गजानन की माँ दफ़्तर की सीढ़ियों पर बैठी थी, क्योंकि ऊपर आने में उसे तकलीफ़ थी, और नफ़ीसा नीचे उतरकर उसी सीढ़ी पर बैठ गई। औरत के हाथ में एक प्लास्टिक की थैली थी जिसमें कागज़ भरे थे और थैली का हैंडल दो जगह से टेप लगाकर जोड़ा गया था।
"इकहत्तर दिन हो गए," उसने कहा। "वकील कहता है गवाह पक्का है। नंबर बता दिया उसने। अब क्या बचा।"
जो हुआ था वह बारिश की एक रात थी, कोलार रोड से नीचे उतरती एक ढलान, और उस पर पैदल जाती अमरावती नाम की एक औरत, जो अस्पताल में सैंतीस दिन रही और जिसे उस रात का कुछ याद नहीं। कोई गाड़ी उसे मारकर निकल गई। ढलान के नीचे मोड़ पर भँवरलाल की पान की दुकान है और उसी ने बयान दिया कि उसने गाड़ी देखी और नंबर पढ़ा। नंबर गजानन के ट्रक का था, जो उस रात बैतूल से माल लेकर लौटा था और उसी सड़क से गुज़रा था।
नफ़ीसा उस जगह उसी रात के वक़्त पहुँची, दस बजकर चालीस मिनट पर, और अगस्त की बारिश उस दिन भी हो रही थी। सड़क गीली थी और उस पर बत्तियों का पीलापन लंबा-लंबा खिंचकर फैल रहा था।
ढलान की पूरी लंबाई में तीन खंभे थे। सबसे ऊपर वाले की बत्ती जल रही थी, बीच वाले की नहीं, और सबसे नीचे वाली दुकान के ठीक ऊपर थी। बीच का हिस्सा, जहाँ अमरावती गिरी थी, अँधेरे में था।
भँवरलाल दुकान में था और उसने बिना पूछे चाय के लिए इशारा किया। उसकी दुकान लकड़ी की थी, तीन तरफ़ से बंद, और सामने वाले तख़्ते पर पान का सामान सजा था। उसके सिर के ऊपर, बाईं तरफ़, एक गोल उभरा हुआ शीशा लगा था, वैसा ही जैसा दुकानों में चोरी से बचने के लिए लगाते हैं।
"उसी में देखा था," उसने कहा। "मैं पान बना रहा था। शीशे में गाड़ी दिखी।"
नफ़ीसा उसकी जगह पर बैठी। ठीक उसी तरह, वैसे ही सिर झुकाकर, जैसे कोई पान बनाते वक़्त बैठता है। फिर उसने शीशे में देखा।
शीशे में सड़क का सिर्फ़ आख़िरी हिस्सा दिख रहा था, दुकान से बीस-पचीस क़दम तक, वह भी नीचे की तरफ़ का। ऊपर की ढलान शीशे में कहीं नहीं थी।
उसने भँवरलाल से कहा कि वह ख़ुद बैठकर देख ले, और वह बैठा, और झुककर देखता रहा, और फिर उठ गया।
"यह शीशा दुकान के सामने वाली जगह देखने के लिए है," नफ़ीसा ने कहा। "जो गाड़ी ऊपर से आकर मारकर नीचे निकल गई, वह इसमें आती ही नहीं। और जो बीस क़दम में इसमें आती, वह अँधेरे से निकलकर आपकी बत्ती में आती और उसी रफ़्तार से निकल जाती। उसका पिछला नंबर पढ़ने के लिए आपको उसके पीछे बत्ती चाहिए। पीछे बत्ती नहीं थी।"
भँवरलाल तख़्ते के पास खड़ा रहा। बारिश तेज़ हुई और छप्पर से पानी एक ही जगह से गिरने लगा, पतली धार में।
"मैंने झूठ नहीं बोला," उसने अंत में कहा।
"मैंने कहा भी नहीं।"
"वह लड़की सड़क पर पड़ी थी और मैंने ही एम्बुलेंस बुलाई थी।" उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी। "पुलिस दो दिन आती रही। बार-बार वही सवाल। मैंने कहा कि ट्रक शाम को गया था, वही ट्रक जो हर हफ़्ते जाता है, उसका नंबर मुझे याद है क्योंकि आठ-आठ है उसमें। उन्होंने लिख लिया। मैंने यह नहीं कहा कि उसी ने मारा।"
"पर बयान पर आपका अंगूठा है।"
"जो लिखा था वह मैंने पढ़ा नहीं।"
इनायत ने अगले तीन दिन नाली में हाथ डाला। ढलान के दोनों तरफ़ की नाली, ऊपर से नीचे तक, और चौथे दिन उसे नारंगी काँच का एक टुकड़ा मिला, अँगूठे जितना, जिस पर अंदर की तरफ़ से एक अक्षर उभरा हुआ था। वह इंडिकेटर की बत्ती का काँच था।
टुकड़ा ऊपर वाली नाली में था, हादसे की जगह से आठ क़दम ऊपर।
"जो गाड़ी नीचे की तरफ़ जा रही थी, उसका टूटा काँच नीचे की तरफ़ गिरेगा," नफ़ीसा ने कहा। "यह ऊपर मिला है। और अमरावती की चप्पल भी ऊपर की तरफ़ मिली थी, यह पुलिस के अपने काग़ज़ में लिखा है। मारकर जाने वाली गाड़ी ऊपर जा रही थी। गजानन का ट्रक नीचे उतर रहा था।"
उसने रिपोर्ट में यही तीन बातें लिखीं। शीशे का कोण, बत्ती वाले खंभे की हालत, और काँच के टुकड़े की जगह। उसने यह नहीं लिखा कि गाड़ी किसकी थी, क्योंकि उसे मालूम नहीं था, और उसने यह भी नहीं लिखा कि भँवरलाल ने जानबूझकर कुछ किया, क्योंकि उसका ऐसा मानना नहीं था।
वकील ने वही रिपोर्ट अदालत में लगाई और तारीख़ पर तारीख़ लगती रही। गजानन उन्नीस दिन और अंदर रहा। फिर एक दिन उसे छोड़ दिया गया, बिना किसी को कुछ बताए, जैसे छोड़ा जाता है।
काँच का वह टुकड़ा एक लिफ़ाफ़े में थाने में जमा है। ऊपर की कॉलोनी में चार सौ मकान हैं और उनमें कितनी गाड़ियों के इंडिकेटर बदले जा चुके हैं, यह किसी ने नहीं गिना।
अमरावती अब लाठी से चलती है और उस ढलान पर नहीं चलती, दूसरी सड़क से घूमकर जाती है, जो सात मिनट लंबी है। गजानन दोबारा बैतूल की लाइन पर चला गया। भँवरलाल की दुकान पर वह गोल शीशा अब भी लगा है, उसी कोण पर, और उसने उसे सीधा नहीं करवाया।