चौक की उस गली में ईद से पहले चलना मुश्किल हो जाता है, और नफ़ीसा को दुकान तक पहुँचने में बीस मिनट लगे, जबकि गली की लंबाई डेढ़ सौ क़दम है। दोनों तरफ़ सिवइयों के बोरे खुले पड़े थे। हवा में घी और भुने मेवे की गंध थी, इतनी गाढ़ी कि साँस के साथ मुँह में स्वाद आता था। नसीमा उसे कोहनी से पकड़कर भीड़ में से खींचती हुई ले जा रही थी।
"पाँच हफ़्ते," उसने कहा। "पाँच हफ़्ते से भाई का चेहरा नहीं देखा। दुकान रोज़ खुलती है। ताला रोज़ लगता है। आदमी ग़ायब है।"
दुकान बड़ी नहीं थी, पर पुरानी थी। लकड़ी के तख़्त, पीतल के तराज़ू, और पीछे की दीवार पर एक कैलेंडर जिसके तीन महीने के पन्ने फाड़े नहीं गए थे। गद्दी पर एक नौजवान बैठा था, उम्र शायद चौबीस, और वह ग्राहक से बात करते हुए भी दरवाज़े की तरफ़ देख रहा था।
"वसीम," नसीमा ने कहा। "यह मेरी बात सुनने आई हैं।"
वसीम ने बहुत अदब से सलाम किया और वही बताया जो वह पाँच हफ़्ते से सबको बता रहा था। अब्बा इलाज के लिए बाहर गए हैं। दिल्ली में। फ़ोन ठीक से लगता नहीं। ईद के बाद लौटेंगे।
"किस अस्पताल में?"
"वह मुझे ठीक से मालूम नहीं।"
नसीमा ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला और नफ़ीसा ने उसकी कलाई पर हाथ रख दिया।
पीछे तख़्त पर एक मोटी बही रखी थी, कपड़े की जिल्द वाली, जिसके किनारे उँगलियों से घिसकर गोल हो चुके थे। नफ़ीसा ने उसे उठाने की इजाज़त माँगी और वसीम ने बहुत जल्दी हाँ कह दी, जो अपने आप में एक बात थी।
बही में सत्रह साल का हिसाब था। हर साल के पन्ने अलग, हर ऑर्डर की तारीख़, माल का नाम, वज़न, और भेजने वाले का नाम। नफ़ीसा ने पिछले चार साल के पन्ने खोलकर साथ-साथ रखे।
हर साल सिवइयों का बड़ा ऑर्डर रमज़ान शुरू होने से ठीक पहले गया था। हर साल तारीख़ अलग थी। दो हज़ार तेईस में तेरह मार्च, चौबीस में दो मार्च, पचीस में इक्कीस फ़रवरी। हर साल क़रीब ग्यारह दिन पीछे।
इस साल का ऑर्डर पिछले साल वाली तारीख़ पर गया था। इक्कीस फ़रवरी।
नफ़ीसा ने पन्ना दो बार पढ़ा और फिर बही बंद कर दी। बाहर गली में किसी ने बोरा गिराया और उसकी आवाज़ दुकान के अंदर तक आई।
"रमज़ान का महीना चाँद से चलता है," उसने वसीम से कहा। "हर साल ग्यारह दिन आगे खिसकता है। जो आदमी सत्रह साल से यह दुकान चला रहा है, वह ऑर्डर चाँद देखकर देता है, कैलेंडर देखकर नहीं। उससे यह ग़लती कभी नहीं हुई। इस साल यह ऑर्डर उसने नहीं दिया। जिसने दिया, उसने पिछले साल का पन्ना खोलकर नकल कर ली।"
वसीम ने तराज़ू के पलड़े को उँगली से छुआ और उसे हिलने से रोक दिया।
"और आटा," नफ़ीसा ने कहा। "पाँच हफ़्ते से हर हफ़्ते वही मात्रा जा रही है जो पहले जाती थी। दुकान में दो लोग खाते थे। अब भी दो का ही जाता है। अगर तुम्हारे अब्बा दिल्ली में हैं तो पाँच हफ़्ते से यहाँ एक ही आदमी है।"
गली का शोर भीतर आता रहा। किसी ने पीछे वाले कमरे में कुछ खटकाया, धीरे से, जैसे गिरकर सँभल गया हो।
नसीमा उसी आवाज़ पर खड़ी हो गई।
"बैठ जाइए," वसीम ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार बदली। "मैं दिखाता हूँ।"
पीछे का कमरा छोटा था और उसमें एक चारपाई थी। यूनुस उस पर लेटे थे, दीवार की तरफ़ मुँह किए। उनका बायाँ हाथ सीने पर रखा था और दायाँ बिलकुल सीधा, बेजान। उन्होंने आहट पर गर्दन घुमाने की कोशिश की और गर्दन आधी ही घूमी।
"बारह अप्रैल की रात," वसीम ने कहा। "डॉक्टर कहते हैं दिमाग़ की नस थी। बोलना अब थोड़ा-थोड़ा लौट रहा है। चलना नहीं लौटेगा।"
नसीमा चारपाई के पास बैठ गई और बहुत देर तक अपने भाई का हाथ पकड़े रही, वह हाथ जिसमें जान थी।
"तुमने बताया क्यों नहीं?" उसने पूछा, और सवाल भाई से था, भतीजे से नहीं।
वसीम दरवाज़े पर ही खड़ा रहा। "पूरे बाज़ार का उधार अब्बा के नाम पर है, फूफी। किसी काग़ज़ पर नहीं, सिर्फ़ नाम पर। थोक वाले माल इसलिए भेजते हैं कि सामने यूनुस भाई हैं। जिस दिन उन्हें पता चलता कि वह उठ नहीं सकते, उसी दिन सब अपना पैसा माँगते, और वह भी ईद से पहले, जब सारा माल दुकान में भरा है और बिका कुछ नहीं है।" उसने रुककर कहा, "तीन लाख का माल अंदर है। मेरे पास चालीस हज़ार हैं।"
"तो तुमने सोचा कि ईद तक चला लो।"
"ईद तक बिक जाता। ईद के बाद मैं सबको बता देता।" वह चुप हुआ। "रोज़ यही सोचकर दुकान खोलता हूँ।"
नफ़ीसा ने यूनुस की तरफ़ देखा। उनकी आँखें खुली थीं और वे बेटे को देख रहे थे, और उस देखने में जो था वह डर नहीं था।
"आपकी फूफी पाँच हफ़्ते से थाने और अस्पताल के चक्कर काट रही हैं," उसने वसीम से कहा। "उन्हें यह डर था कि उनका भाई मर चुका है और कोई बता नहीं रहा। आपने उधार बचा लिया। इसकी क़ीमत किसी और ने चुकाई।"
वसीम ने सिर झुका लिया।
नसीमा ईद तक वहीं रुक गई। उसने दो थोक वालों से ख़ुद बात की, क्योंकि वे उसके अब्बा के वक़्त से जानते थे, और दोनों ने कहा कि माल आता रहेगा। तीसरे ने आधा पैसा पहले माँगा, और वह भी ठीक था, क्योंकि अब माँगने वाले को असली बात मालूम थी।
ईद की सुबह दुकान बंद रही। दोपहर में वसीम ने पीछे वाले कमरे की खिड़की खोल दी, जो गली में खुलती है, और यूनुस की चारपाई उसके पास खिसका दी। गली में से गुज़रते हुए कई लोगों ने ऊपर देखकर सलाम किया, और उन्होंने अपने बाएँ हाथ से जवाब दिया, हर बार, जब तक शाम नहीं हो गई।