फ़ैज़ान ने काग़ज़ मेज़ पर रखा और उसे नफ़ीसा की तरफ़ खिसकाने के बजाय दोनों हाथों से पकड़े रखा, जैसे उसे डर हो कि वह उठा लिया जाएगा और वापस नहीं मिलेगा। दफ़्तर की खिड़की से जुमेराती की गली दिखती थी और नीचे किसी प्रेस की मशीन चल रही थी, बराबर की धुकधुक में। कार्तिक का महीना था और सुबह पहली बार ठंडी लगी थी।

"कंपनी कह रही है यह नक़ली है," उसने कहा। "तीन साल से नौकरी कर रहा हूँ। अब वे पुराने कागज़ दोबारा जाँच रहे हैं।"

वह हाई स्कूल का सर्टिफ़िकेट था, सत्रह साल पुराना, हल्के पीले काग़ज़ पर छपा। नीचे बाएँ कोने में गोल मुहर थी, नीली स्याही की। नफ़ीसा ने उसे उठाया और खिड़की की रोशनी में तिरछा करके देखा।

मुहर बहुत साफ़ थी। हर अक्षर पूरा, हर किनारा गोल, बीच का चक्र कहीं से टूटा नहीं।

उसने फ़ैज़ान की पढ़ाई के बारे में पूछा।

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"नवीं तक ठीक चला। दसवीं में पिताजी चले गए, तो मैंने साल बीच में छोड़ा और अगले साल दोबारा किया।" उसने बताया कि उसने वह साल पूरा किया था, इम्तिहान दिया था, पास हुआ था, और सर्टिफ़िकेट उसे स्कूल से ही मिला था, हाथ में, प्रिंसिपल के कमरे में।

जब उसने पूछा कि सर्टिफ़िकेट किसने दिया था, फ़ैज़ान ने बिना रुके कहा कि विजयलक्ष्मी मैडम ने अपने हाथ से दिया था।

स्कूल अब नहीं था। नफ़ीसा और इनायत जिस पते पर पहुँचे, वहाँ अब एक गोदाम था और उसका शटर आधा उठा हुआ था। बग़ल की दुकान वाले ने बताया कि स्कूल आठ साल पहले बंद हुआ, और उससे तीन साल पहले उसमें आग लगी थी, पीछे वाले कमरे में, जहाँ रिकॉर्ड रखे जाते थे।

दुकानदार से उसने आग के बारे में पूछा।

"जो जलना था।" आदमी ने कंधा उचकाया। "अलमारियाँ जलीं। बच्चे नहीं थे, छुट्टी थी। मैडम उस दिन तीन घंटे बाहर खड़ी रोती रहीं।"

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विजयलक्ष्मी अब शाहपुरा में अपनी बेटी के साथ रहती थीं और उन्होंने दरवाज़ा ख़ुद खोला। बहत्तर साल की थीं। कमरे में एक तरफ़ लोहे की तीन अलमारियाँ थीं और उनमें से एक पर अभी भी स्कूल के नाम का स्टिकर चिपका था, आधा उखड़ा हुआ।

नफ़ीसा ने सर्टिफ़िकेट निकाला और मेज़ पर रखा। विजयलक्ष्मी ने उसे बिना चश्मा लगाए देखा और फिर चश्मा लगाकर दोबारा देखा। उनका चेहरा नहीं बदला।

"मुहर बहुत साफ़ है," नफ़ीसा ने कहा।

विजयलक्ष्मी ने सिर हिलाया और अपना चश्मा उतार लिया।

"जो मुहर बीस साल एक स्कूल में रोज़ लगती है, उसका कोई न कोई अक्षर घिस जाता है। रबर दब जाता है, किनारा भर जाता है, बीच का कोई हिस्सा स्याही पकड़ना छोड़ देता है। मैंने इसी स्कूल के दो और सर्टिफ़िकेट देखे हैं, दोनों उन बच्चों के जो फ़ैज़ान से पुराने हैं। दोनों पर 'शा' का ऊपरी सिरा टूटा हुआ है।" उसने काग़ज़ पर उँगली रखी। "इस पर पूरा है।"

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विजयलक्ष्मी ने अलमारी की तरफ़ देखा, फिर अपने हाथों की तरफ़।

"आग के बाद मुहर नहीं मिली," उन्होंने कहा। "नई बनवानी पड़ी। बाज़ार से। एक सौ चालीस रुपये की।"

"और रिकॉर्ड?"

"रिकॉर्ड भी नहीं मिला।" उन्होंने यह ऐसे कहा जैसे वाक्य बहुत बार बोला जा चुका हो। "चार साल की हाज़िरी, नतीजे, सब उसी अलमारी में थे। बोर्ड की कॉपी भोपाल में थी, पर बोर्ड ने कहा कि जिस स्कूल की मान्यता ख़त्म हो चुकी है, उसके पुराने कागज़ निकालने का कोई तरीक़ा उनके पास नहीं है। मैंने ग्यारह महीने चक्कर लगाए।"

कमरे में घड़ी की आवाज़ अचानक सुनाई देने लगी। बाहर बेटी ने बरतन रखे और फिर आवाज़ बंद हो गई, जैसे वह भी सुन रही हो।

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"कितने बच्चों को दिए?" नफ़ीसा ने पूछा।

"इकतीस।" उन्होंने बिना सोचे बताया, जैसे गिनती याद हो। "सब वही, जो उन चार सालों में पढ़े और पास हुए और जिनका कागज़ जल गया। एक भी ऐसा नहीं जो मेरे स्कूल में नहीं पढ़ा। एक भी ऐसा नहीं जो फ़ेल हुआ हो।"

"आपको मालूम था कि यह जुर्म है।"

"मुझे यह मालूम था कि इकतीस बच्चे बिना कागज़ के थे और उनकी कोई ग़लती नहीं थी।" उन्होंने पहली बार आँख मिलाई। "आप बताइए, मैं उनसे क्या कहती। कि तुम पढ़े तो थे पर अब सबूत नहीं है, इसलिए तुमने नहीं पढ़ा?"

नफ़ीसा ने काग़ज़ वापस रखा। उसने कहा कि वह उनसे बहस नहीं करेगी, क्योंकि जो उन्होंने कहा वह ग़लत नहीं है, और जो उन्होंने किया वह भी सच नहीं हो जाता। दोनों बातें एक साथ चलती रहेंगी और अदालत सिर्फ़ दूसरी वाली सुनेगी।

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"फ़ैज़ान की नौकरी जाएगी," उसने कहा। "और अगर कंपनी शिकायत करती है तो उस पर मुक़दमा चलेगा, आप पर नहीं, क्योंकि कागज़ उसने लगाया है। इकतीस में से बाक़ी तीस भी कहीं न कहीं यही कागज़ लगाकर बैठे होंगे।"

विजयलक्ष्मी चुप रहीं, इतनी कि इनायत ने पहलू बदल लिया। फिर उन्होंने अलमारी खोली और एक मोटी कॉपी निकाली, जिसका गत्ता कपड़े से मढ़ा हुआ था। उसमें इकतीस नाम थे, उनके सामने साल, रोल नंबर, और हर नाम के आगे उनके अपने हाथ की लिखावट में यह लिखा था कि यह बच्चा कब आया और कब तक पढ़ा।

"यह मैंने आग के बाद लिखी थी," उन्होंने कहा। "याद से। आज तक किसी ने माँगी नहीं।"

नफ़ीसा ने वह कॉपी दो घंटे पढ़ी और फिर उसकी नक़ल करवाई। उसकी रिपोर्ट में लिखा था कि सर्टिफ़िकेट पर लगी मुहर स्कूल की मूल मुहर नहीं है और यह तथ्य विवाद से परे है। उसके नीचे यह भी लिखा था कि उस स्कूल में लगी आग का दस्तावेज़ नगर निगम के रिकॉर्ड में मौजूद है, कि विद्यार्थी की उपस्थिति का हस्तलिखित प्रमाण प्रधानाध्यापिका के पास है, और कि जिस बोर्ड ने अपने ही रिकॉर्ड की नक़ल देने से मना किया, उसका पत्र भी संलग्न है।

कंपनी ने फ़ैज़ान को नहीं निकाला। उन्होंने उससे एक लिखित बयान लिया और फ़ाइल बंद कर दी, क्योंकि किसी को भी सत्रह साल पुराने काग़ज़ पर अदालत नहीं जाना था। बाक़ी तीस के बारे में कंपनी ने सवाल नहीं उठाया, और नफ़ीसा ने भी उन्हें अपनी तरफ़ से नहीं गिनाया, क्योंकि उससे यह पूछा नहीं गया था।

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जाड़े के बाद विजयलक्ष्मी ने वह कपड़े वाली कॉपी नफ़ीसा के दफ़्तर भिजवा दी, इस चिट्ठी के साथ कि अब उनकी आँखें पढ़ने लायक़ नहीं रहीं और कागज़ किसी ऐसी जगह होना चाहिए जहाँ माँगे जाने पर मिल सके। वह कॉपी अब नफ़ीसा की अलमारी के सबसे नीचे वाले ख़ाने में रखी है, उन फ़ाइलों के साथ जो बंद हो चुके मामलों की हैं। इकतीस में से चार लोग अब तक उसे देखने आ चुके हैं।