भादों में बड़ा तालाब अपनी पूरी हद तक भरा हुआ था और घाट की तीन सीढ़ियाँ पानी के नीचे चली गई थीं। नफ़ीसा सबसे ऊपर वाली सीढ़ी पर खड़ी थी और उसके सामने ग्यारह नावें बँधी हुई थीं, सब एक ही तरफ़ मुँह किए, हवा के साथ हल्के-हल्के हिलती हुईं। हर नाव के अगले हिस्से पर सफ़ेद रंग से नंबर लिखा था। दसवीं नाव का नंबर बाक़ी सबसे थोड़ा ऊपर लिखा था और उसका सफ़ेद रंग बाक़ी सबसे थोड़ा ज़्यादा चमकीला था। उसने यह देखा और आगे बढ़ गई।
परमेश्वरी घाट के ऊपर वाली सड़क पर, चाय की गुमटी के पास खड़ी थी। उसके साथ कोई नहीं था। जिन औरतों के शौहर डूब जाते हैं, उनके साथ शुरू के कुछ हफ़्ते बहुत लोग होते हैं, फिर धीरे-धीरे कम होते जाते हैं, और यह इकतालीसवाँ दिन था।
"कंपनी कहती है लाश नहीं मिली तो कागज़ नहीं बनेगा," उसने कहा। "मैं कहती हूँ लाश मैं कहाँ से लाऊँ। तालाब से पूछूँ?"
"वह बीमा कंपनी का आदमी क्या कहता है?"
"वह कहता है मुझ पर शक है।" उसने यह बिना किसी नाटक के कहा, जैसे मौसम बता रही हो। "चालीस दिन में यह पहली बात है जो किसी ने साफ़-साफ़ कही।"
नफ़ीसा ने उससे कहा कि वह उसकी तरफ़ से नहीं, सिर्फ़ सवालों की तरफ़ से काम करती है, और अगर जवाब उसके ख़िलाफ़ निकले तो वह उन्हें भी उतनी ही आवाज़ में कहेगी। परमेश्वरी ने कहा कि उसे यही चाहिए, क्योंकि पिछले चालीस दिन से हर आदमी उससे यह पूछ रहा है कि उसे क्या चाहिए और कोई यह नहीं पूछ रहा कि हुआ क्या था।
जो हुआ था वह छोटा था। कमलाकर तड़के निकला था, अकेले, जैसे वह हर मंगल और शुक्र को निकलता था, क्योंकि उन दो दिनों में मछली बेचने वाले जल्दी आते हैं। साढ़े नौ बजे उसकी नाव दूर किनारे के पास बहती मिली। चप्पू दोनों नाव के अंदर थे। पानी शांत था और उस दिन आँधी नहीं आई थी।
"चप्पू अंदर थे," नफ़ीसा ने दोहराया।
"यही तो," परमेश्वरी ने कहा। "वह पंद्रह साल से चला रहा था। गिरता तो चप्पू पानी में जाते।"
इनायत तीन दिन घाटों पर घूमता रहा और उसने जो लौटकर बताया, वह किसी राज़ जैसा नहीं था। कमलाकर के नाम तीन नावें दर्ज थीं, क्लब के रजिस्टर में तीनों के नंबर लिखे हुए। दो अब भी उसी घाट पर बँधी थीं। तीसरी, जिसमें वह उस दिन गया था, कंपनी की जाँच के बाद से किनारे पर खींचकर रखी थी और उस पर पॉलीथीन पड़ी थी।
"तो तीन का हिसाब पूरा है," इनायत ने कहा।
"तीन का पूरा है," नफ़ीसा ने कहा। "मैंने पहले दिन ग्यारह नावें गिनी थीं और उनमें एक नाव ऐसी थी जिसका नंबर बाक़ी सबसे नया लग रहा था। वह किसकी है, यह किसी ने नहीं बताया, क्योंकि मैंने पूछा ही नहीं।"
वे अगली सुबह घाट पर लौटे। दसवीं नाव अपनी जगह पर थी। नफ़ीसा उसमें उतरी और नंबर वाली जगह पर उँगली का नाख़ून फेरा। रंग की एक पतली पपड़ी उखड़ी।
नीचे दूसरा रंग था। उसके नीचे तीसरा।
उसने बहुत सावधानी से, बहुत थोड़ा-थोड़ा करके ऊपर वाली परत हटाई और नीचे से जो नंबर निकला, वह वही नहीं था जो ऊपर लिखा था। उसने दोनों नंबर अपनी डायरी में उतारे और घाट के दूसरे मल्लाहों से कुछ नहीं पूछा।
क्लब के रजिस्टर में पुराना नंबर मौजूद था। उसके सामने लिखा था कि वह नाव दो साल पहले टूट-फूट में कटवा दी गई और उसका दर्ज होना ख़त्म कर दिया गया। रजिस्टर में यह लिखने वाले के दस्तख़त भी थे।
"मरी हुई नाव," नफ़ीसा ने कहा। "जो कागज़ पर कट चुकी है, वह पानी में तैर रही है, नए नंबर के साथ। और नया नंबर किसका है?"
नया नंबर उन तीन नंबरों में से एक था जो कमलाकर के नाम दर्ज थे। जिस नाव पर वह लिखा था, वह कमलाकर की नाव नहीं थी।
इसका मतलब समझने में इनायत को थोड़ी देर लगी और नफ़ीसा ने उसे समझाया नहीं, बस रजिस्टर खुला छोड़ दिया। जो नाव किनारे पर पॉलीथीन के नीचे पड़ी थी और जिसे सब कमलाकर की तीसरी नाव समझ रहे थे, उस पर भी नंबर लिखा था। नंबर लिखा जा सकता है। नाव नहीं बनाई जा सकती।
"किसी ने असली नाव बेच दी और मरी हुई नाव पर उसका नंबर पोत दिया," उसने कहा। "चालीस दिन से जिस चीज़ को सब सबूत समझकर किनारे पर रखे हैं, वह दूसरी नाव है।"
मुन्नवर घाट पर उसी दिन शाम को मिला। वह कमलाकर का साझेदार था, पंद्रह साल पुराना, और उसी ने कंपनी को बयान दिया था कि उस सुबह कमलाकर अकेले गया था। उसने नफ़ीसा को चाय के लिए बुलाया और वह बैठ गई।
"रजिस्टर में कटवाने वाले दस्तख़त आपके हैं," उसने कहा। "दो साल पुराने। और नई नाव पर रंग तीन हफ़्ते पुराना है, इससे ज़्यादा नहीं, क्योंकि उसके नीचे वाली परत अभी नरम है।"
मुन्नवर ने चाय की गिलास नीचे रखी और तालाब की तरफ़ देखता रहा, बिना पलक झपकाए। फिर उसने कहा कि उसने कमलाकर को नहीं मारा। नफ़ीसा ने याद दिलाया कि यह सवाल उसने पूछा भी नहीं था। वह डूबा था। तालाब ने पंद्रह साल में सैंतालीस लोग लिए हैं और उनमें से नौ की लाश कभी नहीं मिली, और यह बात कंपनी के कागज़ में भी लिखी है, अगर कोई पढ़े।
जो मुन्नवर ने किया वह उसके बाद शुरू हुआ। कमलाकर की दो चलती नावें उसने बेच दीं, एक इंदौर वाले ठेकेदार को और एक अपने बहनोई को, और उनके नंबर दो पुरानी कटी हुई नावों पर पोत दिए, ताकि घाट पर गिनती पूरी दिखती रहे। परमेश्वरी को गिनती ही दिखाई गई थी। वह कभी नाव के अंदर उतरकर नहीं देखती।
"उसका आदमी डूब गया," नफ़ीसा ने कहा। "आपने चालीस दिन इंतज़ार किया कि वह कब कागज़ पर हस्ताक्षर करेगी, और तब तक उसकी नावें बेचते रहे। और कंपनी को यह भी आपने ही बताया कि शक करने लायक़ कुछ है।"
"मैंने कहा था कि लाश नहीं मिली," उसने कहा। "बाक़ी उन्होंने ख़ुद सोच लिया।"
नफ़ीसा ने अपनी रिपोर्ट कंपनी को दी और उसमें पहला वाक्य यह था कि दावेदार पर शक की कोई वजह नहीं मिली। बाक़ी पन्ने नावों के नंबरों के थे और उन्हें कंपनी ने पुलिस को भेज दिया, क्योंकि वह उनका मामला नहीं था।
पैसा दिसंबर में आया। परमेश्वरी ने उसमें से एक नाव ख़रीदी, नई नहीं, पर उसका नंबर उसने ख़ुद क्लब के रजिस्टर में दर्ज करवाया और अपने नाम से करवाया। वह चलाना नहीं जानती। घाट पर एक लड़का उसे किराए पर लेकर चलाता है और महीने का हिसाब हर पहली तारीख़ को उसके हाथ में रखता है, गिनकर, उसके सामने।