनजी। धूल नीचे आती है, ऊपर नहीं जाती।" उसने बताया कि ऊपर वह सात बजे गई थी, जब सूरज ठीक से निकला भी नहीं था और सीढ़ियों पर अब भी रात की सीलन थी।

नफ़ीसा ऊपर लौटी और दरवाज़े की चौखट पर बैठकर देर तक फ़र्श देखती रही। इनायत ने दो बार पूछा कि वह क्या देख रही हैं और दोनों बार जवाब नहीं मिला। फिर उसने अपनी उँगली फ़र्श पर रखकर उठाई और उँगली के पोर पर लाल रंग का एक छोटा-सा रेशा चिपका हुआ था। धागा लाल था। मौली का।

वह कमरे में आगे बढ़ी और दो रेशे और मिले, एक अलमारी के पाए के पास और एक चौखट की अंदरूनी लकड़ी पर। इनायत नीचे गया और लौटकर बताया कि आँगन में मौली सुबह ग्यारह बजे बाँधी गई थी, हल्दी की रस्म के वक़्त, और उसका बचा हुआ गट्ठर अभी भी वहीं तख़्त पर रखा है।

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"तो हिसाब यह हुआ," नफ़ीसा ने कहा। "कमरा सात बजे बुहारा गया, नौ बजे ताला लगा, और ग्यारह बजे नीचे आँगन में मौली बँधी। उसके बाद इस बंद कमरे के अंदर, फ़र्श पर, उसी मौली का धागा आकर गिरा है। तीनों बातें एक साथ सच नहीं हो सकतीं।"

इनायत ने कहा कि इसका मतलब है ग्यारह के बाद कोई अंदर आया, और नफ़ीसा ने सिर हिलाकर उसे सुधारा कि इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि ग्यारह के बाद यह दरवाज़ा खुला। अंदर कौन आया, यह अलग सवाल है, और अक्सर छोटा सवाल होता है।

वह अलमारी के पास गई और निचले ख़ाने में झुककर मख़मल का डिब्बा उठाया, फिर उसके नीचे की लकड़ी पर उँगली फेरी। डिब्बे को उलटकर उसने तली पर हाथ रखा, जहाँ धूल की एक पतली परत जमी हुई थी। उसने डिब्बा वापस ठीक उसी निशान पर रखा जहाँ वह पहले से बैठा था, और निशान के बाहर की लकड़ी भी उतनी ही साफ़ थी जितनी अंदर की।

"यह डिब्बा हिला नहीं है, कम से कम कई हफ़्तों से," उसने कहा। "जो डिब्बा आज सुबह उठाकर वापस रखा जाता, उसके चारों तरफ़ धूल का एक किनारा बनता, क्योंकि बाक़ी लकड़ी पर धूल बैठती रहती और डिब्बे के नीचे नहीं बैठती। यहाँ ऐसा कोई किनारा है ही नहीं। और तली पर धूल तभी जमती है जब डिब्बा खाली पड़ा रहे, मुँह खुला, बहुत दिन तक। यह सेट आज नहीं गया।"

कमरे की हवा जैसे रुक गई। बाहर फिर बारिश शुरू हुई। नीचे शामियाने में कोई हथौड़ा ठोक रहा था, बराबर, चार-चार की चोट में, और दो चोटों के बीच की चुप्पी हर बार थोड़ी लंबी लग रही थी।

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नफ़ीसा ने बाक़ी औरतों से कहा कि वे नीचे चली जाएँ। रुख़साना जाते-जाते रुकी और कुछ कहना चाहा, फिर बिना कहे उतर गई। दरवाज़ा बंद हुआ। नफ़ीसा ने सिर्फ़ इतना पूछा कि सेट कब गया।

सायरा बेगम ने तुरंत कुछ नहीं कहा और फिर खिड़की की तरफ़ मुँह कर लिया, जहाँ से नीचे गली और उसके पार एक बंद दुकान का शटर दिखता था। "जनवरी में गया। इनके इलाज में गया। मैंने सोचा था शादी तक छुड़ा लूँगी, पर ब्याज बढ़ता गया और मैं हर महीने यही सोचती रही कि अगले महीने हो जाएगा।"

"और आज ग्यारह बजे के बाद आप ऊपर आईं, ताला खोला, ख़ाना खोला, और डिब्बा वैसे ही खुला छोड़ दिया।"

"मुझे किसी को यह बताना था कि सेट था और चला गया," उन्होंने कहा। "लड़के वाले शाम को देखने आएँगे और पूछेंगे। मैं उनसे क्या कहती। मैंने फूलवती का नाम नहीं लिया, यह आप मान लीजिए।" वह रुकीं, और फिर उन्होंने ख़ुद ही जोड़ दिया कि उन्होंने किसी को रोका भी नहीं था।

नफ़ीसा उठी और अलमारी का ख़ाना बंद कर दिया। "शाम तक आपके पास दो रास्ते हैं। पहला यह कि मैं नीचे जाकर सबके सामने कह दूँ कि चोरी हुई ही नहीं, और आप वहीं खड़ी रहें जब पूरा घर आपकी तरफ़ देखे। दूसरा यह कि यह बात आप नाज़िया को ख़ुद बताएँ, अभी, इसी कमरे में, अकेले में। मुझे दूसरा ठीक लगता है, क्योंकि पहले वाले में आपकी बेटी यह ख़बर बीस लोगों के साथ सुनेगी।"

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सायरा बेगम ने सिर हिलाया, बहुत हल्के से। नफ़ीसा दरवाज़ा खोलते हुए रुकी और कहा कि फूलवती को नीचे से बुलवा लिया जाए, क्योंकि उसे यह भी नहीं मालूम कि उस पर इल्ज़ाम क्या था, और उसे कम से कम यह ज़रूर मालूम होना चाहिए कि अब नहीं है।

शाम को नाज़िया सीढ़ियों से उतरी तो उसके गले में सायरा बेगम की पुरानी चाँदी की हँसली थी, वही जो उन्होंने अपनी शादी में पहनी थी और जिसका रंग कई जगह से उतर चुका था। लड़के वालों की तरफ़ से किसी ने कुछ नहीं पूछा, और अगर पूछा भी होता तो घर की एक औरत के पास जवाब तैयार था। आँगन में फूलवती फिर से झाड़ू लगा रही थी, ऊपर से नीचे, उसी तरतीब में, और कुर्सियाँ अब सीधी हो चुकी थीं।