फ़रीदा ने अपनी माँ की दवा के पत्ते मेज़ पर एक-एक करके रखे, महीनेवार, जैसे कोई ताश की गड्डी लगाता है। ग्यारह महीने के पत्ते थे। कुछ पर छपाई हल्की थी, कुछ पर गाढ़ी, और उनमें से चार पत्तों का काग़ज़ बाक़ी सबसे अलग था।
"साल भर से यही दवा चल रही है," उसने कहा। "पहले तीन महीने अम्मी को फ़ायदा हुआ था। उसके बाद से वैसी की वैसी हैं। डॉक्टर साहब कहते हैं उम्र है।"
दवाख़ाना मंगलवारा में था, दो कमरों का, एक भलाई संस्था का चलाया हुआ। बाहर बोर्ड पर लिखा था कि दवा मुफ़्त है और पर्ची के दो रुपये लगेंगे। सुबह की क़तार दरवाज़े से निकलकर गली में मुड़ जाती थी। बरसात के दिनों में वह क़तार दुगनी हो जाती है, क्योंकि पानी बदलते ही पूरा मोहल्ला बीमार पड़ता है। नफ़ीसा उस क़तार में साढ़े तीन घंटे खड़ी रही, बिना यह बताए कि वह कौन है।
खिड़की पर दिलावर बैठता था। पचपन के आसपास, ऊँचा सुनने वाला, और बीस साल से वहीं। वह पर्ची देखता, अंदर मुड़ता, और दवा का पत्ता खिड़की से बाहर सरका देता। हर आदमी पर उसे चालीस सेकंड लगते थे।
डॉक्टर हरगोविंद अंदर वाले कमरे में बैठते थे, हफ़्ते में चार दिन, और मरीज़ देखने के अलावा वह संस्था का हिसाब भी देखते थे। उन्होंने नफ़ीसा को स्टॉक रजिस्टर बिना हिचक के दिखा दिया।
रजिस्टर साफ़ लिखा था। हर खेप की तारीख़, दवा का नाम, कितने पत्ते आए, किस कंपनी से, और हर पंक्ति के आख़िर में बैच नंबर। नफ़ीसा ने सिर्फ़ बैच नंबरों का कॉलम उँगली से ढँककर पढ़ना शुरू किया।
एक ही दवा की खेपें जनवरी से नवंबर तक थीं। जनवरी की खेप का बैच नंबर सबसे बड़ा था। नवंबर वाली का सबसे छोटा।
"बैच नंबर आगे बढ़ते हैं," उसने इनायत से कहा। "कारख़ाना जो माल बाद में बनाता है, उसका नंबर बड़ा होता है। यहाँ साल भर में नंबर पीछे की तरफ़ चले हैं। मतलब जो दवा बाद में आई, वह बनी पहले थी। हर बार पहले से भी ज़्यादा पुरानी।"
इनायत ने पूछा कि इसमें ग़लत क्या है, अगर दवा असली है।
"दवा असली हो सकती है और मरी हुई भी हो सकती है," उसने कहा। "इनमें से आधी दवाओं की उम्र दो साल होती है। दो साल पुरानी असली दवा और सादा चाक में फ़र्क़ बहुत कम रह जाता है।"
उसने चारों अलग काग़ज़ वाले पत्ते उठाए और उन पर छपी तारीख़ें पढ़ीं। तीन पर बनने की तारीख़ थी और उसके नीचे उम्र लिखी थी, जो निकल चुकी थी। चौथे पत्ते पर वह जगह ख़ाली थी, जहाँ तारीख़ छपती है, और उसके ऊपर सफ़ेद रंग का हल्का धब्बा था।
संस्था के कागज़ों से यह निकला कि दवा दो जगह से आती है। एक बड़ी दानी कंपनी हर तीन महीने में सीधे खेप भेजती है, और उसका सारा हिसाब लिखा हुआ है। दूसरी जगह से माल तब मँगाया जाता है जब बीच में दवा ख़त्म हो जाए, और उसका भुगतान नक़द होता है, क्योंकि संस्था का कहना है कि छोटी ख़रीद पर बिल का झंझट नहीं पालते।
नक़द वाली सारी ख़रीद दिलावर करता था। बीस साल से।
नफ़ीसा उससे दवाख़ाना बंद होने के बाद मिली, जब क़तार जा चुकी थी और वह खिड़की का तख़्ता गिरा रहा था। उसने उसे चारों पत्ते दिखाए और कुछ पूछा नहीं, बस मेज़ पर रख दिए।
दिलावर ने उन्हें देखा और फिर स्टूल पर बैठ गया।
"जो अच्छी दवा आती है, वह कहाँ जाती है?" नफ़ीसा ने तब पूछा।
"बरखेड़ा में एक दुकान है।" उसने यह इतनी जल्दी बताया कि साफ़ था वह जवाब बहुत बार अपने आप को दे चुका है। "आधी खेप वहाँ जाती है। बदले में जो पैसा मिलता है, उससे मैं दुगनी पुरानी दवा ख़रीद लेता हूँ। गिनती पूरी रहती है। रजिस्टर में पत्तों की संख्या कभी कम नहीं हुई, आप देख लीजिए।"
"संख्या पूरी है," उसने माना। "दवा नहीं है।"
"क़तार भी पूरी लगती है।" दिलावर ने गली की तरफ़ देखा। "रोज़ दो सौ लोग आते हैं। पहले सत्तर आते थे। मैं सत्तर की खेप से दो सौ को नहीं दे सकता। ऊपर से कोई और माल नहीं आता। तो या तो सवा सौ लोग ख़ाली हाथ जाएँ, या सबको कुछ न कुछ मिले।"
"आपको यह कहते हुए शर्म भी नहीं आ रही।"
"मुझे यह कहते हुए बीस साल हो गए," उसने कहा। "बस किसी ने पूछा नहीं।"
नफ़ीसा अगली सुबह हरगोविंद के पास गई और रजिस्टर का वही कॉलम उनके सामने रखा, और इस बार उसने उँगली नहीं रखी। उन्होंने चश्मा साफ़ किया और नंबर पढ़े, ऊपर से नीचे, दो बार।
"आपको यह दिखा था," उसने कहा।
उन्होंने इनकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि बैच नंबर वह हर महीने देखते हैं, और यह भी कहा कि उन्होंने कभी दिलावर से पूछा नहीं। फिर उन्होंने वह वजह बताई जो नफ़ीसा को पहले से मालूम थी। दवाख़ाना दान से चलता है और दान इस बात पर आता है कि रोज़ दो सौ लोग लौटते नहीं। अगर संख्या गिरती तो अगले साल का पैसा नहीं आता, और तब सत्तर को भी कुछ नहीं मिलता।
"तो आपने गिनती बचा ली," नफ़ीसा ने कहा। "और फ़रीदा की अम्मी ग्यारह महीने चाक खाती रहीं।"
हरगोविंद ने कोई सफ़ाई नहीं दी और यह उनके हक़ में सबसे अच्छी बात थी।
रिपोर्ट फ़रीदा को दी गई, क्योंकि पैसा उसने दिया था। उसने वह संस्था के न्यासियों को भेज दी। दिलावर हटा दिया गया और उस पर कोई मुक़दमा नहीं हुआ, क्योंकि नक़द ख़रीद का कोई बिल कभी बना ही नहीं था और जो चीज़ काग़ज़ पर नहीं है उसकी चोरी साबित करना मुश्किल है। हरगोविंद ने इस्तीफ़ा दिया, जो किसी ने माँगा नहीं था।
दवाख़ाना अब भी खुलता है और अब उसकी खिड़की पर एक तख़्ती लटकी है जिस पर उस दिन की दवाओं के नाम और बैच नंबर चॉक से लिखे रहते हैं, ताकि क़तार में खड़ा आदमी उन्हें अपने पत्ते से मिला सके। क़तार अब सवा सौ लोगों की होती है। फ़रीदा की अम्मी की दवा अब बदल दी गई है और उन्हें फिर से थोड़ा फ़ायदा हो रहा है, हालाँकि ग्यारह महीने वापस नहीं आते।