गेट पर टैंकर का इंजन बंद हुआ और उसके बाद जो आवाज़ बची, वह पानी की नहीं, चूड़ी जैसी पतली किसी चीज़ के खनकने की थी। नफ़ीसा ने देखा कि वह टैंकर के पीछे लटकी ज़ंजीर थी। सुनयना उसके साथ गेट के अंदर खड़ी थी और उसके हाथ में कागज़ों की एक मोटी फ़ाइल थी, जिसे वह सुबह से सीने से लगाए घूम रही थी। अरेरा कॉलोनी की यह सोसाइटी बड़ी नहीं थी, अट्ठाईस मकान, और उनके बीच से गुज़रती सड़क पर जामुन के पेड़ों की छाया अब भी गीली थी।
"चालीस टैंकर," सुनयना ने फ़ाइल खोलकर कहा। "यह जेठ का बिल है, और जून में भी चालीस ही थे, जुलाई में अड़तीस। हर घर से हर महीने बारह सौ रुपये कटे हैं।"
सुनयना को यह अटपटा लगा कि उसने ख़ुद कितने टैंकर आते देखे थे।
"मैं गिनती नहीं कर रही थी, यही तो मुसीबत है।" उसने एक डायरी निकाली, जो बिल वाली फ़ाइल से बहुत पतली थी। "पर मेरी माँ को नींद नहीं आती। वह बालकनी में बैठी रहती हैं, रात-दिन। जब भी टैंकर आता है, वह मुझे बताती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है मैं पानी भरना भूल जाऊँगी। मैंने उनकी बात लिखनी शुरू कर दी थी। सिर्फ़ शौक़ में।"
नफ़ीसा ने डायरी ली और दो मिनट तक कुछ नहीं कहा। जेठ वाले पन्ने पर तेरह तारीख़ें थीं, जून में सत्रह और जुलाई में पंद्रह, और तीनों महीनों में एक भी तारीख़ ऐसी नहीं थी जो दो बार लिखी गई हो।
गार्ड की चौकी में एक मोटा रजिस्टर रखा था, जिसका गत्ता कई जगह से फूल चुका था। टीकाराम ने उसे बिना कहे आगे बढ़ा दिया, और नफ़ीसा ने देखा कि हर पन्ने के आख़िरी ख़ाने में अंगूठे का निशान है, स्याही का, कहीं गहरा कहीं हल्का। दस्तख़त एक भी नहीं।
"आप लिखते नहीं हैं?" उसने पूछा।
"पढ़ना-लिखना नहीं आता, बहनजी।" टीकाराम ने यह ऐसे कहा जैसे यह जानकारी वह दिन में कई बार देता हो। "टैंकर आता है तो सेक्रेटरी साहब की मेज़ पर पर्ची जाती है। वह लिख देते हैं। मैं अंगूठा लगा देता हूँ।"
इनायत ने रजिस्टर के पन्ने पलटे और रुक गया। "आपा, चौदह जून। एक टैंकर सुबह नौ बजकर दस मिनट पर। दूसरा नौ बजकर पचीस पर।"
नफ़ीसा गेट से बाहर निकली और उस टैंकर के पास गई जो अभी खाली होकर लौटने वाला था। ड्राइवर से उसने पूछा कि पानी कहाँ से भरता है, और उसने कोलार की तरफ़ इशारा किया। फिर उसने पूछा कि एक चक्कर में कितना समय लगता है।
"भरने में पच्चीस मिनट, अगर लाइन न हो। रास्ता आधा घंटा। यहाँ ख़ाली करने में बीस।" ड्राइवर ने कंधा उचकाया। "डेढ़ घंटा तो लग ही जाता है, मैडम। लाइन लग गई तो दो।"
पंद्रह मिनट में दूसरा चक्कर मुमकिन है या नहीं, यह सुनकर वह हँसा और चुप हो गया, जो अपने आप में जवाब था।
नफ़ीसा शाम तक रजिस्टर के साथ बैठी रही और हर तारीख़ के सामने दो समय लिखती गई। फिर उसने वही तारीख़ें सुनयना की डायरी से मिलाईं। जो टैंकर सुनयना की माँ ने बालकनी से देखे थे, वे सब रजिस्टर में भी थे और उनके बीच का फ़ासला हमेशा डेढ़ घंटे से ज़्यादा था। जो टैंकर रजिस्टर में थे और डायरी में नहीं, वे हमेशा किसी असली टैंकर के पंद्रह या बीस मिनट बाद लिखे गए थे।
"झूठ अकेला नहीं लिखा गया," उसने इनायत से कहा। "हर झूठ किसी सच के पीछे चिपकाया गया है। जो आदमी यह कर रहा है, वह जानता है कि किसी दिन कोई पूछेगा तो वह कहेगा, देखिए उस दिन तो टैंकर आया ही था।"
अगली सुबह वह सेक्रेटरी बालमुकुंद के घर गई। वह बरामदे में बैठे अख़बार पढ़ रहे थे और उन्होंने बिना पूछे चाय मँगवा दी। नफ़ीसा ने रजिस्टर मेज़ पर रखा और उसे खोला नहीं।
"टीकाराम पर शक है क्या?" उन्होंने कहा। "मैंने पहले ही कहा था, ऐसे आदमी को गेट पर मत बिठाओ। पर लोगों को सस्ता चाहिए।"
"टीकाराम अंगूठा लगाता है," नफ़ीसा ने कहा। "अंगूठा लगाने वाला यह नहीं चुन सकता कि किस दिन दो टैंकर लिखे जाएँ और किस दिन एक। यह वही चुन सकता है जो लिखता है।"
बालमुकुंद ने अख़बार बहुत सलीक़े से तह किया और उसे मेज़ के कोने पर रख दिया।
"मैं आपसे एक ही बात पूछूँगी और उसका जवाब मेरे पास पहले से है," उसने कहा। "चौदह जून को नौ बजकर दस और नौ बजकर पचीस, दो टैंकर। कोलार से यहाँ तक का रास्ता आधा घंटे का है। दूसरा टैंकर उस दिन किस रास्ते से आया था?"
बरामदे में सिर्फ़ पंखे की आवाज़ रह गई। फिर बालमुकुंद ने कहा कि हिसाब में कहीं गड़बड़ हो सकती है, और जवाब में उसने गिनाया कि हिसाब में गड़बड़ एक महीने में एक बार होती है, चौबीस बार नहीं, और हमेशा एक ही तरफ़ नहीं झुकती।
जो उन्होंने कहा, वह सफ़ाई नहीं थी। उन्होंने कहा कि टैंकर वाले ने ख़ुद यह तरीक़ा बताया था, कि पहले साल उन्होंने सिर्फ़ चार टैंकर जोड़े थे, और कि गर्मी में कोई पूछता ही नहीं क्योंकि पानी आता रहा और लोग बस यही देखते हैं कि नल में पानी है या नहीं।
"पानी तो आ ही रहा था," उन्होंने कहा।
"आ रहा था," नफ़ीसा ने माना। "पर आप उसका पैसा नहीं ले रहे थे। आप उस पानी का पैसा ले रहे थे जो नहीं आया।"
सोसाइटी की बैठक अगले इतवार को हुई और नफ़ीसा उसमें नहीं गई। इनायत गया, और लौटकर उसने बताया कि बालमुकुंद ने इस्तीफ़ा दे दिया और पैसा तीन क़िस्तों में लौटाने की बात मानी। किसी ने थाने जाने की बात उठाई, फिर किसी और ने कहा कि उनकी लड़की की शादी नवंबर में है, और बात वहीं रुक गई। टीकाराम से किसी ने कुछ नहीं कहा, न माफ़ी, न सफ़ाई।
सोसाइटी ने ज़मीन के नीचे वाली टंकी पर एक मीटर लगवाया, जो पानी आने पर अपने आप गिनता है और जिसे कोई हाथ से नहीं लिख सकता। अगले महीने का बिल सत्रह टैंकर का आया। सुनयना की माँ अब भी बालकनी में बैठती हैं, पर उन्होंने लिखवाना बंद कर दिया, क्योंकि उनकी बेटी ने कहा कि अब ज़रूरत नहीं है।