मालतीबाई ने दरवाज़ा खोला और सबसे पहले माफ़ी माँगी, कमरे की हालत के लिए, जो उसकी बनाई हुई नहीं थी। कमरा साफ़ था। बरतन उलटे रखे थे, चादर तनी हुई थी, और कोने में एक बाल्टी रखी थी जिसमें पानी की बूँदें एक-एक करके गिर रही थीं, हर चार-पाँच सेकंड में एक।
छत पर सीलन का एक बड़ा दाग़ था। उसका रंग बीच में गहरा भूरा था और किनारों पर हल्का, और किनारे लहरदार थे, जैसे किसी ने गीली उँगली से कागज़ पर लकीर खींची हो।
"चार महीने से है," उसने कहा। "बारिश शुरू होते ही आया। मालिक कहते हैं मेरी वजह से है।"
काग़ज़ पर तुलसीराम का दावा साफ़ लिखा था। किराएदार ने बाथरूम का इस्तेमाल लापरवाही से किया, फ़र्श की परत टूटी, पानी नीचे उतरा, मकान को नुक़सान हुआ, इसलिए मरम्मत का ख़र्च किराएदार से लिया जाए और मकान ख़ाली कराया जाए। नोटिस के साथ दो तस्वीरें भी नत्थी थीं।
"मैं इक्कीस साल से इसी कमरे में हूँ," मालतीबाई ने कहा। "किराया कभी एक दिन देर से नहीं दिया। अब जाऊँ कहाँ।"
नफ़ीसा ने कुछ देर कुछ नहीं कहा। वह पहले छत का दाग़ देखती रही, फिर बाथरूम गई, फिर लौटकर दाग़ को दोबारा देखा। यह काम उसने बारह साल किया था, दूसरों के लिए, बीमा कंपनियों के लिए, और वह जानती थी कि इसमें राय की ज़रूरत नहीं पड़ती।
"बाथरूम किधर है?" उसने पूछा, हालाँकि वह अभी वहाँ से लौटी थी।
"उधर, कोने में।"
"और दाग़ किधर है?"
मालतीबाई ने ऊपर देखा। दाग़ कमरे के बीच में था, बाथरूम की दीवार से क़रीब आठ फ़ुट दूर।
इनायत ने सीढ़ी लगाई और नफ़ीसा ऊपर चढ़ी। छत की सतह पर उसने हथेली फेरी और दो जगह उँगली से ठोका। आवाज़ दोनों जगह अलग थी।
"पानी नीचे सीधा नहीं गिरता," उसने नीचे खड़ी मालतीबाई से कहा। "वह छत की सलाख़ों के साथ-साथ चलता है, जिधर ढाल हो, और वहाँ नीचे उतरता है जहाँ उसे सबसे कमज़ोर जगह मिले। इसलिए दाग़ वहाँ नहीं होता जहाँ पानी घुसा, दाग़ वहाँ होता है जहाँ वह बाहर निकला। जो आदमी दाग़ देखकर कहता है कि रिसाव इसी के ऊपर है, वह छत नहीं पढ़ रहा, अंदाज़ा लगा रहा है।"
ऊपर वाली मंज़िल पर तुलसीराम ने पिछले साल दो कमरे और एक खुली छत बनवाई थी। छत पर फ़र्श डाला गया था, टाइल के साथ, और उसकी ढाल पश्चिम की तरफ़ थी। पश्चिम में परनाला नहीं था। परनाला पूरब में था, जहाँ पुरानी छत की ढाल जाती थी।
नफ़ीसा ने ऊपर जाकर टाइल के किनारे की पट्टी देखी। दीवार और फ़र्श के जोड़ पर जो कोना बनता है, उस पर पानी रोकने वाली परत नहीं चढ़ाई गई थी। जोड़ में सीमेंट भरा था, सादा, और वह जगह-जगह से चिटक चुका था।
"नई छत का पानी पश्चिम की तरफ़ जाता है और वहाँ उसे निकलने का रास्ता नहीं मिलता," उसने कहा। "वह जोड़ में भरता है, फिर पुरानी छत के अंदर उतरता है, फिर सलाख़ के साथ चलकर बीच में आता है। मालतीबाई का बाथरूम उस पूरे रास्ते में कहीं नहीं पड़ता।"
तुलसीराम शाम को नीचे आए। साठ के क़रीब, कड़क इस्तरी की क़मीज़ पहने, और उन्होंने बात की शुरुआत यह कहकर की कि वह मुक़दमेबाज़ आदमी नहीं हैं।
"नोटिस आपने भेजा है," नफ़ीसा ने कहा।
"मकान मेरा है।"
"मकान आपका है। पानी भी आपका है।" उसने उन्हें दो तस्वीरें दिखाईं जो इनायत ने ऊपर से ली थीं, और फिर वह पन्ना जिस पर उसने ढाल की दिशा और परनाले की जगह का नक़्शा बनाया था। "आपने ऊपर जो फ़र्श डलवाया, उस पर पानी रोकने की परत नहीं है और उसकी ढाल उस तरफ़ है जिधर निकास नहीं है। सीलन उसी दिन से शुरू हुई जिस बरसात में वह फ़र्श पहली बार भीगा।"
तुलसीराम ने काग़ज़ हाथ में लिया और उसे देखते रहे, उस तरह नहीं जैसे कोई पढ़ता है।
"आपको किसने बुलाया?" उन्होंने पूछा।
"इन्होंने। नौ सौ रुपये दिए हैं, तीन महीने में जोड़कर।"
वह चुप हो गए। नीचे गली में कोई साइकिल की घंटी बजाता हुआ निकला।
"मरम्मत का ख़र्च तीस हज़ार बैठेगा," नफ़ीसा ने कहा। "अगर आप यह नोटिस वापस लेते हैं और छत ठीक करवाते हैं, तो बात यहीं ख़त्म। अगर नहीं, तो यही काग़ज़ अदालत में जाएगा और वहाँ सवाल यह नहीं रहेगा कि किराएदार जाए या रहे। वहाँ सवाल यह रहेगा कि इक्कीस साल से किराया देती एक औरत के कमरे में चार महीने से पानी क्यों टपक रहा है।"
नोटिस वापस नहीं लिया गया। तुलसीराम ने उस पर कुछ नहीं कहा और चले गए, और नफ़ीसा ने मालतीबाई से साफ़ कह दिया कि यह मामला अभी ख़त्म नहीं हुआ है, क्योंकि उसे झूठी तसल्ली देना नहीं आता।
छत की मरम्मत अक्टूबर में शुरू हुई, बारिश ख़त्म होने के बाद, जब मिस्त्री सस्ता मिलता है। तुलसीराम ने ऊपर की परत उखड़वाई और नई डलवाई, और उसकी ढाल इस बार पूरब की तरफ़ रखी गई। किसी ने यह नहीं कहा कि यह किसकी वजह से हुआ।
मालतीबाई का कमरा वैसा ही है। छत पर दाग़ अब भी दिखता है, सूखा, हल्का भूरा, किनारों से थोड़ा उखड़ा हुआ। वह कोने वाली बाल्टी अब पानी के लिए नहीं रखी जाती, उसमें वह चावल धोती है।